उम्मीद तो हरी है .........
दौर पतझड़ का सही, उम्मीद तो हरी है
बुधवार, फ़रवरी 13, 2013
परिणय के सत्ताईस वर्ष ************************
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तुम्हारे मेंहदी रचे हाथों में रख दी थी अपनी भट्ट पड़ी हथेली महावर लगे तुम्हारे पांव रख गये थे खुरदुरी जमीन पर साझा संकल्प लिया था हम दोनो...
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सोमवार, फ़रवरी 11, 2013
बसंत-------
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सफ़र से लौटकर आने की आहटों से ...
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बुधवार, फ़रवरी 06, 2013
ओ मेरी सुबह---------
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ओ मेरी सुबह सींच देती हो जड़ें ...
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शनिवार, फ़रवरी 02, 2013
सुना है-------
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धुंधली आंखें भी पहचा...
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रविवार, जनवरी 27, 2013
सपनों को भी ऊगाना-------
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उलाहना देती आवाज गूंजती निकल जाती है करीब से कहती है सुनो आम आदमी के सपने उपज रहे हैं जमीन से------ सिखाकर उड़ा दिये जाते हैं पत्थरों के ...
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गुरुवार, जनवरी 24, 2013
खादी के सफ़ेद कुरते में ----------
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अब पडोसी के अमरूद तोड़कर नहीं खाये जाते सीधा पडोसी को ही कर दिया जाता है खलास--------- लोग अब छुट्टियों में अपने गांव नहीं जाते शहर में ही...
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बुधवार, जनवरी 23, 2013
सिसकियां रोकने घर की-------
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तुम्हे देखने की जिद में जोड़ता रहा कांच के टुकड़े पागलों की भीड़ में एक और पागल जुड़ गया------- लेकर चले थे मशाल मुट्ठी में रखने मंजिल सिसकि...
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