अंधेरों के ख़िलाफ़
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प्रारम्भ में
एक मिट्टी का दिया
जला होगा
जो अंधेरों से लड़ता हुआ
उजाले को दूर दूर तक
फैलाता रहा होगा
फिर
संवेदनाओं के चंगुल में फंसकर
जनमत के बाजार में
नीलाम होने लगा
जूझता रहा आंधियों से
लेकिन
नहीं ख़त्म होने दी
अपनी टिमटिमाहट
उजाला
फूलों की पंखुड़ियों पर
लिख रहा है
अपने होने का सच
मिट्टी का दिया
आज भी उजाले को
मुट्ठियों में भर भर कर
घर घर पहुंचा रहा है
ताकि मनुष्य
लड़ सकें
अंधेरों के ख़िलाफ़---
◆ज्योति खरे
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं
14 टिप्पणियां:
लाजवाब | शुभकामनाएं दीप पर्व की |
वाह-वाह क्या बात है सर शानदार अभिव्यक्ति।
सादर प्रणाम सर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २२ अक्टूबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत सुंदर ! शुभ दीपावली !
बहुत सुंदर
अनुपम रचना, शुभ दीपावली!!
बेहतरीन
आभार आपका
आभार आपका
आभार आपका
आभार आपका
आभार आपका
आभार आपका
सुन्दर सृजन
मिट्टी के दिए को आशा, साहस और संघर्ष का प्रतीक बनाकर आपने गहरी बात बहुत सहज शब्दों में कही है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
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धन्यवाद!
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