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गुरुवार, मार्च 18, 2021

प्रेम से परिचय

प्रेम से परिचय
***********
धूल और धुंध के 
थपेड़ों से बचती  
किसी सुनसान 
जगह पर बैठकर
खोलकर स्मृतियों की गठरी
देखना चाहती हूं
पुराने परिचित खूबसूरत दिन

जब उन दिनों 
धूप में चेहरा नहीं ढांकती थी
ठंड में स्वेटर नहीं पहनती थी
भींगने से बचने 
बरसात में छाता नहीं ले जाती थी
 
यह वे दिन थे,जब
वह छुप कर देखता भर नहीं था
भेजता था कागज में लिखकर सपनें
जिन्हें देखकर
मैं जीती रहूं 

उन दिनों,मैं
अल्हड़पन के नखरों में डूबी
इतराया करती थी
मचलकर गिर जाया करती थी
पिघलती मोम की तरह

प्रेम के जादुई करिश्में से
अपरचित थी
एक दिन उस अजनबी ने कहा
मैं,तुम्हारा
प्रेम से परिचय करवाना  चाहता हूं
मजनूं की दीवानगी 
और फ़रहाद की आवारगी से
मिलवाना चाहता हूं
वह कहता रहा
तुममें लैला का दिल है
शीरी का मन है
और तुम्हारे पास
प्रेम करने की अदाएं भी
उन्हीं जैसी हैं

वह चला गया
फिर कभी नहीं लौटा नहीं

मैं आज तक 
उस दीवाने का 
उस आवारा का
इंतजार कर रहीं हूँ
जिसमें मजनू जैसा दिल हो
फ़रहाद जैसा मन हो

मुझे मालूम है
प्रेम के वास्तविक रंगों से
परिचय करवाने 
वह अजनबी जरूर आएगा
जब तक 
इंतजार के खूबसूरत
दिनों में
खुद को संवार लेती हूं----

"ज्योति खरे"

सोमवार, फ़रवरी 15, 2021

प्रेम

प्रेम
***
लड़कों की जीन्स के जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की 
चुन्नी के छोर में 
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
कलगी के साथ खुसा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच में फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है प्रेम 

फूलों की सुगंध
भंवरों की जान
बसंत की मादकता
पतझर में ठूंठ सा है प्रेम 

जंगली जड़ी बूटियों का रसायन
झाड़ फूंक और सम्मोहन
के ताबीज में बंद
सूखे रोग की दवा है प्रेम 

फुटबॉल जैसा
एक गोल से
दूसरे गोल की तरफ 
जाता है
बच्चों की तरह 
उचका दिया जाता है 
आकाश की तरफ
गोद में गिरते ही
खिलखिलाने लगता है  
दरकी जमीन पर 
कोमल हरी घास
की तरह 
अंकुरित होता है  

खाली बोतलों सा लुढ़कता 
बिस्किट की तरह
चाय में डूबता
पाउच में बंद
पान की दुकान में बिकता 
च्यूइंगम की तरह
घंटों चबाया जाता है प्रेम

माँ बाप की
दवाई वाली पर्ची में लिखा
फटी जेबों में रखा रखा
भटकता रहता है प्रेम 

और अंत में
पचड़े की पुड़िया में लपेटकर 
डस्टबिन में 
फेंक दिया जाता है प्रेम---

"ज्योति खरे"

रविवार, दिसंबर 29, 2019

जिन्दा रहने की वजह

जिन्दा रहने की वजह
*****************
सम्हाल कर रखा है
तुम्हारे वादों का
दिया हुआ
ब्राउन रंग का मफलर
बांध लेता हूँ
जब कभी
तब कान में फुसफुसाकर
कहती है ठंड
कि, आज बहुत ठंड है

इन दिनों
उबलते देश में
गिर रही है बर्फ
दौड़ रही है शीत लहर
जानता हूँ
तुम्हारी भी तासीर
बहुत गरम है
पर
मेरी ठंडी यादों को
गर्माहट देना
ओढ़ लेना
मेरा दिया हुआ
ऊनी आसमानी शाल

बहकते, झुंझलाते
और भटकते इस दौर में
प्रेम
जिन्दा रहने की
वजह बनेगा-----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, दिसंबर 19, 2019

यूकेलिप्टस

यूकेलिप्टस 
*********
एक दिन तुम और मैं 
शाम को टहलते 
उंगलियां फसाये 
उंगलियों में 
निकल गये शहर के बाहर--

तुमने पूछा 
क्या होता है शिलालेख 
मैने निकाली तुम्हारे बालों से 
हेयरपिन
लिखा यूकेलिप्टस के तने पर 
तुम्हारा नाम----

तुमने फिर पूछा 
इतिहास क्या होता है 
मैने चूम लिया तुम्हारा माथा--

खो गये हम 
अजंता की गुफाओं में 
थिरकने लगे 
खजुराहो के मंदिर में 
लिखते रहे उंगलियों से 
शिलालेख 
बनाते रहे इतिहास--

आ गये अपनी जमीन पर 
चेतना की सतह पर 
अस्तित्व के मौजूदा घर पर--

घर आकर देखा था दर्पण 
उभरी थी मेरे चेहरे पर 
लिपिस्टिक से बनी लकीरें 
मेरा चेहरा शिलालेख हो गया था 
बैल्बट्स की मैरुन बिंदी 
चिपक आयी थी 
मेरी फटी कालर में 
इतिहास का कोई घटना चक्र बनकर--

अब खोज रहा हूं इतिहास 
पढ़ना चाहता हूं शिलालेख--

अकेला खड़ा हूं
जहां बनाया था इतिहास  
लिखा था शिलालेख 
इस जमीन पर 
खोज रहा हूं ऐतिहासिक क्षण--

लोग कहते हैं 
यूकेलिप्टस पी जाता है 
सतह तक का पानी 
सुखा देता है जमीन की उर्वरा--

शायद यही हुआ है 
मिट गया शिलालेख 
खो गया इतिहास--

अब शायद  
फिर लिख सकेंगे इतिहास 
अपनी जमीन का--

क्या तुम भी कभी 
देखती हो मुझे 
अपने मौजूदा जीवन के आईने में 
जब कभी तुम्हारी 
बिंदी,लिपिस्टिक 
छूट जाती है 
इतिहास होते क्षणों में---

 "ज्योति खरे" 

शुक्रवार, अगस्त 23, 2019

कृष्ण का प्रेम


आधुनिक काल की
कंदराओं से निकलकर
कृष्ण का
सार्वजानिक जीवन में
कब प्रवेश हुआ
इतिहास में इसकी तिथि दर्ज नहीं है
दर्ज है केवल कृष्ण का प्रेम

इतिहासकार बताते हैं
भक्ति की सारी मान्यतायें
भक्ति काल में ही
सिकुड़ कर रह गयी थी
जैसे सूती कपड़े को पहली बार
धोने के बाद होता है

सूती साड़ियों से
द्रोपती का तन ढांकने वाला कृष्ण
आधुनिक काल में
नारियों को देखते ही
मंत्र मुग्ध हो जाता है
चीरहरण के समय की
अपनी उपस्थिति को भूल जाता है

सार्वजनिक जीवन में
नाबालिगों से लेकर बूढ़ों तक का
नायक है कृष्ण
राजनितिक दलों का महासचिव
बॉलीवुड का सिंघम

स्वीकार भी करता है कृष्ण
कि, राजनीतिक दखलअंदाजी 
और सूचनाओं के अभाव में
मुझे कई कांडों का पता ही नहीं चलता
कि, इस देश में
शाश्वत प्रेम
अब बलात्कारियों के घरों में रहने लगा है

घनौनी साजिश से लिपटी हवाओं ने
मेरे भीतर के कृष्ण को
बहुत पहले मार दिया था
और मैं अनुशासनहीनता की
छाती से चलकर
बियर बार में बैठने लगा
युवा मित्रों को प्रेम के गुर सिखाने

आत्मग्लानि से भरा मैं
अपने आपको भाग्यशाली मानता हूँ
कि, आज भी मेरे जन्मदिन पर
शुद्ध घी के असंख्य दीपक जलाकर 
प्रार्थना करते हैं लोग
हे कृष्ण
घर परिवार,नाते-रिश्तेदारों
अड़ोसी- पड़ोसी
और देश को
वास्तविक प्रेम का पाठ पढ़ाओ
ताकि इस देश के लोग
जीवन में
वास्तविक प्रेम का अर्थ समझ सकें---

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, जुलाई 26, 2019

वाह रे पागलपन

सावन में
मंदिर के सामने
घंटों खड़े रहना
तुम्हें कई कोंणों से देखना

तुम्हारे चमकीले खुले बाल
हवा में लहराता दुपट्टा
मेंहदी रचे हांथ
जानबूझ कर
सावनी फुहार में तुम्हारा भींगना
दुपट्टे को
नेलपॉलिश लगी उंगलियों से
नजाकत से पकड़ना,
ओढ़ना
कीचड़ में सम्हलकर चलना
यह सब देखकर
सीने में लोट जाता था सांप-

पागल तो तुम भी थी
जानबूझ कर निकलती थी पास से
कि,
मैं सूंघ लूं
तुम्हारी देह से निकलती
चंदन की महक
पढ़ लूं आंखों में लगी
कजरारी प्रेम की भाषा
समझ जाऊं
लिपिस्टिक लगे होठों की मुस्कान-

आज जब
खड़ा होता हूँ
मौजूदा जीवन की सावनी फुहार में
झुलस जाता है
भीतर बसा पागलपन
जानता हूं
तुम भी झुलस जाती होगी
स्मृतियों की 
सावनी फुहार में--

वाकई पागल थे अपन दोनों-----

"ज्योति खरे"

रविवार, जून 02, 2019

सावित्री का प्रेम आज भी जिंदा है-----


डंके की चोट पर
ऐंठ कर पकड़ ली
मृत्यु के देवता की कालर
विद्रोह का बजा दिया बिगुल 
निवेदनों की लगा दी झड़ी

गहरे धरातल से
खींच कर ले आयी
अपने प्रेम को
अपनी आत्मा को

बांध कर कच्चा सूत
बरगद की पीठ पर
ले गयी अपनी आत्मा को
सपनों की दुनियां से परे
नफरतों के वास्तविक गारे से बनी
कंदराओं में

अपने पल्लू में लपेटकर
ले आयी
शाश्वत प्रेम को

सावित्री होने का सुख
कच्चे सूत में पिरोए
पक्के मोतियों जैसा
होता है---------

"ज्योति खरे"

बुधवार, जनवरी 02, 2019

बीती रात का गीत

अनुबंधों का रूप तुम्हारा
रात नहीं सोता होगा
प्राणों के हर दरवाजे पर
मेरे मन का तोता होगा-------

आँखों का परिचय सब
आँगन देहरी बांध गया
पकड़े अहसासों की उंगली
मरुथल पूरा लांघ गया

नदी किनारे बैठकर
प्यासा पंछी रोता होगा------

प्रतिबिम्बों के लिये विनत हो
छत से उतर गया
नाखूनों के पॊर सामने
दर्पण कुतर गया

सांस हारती बाजी कैसे
तह वाला गोता होगा-------

"ज्योति खरे"

शनिवार, दिसंबर 29, 2018

आसमानी ऊनी शाल

सम्हाल कर रखा है
तुम्हारे वादों का
दिया हुआ
ब्राउन रंग का मफलर
बांध लेता हूँ
जब कभी
कान में फुसफुसाकर
कहती है ठंड
कि, आज बहुत ठंड है

इन दिनों
गिर रही है बर्फ
दौड़ रही है शीत लहर
जानता हूँ
तुम्हारी तासीर
बहुत गरम है
पर
मेरी ठंडी यादों को
गर्माहट देना
ओढ़ लेना
मेरा दिया हुआ
ऊनी आसमानी शाल

पारा पिघलकर
बहने लगेगा......

"ज्योति खरे"

गुरुवार, दिसंबर 13, 2018

धूप में

धूप में
कुछ देर
मेरे पास भी बैठ लो
पहले जैसे

जब खनकती चूड़ियों में
समाया रहता था इंद्रधनुष
मौन हो जाती थी पायल
और तुम
अपनी हथेली में
मेरी हथेली को रख
बोने लगती थी
प्रेम के बीज

धूप में
अब जब भी बैठती हो मेरे पास
छीलती हो मटर
तोड़ती हो मैथी की भाजी
या किसती हो गाजर

मौजूदा जीवन में
खुरदुरा हो गया है
तुम्हारा प्रेम
और मेरे प्रेम में लग गयी है
फफूंद

सुनो
अपनी अपनी स्मृतियों को
बांह में भरकर
रजाई ओढ़कर सोते हैं
शायद
बोया हुआ प्रेम का बीज
सुबह अंकुरित मिले -----

"ज्योति खरे"

शनिवार, जून 16, 2018

ईद मुबारक


सुबह से
इन्तजार है
तुम्हारे मोगरे जैसे खिले चेहरे को
करीब से देखूं
ईद मुबारक कह दूँ
पर तुम
शीरखुरमा, मीठी सिवईयाँ
बांटने में लगी हो

मालूम है
सबसे बाद में
मेरे घर आओगी
दिनभर की थकान उतारोगी
बताओगी
किसने कितनी ईदी दी

तुम
बिंदी नहीं लगाती
पर मैं
इस ईद में
तुम्हारे माथे पर
गुलाब की पंखुड़ी
लगाना चाहता हूं

मुझे नहीं मालूम
तुम इसे
प्रेम भरा बोसा समझोगी
या गुलाब की सुगंध का
आत्मीय अहसास
या ईदी

अब जो भी हो
प्रेम तो जिन्दा रखना है
अपन दोनों को ----

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, दिसंबर 15, 2017

प्रेम का पुनः अंकुरण

कुछ देर
मेरे पास भी बैठ लो
धूप में
पहले जैसे

जब खनकती चूड़ियों में
समाया रहता था इंद्रधनुष
मौन हो जाती थी पायल
और तुम
अपनी हथेली में
मेरी हथेली को रख
बोने लगती थी
प्रेम के बीज

अब जब भी बैठती हो मेरे पास
धूप में
छीलती हो मटर
तोड़ती हो मैथी की भाजी
या किसती हो गाजर

मौजूदा जीवन में
खुरदुरा हो गया है
तुम्हारा प्रेम
और मेरे प्रेम में लग गयी है
फफूंद

सुनो
अपनी अपनी स्मृतियों को
बांह में भरकर सोते हैं
शायद
बोया हुआ प्रेम का बीज
सुबह अंकुरित मिले -----

"ज्योति खरे"