शनिवार, अप्रैल 03, 2021

प्रेम के गणित में

प्रेम के गणित में
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गांव के
इकलौते 
तालाब के किनारे बैठकर
जब तुम मेरा नाम लेकर
फेंकते थे कंकड़
पानी की हिलोरों के संग
डूब जाया करती थी 
मैं
बहुत गहरे तक
तुम्हारे साथ
तुम्हारे भीतर ----

सहेजकर रखे 
खतों को पढ़कर
हिसाब-किताब करते समय
कहते थे
तुम्हारी तरह
चंदन से महकते हैं
तुम्हारे शब्द ----

आज जब
यथार्थ की जमीन पर
ध्यान की मुद्रा में 
बैठती हूं तो
शून्य में
लापता हो जाते हैं
प्रेम के सारे अहसास

प्रेम के गणित में
कितने कमजोर थे 
अपन दोनों ----

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, मार्च 26, 2021

वृद्धाश्रम में होली

वृद्धाश्रम में होली
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बूढ़े दरख्तों में
अपने पांव में खड़े रहने की 
जब तक ताकत थी
टहनियों में भरकर रंग
चमकाते रहे पत्तियां और फूल
मौसम के मक्कार रवैयों ने
जब से टहनियों को
तोड़ना शुरू किया है
समय रंगहीन हो गया

रंगहीन होते इस समय में
सुख के चमकीले रंगों से
डरे बूढ़े दरख़्त
कटने की पीड़ा को 
मुठ्ठी में बांधें
टहलते रहते हैं
वृद्धाश्रम की
सुखी घास पर

इसबार
बूढ़े दरख्तों के चिपके गालों पर
चिंतित माथों पर
लगाना है गुलाल
खिलाना है स्नेह से पगी खुरमी
मुस्कान से भरी गुझिया 

एक दिन
हमें भी बूढ़े होना है---

"ज्योति खरे"

रविवार, मार्च 21, 2021

मैं टेसू हूं

टेसू 
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काटने की मुहिम की
पहली कुल्हाड़ी
गर्दन पर पड़ते ही
मैं कटने की 
बैचेनियों को समेटकर
फिर से हरा होकर
देता हूं चटक फूलों को 
जन्म 
गर्म हवाओं से 
जूझने की ताकत 

सूख रहीं डगालों से गिरकर
चूमता हूं
उस जमीन को 
जिस पर में अंकुरित हुआ
और पेड़ बनने की
जिद में बढ़ता रहा
इसमें शामिल है
अपने रुतबे को बचाए रखना

फागुन में
पी कर 
महुए की दो घूंट 
बेधड़क झूमता,घूमता हूं
बस्तियों में
छिड़कता हूं
पक्के रंग का उन्माद

मेरी देह से तोड़कर
हरे पत्तों से
बनाएं जाते हैं दोना-पत्तल 
जिन्हें बाजार में बेचकर
गरीबों का घर चलता है

मेरे हरे रहने का यही राज है---

"ज्योति खरे"

गुरुवार, मार्च 18, 2021

प्रेम से परिचय

प्रेम से परिचय
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धूल और धुंध के 
थपेड़ों से बचती  
किसी सुनसान 
जगह पर बैठकर
खोलकर स्मृतियों की गठरी
देखना चाहती हूं
पुराने परिचित खूबसूरत दिन

जब उन दिनों 
धूप में चेहरा नहीं ढांकती थी
ठंड में स्वेटर नहीं पहनती थी
भींगने से बचने 
बरसात में छाता नहीं ले जाती थी
 
यह वे दिन थे,जब
वह छुप कर देखता भर नहीं था
भेजता था कागज में लिखकर सपनें
जिन्हें देखकर
मैं जीती रहूं 

उन दिनों,मैं
अल्हड़पन के नखरों में डूबी
इतराया करती थी
मचलकर गिर जाया करती थी
पिघलती मोम की तरह

प्रेम के जादुई करिश्में से
अपरचित थी
एक दिन उस अजनबी ने कहा
मैं,तुम्हारा
प्रेम से परिचय करवाना  चाहता हूं
मजनूं की दीवानगी 
और फ़रहाद की आवारगी से
मिलवाना चाहता हूं
वह कहता रहा
तुममें लैला का दिल है
शीरी का मन है
और तुम्हारे पास
प्रेम करने की अदाएं भी
उन्हीं जैसी हैं

वह चला गया
फिर कभी नहीं लौटा नहीं

मैं आज तक 
उस दीवाने का 
उस आवारा का
इंतजार कर रहीं हूँ
जिसमें मजनू जैसा दिल हो
फ़रहाद जैसा मन हो

मुझे मालूम है
प्रेम के वास्तविक रंगों से
परिचय करवाने 
वह अजनबी जरूर आएगा
जब तक 
इंतजार के खूबसूरत
दिनों में
खुद को संवार लेती हूं----

"ज्योति खरे"

शनिवार, मार्च 06, 2021

लड़कियां

लड़कियां
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फुटपाथ पर
बेचती है
पालक,मैथी और लाल भाजी
यह वह 
अपनी जमीन के 
छोटे से टुकड़े में बोती है
उसके पास ही 
बेचती है एक लड़की
अदरक,लहसुन और हरी मिर्च
यह वह आढ़त से खरीदती है
दोनों 
अपनी अपनी साइकिलों में
बोरियां बांधकर
पास के गांव से आती हैं

शाम को दुकान समेटने के बाद
खरीदती हैं
घर के लिए 
जरूरत का सामान

दोनों
घर पहुंचने के पहले
एक जगह खड़े होकर
बांटती हैं
अपने अपने दुख

कल मिलने का वादा कर
लौट आती हैं
अपने अपने घर 

सुबह 
फिर मिलती हैं
आती हैं बाजार
संघर्षों के गाल पर
चांटा मारने----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, मार्च 04, 2021

फूल

फूल
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मैं 
किसकी जमीन पर 
अंकुरित हुआ
किस रंग में खिला 
कौन से धर्म का हूं
क्या जात है मेरी
किस नाम से पुकारा जाता हूं 
मुझे नहीं मालूम

मुझे तो सिर्फ इतना मालूम है
कि,छोटी सी क्यारी में 
खिला एक फूल हूं 
जिसे तोड़कर 
अपने हिसाब से 
इस्तेमाल करने के बाद
कचरे के ढेर में 
फेंक दिया जाता है----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, फ़रवरी 25, 2021

बूढ़ी महिलाएं

बूढ़ी महिलाएं
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अपनी जवानी को 
गृहस्थी के 
हवन कुंड में तपाकर
सुनहरे रंग की हो चुकी
बूढ़ी महिलाएं
अपने अपने घरों से निकलकर
इकठ्ठी हो गयी हैं

गुस्से से भरी
ये बूढ़ी महिलाएं
कह रहीं हैं
जमीन से उठती
संवेदनाओं पर
ड़ाली जा रही है मिट्टी

अब हम 
जीवन भर साध के रखी 
अपनी चुप्पियों को 
तोड़ रहें हैं
डाली जा रही 
मिट्टी को हटाकर
आने वाले समय के लिए
रास्ता बना रहे हैं--

"ज्योति खरे"