शुक्रवार, जुलाई 24, 2020

चाय पीते समय

चाय पीते समय
*************
सुबह के कामों से फुरसत होकर अकेला बैठा एक कप काली चाय पी रहां हूं. इस तरह का अकेलापन  60 साल के बाद ही आता है,ऐसे समय में मष्तिष्क क्षमता से अधिक काम करता है, बीते हुए दिन नये दिनों से टकराते हैं औऱ हम क्या क्या सोचने समझने लगते हैं.
समझ आता है कि कौन अपना है कौन पराया है, किसने कब कितना अपमान किया, किसने कब अपना समझा, हम हमेशा सही होकर भी गलत ठहराए गए,उस समय हमने विरोध भी किया औऱ मौन रहने की हिम्मत भी जुटाई, खूब डांट डपट खाई अब सोचते हैं सही किया, अपने विरोध के जब मायने बदलने लगे और इसे सिरे से खारिज किया जाने लगे तो समझ जाना चाहिए कि कोई आपको समझ ही नहीं रहा,जीवन में यदि सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करना हो तो कभी कभी मौन होना पड़ता है, यह मौन हमें आंतरिक ताकत देता है और हम नकारात्मक ऊर्जा से बचे रहते हैं, जो ऊर्जा हमने मौन रहकर,सहकर बचाई थी वह अब काम आ रही है, अच्छा लिखना,अच्छा पढ़ना, जीवन का मनोहारी संगीत सुनना अब अच्छा लगता है,उन दिनोँ के संघर्षों से गुजरते समय जो मित्र साथ थे या नही थे उनको अब याद करना पड़ता है.
आज हम चेतना की सतह पर खड़े होकर सुबह सुबह सूरज की पहली किरण का स्वागत करते हैं.अतीत हमारा सबसे ताकतवर मित्र होता है,यही हमारे चेतन मन को शक्तिशाली बनाता है, जिसके बल पर हम अब जीवन जीने की कला और संघर्षों से लड़ने की तमीज सीख पाएं है.                                   हम कठिन समय के दौर से गुजर रहें हैं,यह दौर जीवन मूल्यों को समझने,जात पांत,धर्म,को एक करने का दौर है,राजनीति से परे आत्मचिंतन का दौर है, बुजुर्ग पीढ़ी को सम्हालने औऱ नयी पीढ़ी को अच्छे संस्कार देने का दौर है
अरे चाय पीना तो भूल ही गया खैर चाय तो फिर पी जा सकती हैं पर इस तरह के विचार बहुत मुश्किल से पनपते है.
दौर पतझड़ का सही
उम्मीद तो हरी है--

"ज्योति खरे"

गुरुवार, जुलाई 02, 2020

कोहरे के बाद धूप निकलेगी

लघु कथा
********
कोहरे के बाद धूप निकलेगी
**********************
सिवनी जाने वाली बस अपने निर्धारित समय से बीस मिनट पहले
ही दीनदयाल बस स्टेंड में लग गयी.
यात्री अपनी अपनी सीटों पर बैठने के लिए चढ़ने लगे, मैं भी अपनी सीट पर जाकर बैठ गया, कुछ देर बाद बस कोलतार की सड़क पर दौड़ने लगी. 
स्वाति से मेरी पहली मुलाकात बस में ही हुई थी, वह बालाघाट जा रही थी और मैं छिंदवाड़ा, बातों का सिलसिला चला उसने बताया कि मेरे पति कालेज में प्रोफेसर हैं, मैं उन्हें सर कहती हूं, पिछले साल ही हमारी शादी हुई है.
बातों के कई दौर चले और हम दोंनो फेसबुक मित्र भी बन गये मोबाइल नम्बरों का आदान प्रदान भी हो गया.
वह सिवनी उतर गयी क्योंकि उसे दूसरी बस पकड़कर बालाघाट जाना था, मैं छिंदवाड़ा पहुंच गया.

कई दिनों तक स्वाति की याद बनी रही उसकी सुंदर छवि आंखों के सामने तैरती रही, फेसबुक में एक दूसरों की पोस्टों में लाईक कमेंटस होते रहे और कभी कभार फोन पर भी बातें हो जाया करती, वह जब भी बात करती, मुझे उसकी हंसी बहुत अच्छी लगती थी,वह कहती आप मेरे अच्छे दोस्त हो ऐसे ही बात कर लिया करो, एक बार तो उसने सर से भी बात करवा दी
"क्या जादू किया है भाई आपने मेरी बीवी पर आपकी बहुत तारीफ करती है.

समय कब कैसे जीवन को बदलता है कोई नहीं जानता और न ही कोई समझ पाता है.
मैं कंम्पनी की तरफ से एक माह की ट्रेनिंग में हैदराबाद चला गया और वह अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गयी.

एक दिन सुबह से ही स्वाति की याद आती रही , आफिस में भी उसे लेकर मन उचाट रहा आखिरकार लंच टाईम में उसे फोन लगा ही लिया.
फोन किसी पुरुष ने रिसीव किया
मैंनें कहा "स्वाति से बात करना है"
पुरुष ने भर्रायी आवाज में कहा
" वह बात नहीं कर सकती है, आज उसके पति का गंगा पूजन है" और उसने फोन काट दिया. 
 उस दिन अपने ऊपर ही क्रोध आता रहा कि मैंने इस बीच उससे बात क्योंं नहीं कि कितना लापरवाह था मैं, लगभग एक माह बाद हिम्मत जुटाकर उससे फोन पर माफी मांगी, उसने इस शर्त पर माफ किया कि मुझसे मिलने आओ तुमसे बात करके मेरे दुख हल्के हो जायेंगे
और मैं दूसरे ही दिन बस में बैठा गया.

बस सिवनी बस स्टेंड में रुकी, उतरकर एक कप चाय पी और कुछ देर बाद बालाघाट वाली बस में बैठ गया.
वह अंतिम रात कैसी रही होगी जब स्वाति सर के पास मौन बैठी होगी
सर जितना बोले होंगे उसमें गहरे अर्थ छिपे होंगे, मौन मैं ही बहुत सारी बातें हुई होंगी,क्योंकि मौन आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम होता है, सर के पास स्वाति की मौजूदगी और मृत्यु की निकटता होगी इस कशमकश में बहुत कुछ घटा होगा, सर ने स्वाति के आंसुओं को पोछने की कोशिश भी की होगी, स्वयं की लाचारी, मृत्यु का भय और स्वाति का भविष्य आंखों के सामने टूटकर बिखर रहे होंगे, सर बहुत समझाना चाह रहे होंगे पर रुंधे कंठ से आवाज़ कहां निकलती है.
उस रात स्वाति सर की मृत देह से लिपटकर बहुत देर तक रोती रही होगी.
पास में बैठे सज्जन ने मुझे हिलाया और कहा " भाई जी बालाघाट आ गया"
मैंने वर्तमान की उंगली पकड़ी और बस से उतर गया.
पास ही खड़े रिक्शे में बैठा और कहा पुराना पुलिस थाना चलो, पता पूंछते पूंछते उसके दरवाजे के सामने खड़ा हो गया,
दरवाजा खटखटाया, स्वाति ने दरवाजा खोला उसे देखकर दुख हुआ, सुंदर, गोरी, मुटदरी सी स्वाति दुबली और काली लग रही है.
वह मुझे देखते ही कहने लगी
" आ गये आभासी दुनियां के मित्र हो न इसिलिए इतने दिनों बाद याद किया"
ऐसा नहीं है, मैंने उसकी हथेलियों को अपनी हथेलियों में रखा और जोर से दबाकर कहा
अब कोहरे के बाद धुप निकलेगी.

"ज्योति खरे"