शनिवार, जुलाई 14, 2012
शुक्रवार, जुलाई 13, 2012
रविवार, जुलाई 01, 2012
खुश रहो कहकर चला...
खुश रहो कहकर चला
जानता हूँ उसने छला.............
सूरज दोस्त था उसका
तेज गर्मी से जला...............
चांदनी रात भर बरसी
बर्फ की तरह गला................
उम्र भर सीखा सलीका
फटे नोट की तरह चला..........
रोटियों के प्रश्न पर
उम्र भर जूता चला.............
सम्मान का भूखा रहा
भुखमरी के घर पला............
"ज्योति"
शुक्रवार, जून 29, 2012
बुधवार, जून 27, 2012
संत
संत
यह बिलकुल सही है कि
संतो कि वाणी सुनकर
संतो का जीवन देखकर
संतो का सुख देखकर
साधारण आदमी भी
संत बनना चाहता है ...........
सरल है संत बनना
भगवा वस्त्र पहनना
चन्दन का टीका लगाना
शब्द जाल में
भक्तो को उलझाना
संत बनने के लिए
बिलकुल जरुरी नहीं है जानना
हिमालय क्यों पिघल रहा है
सूख रही है क्यों नदिया
युद्ध के क्या होंगे परिणाम
संत तो बस
हर तरफ से आंखे मूंदकर
जीवन में भक्ति भाव का
पाठ पढाता है
संत के लिए
यह जानना भी जरुरी नहीं है
क्या होता है
किराये के मकान का दुख
पत्नी की प्रसव पीड़ा
बच्चे का स्कूल मे दाखिला
प्रतियोगिता के इस दौर में
खुद से खुद का संघर्ष
सच तो यह है की
संत
गृहस्थी के लफड़े से भागा हुआ
गैर दुनियादार आदमी होता है ............
'ज्योति खरे '
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