गुरुवार, जनवरी 24, 2013
बुधवार, जनवरी 23, 2013
सिसकियां रोकने घर की-------
तुम्हे देखने की जिद में
जोड़ता रहा कांच के टुकड़े
पागलों की भीड़ में
एक और पागल जुड़ गया-------
लेकर चले थे मशाल
मुट्ठी में रखने मंजिल
सिसकियां रोकने घर की
जुलूस उस तरफ मुड़ गया-------
बो रहे हैं फुटपात पर
प्रेम की संभावना
फल पेड़ पर फला
चौराहों पर निचुड़ गया--------
रखा था खरीदकर अपनों को
मंहगी अलमारी में
जरुरत पर खोलकर देखा
सूख कर सिकुड़ गया--------
"ज्योति खरे"
जोड़ता रहा कांच के टुकड़े
पागलों की भीड़ में
एक और पागल जुड़ गया-------
लेकर चले थे मशाल
मुट्ठी में रखने मंजिल
सिसकियां रोकने घर की
जुलूस उस तरफ मुड़ गया-------
बो रहे हैं फुटपात पर
प्रेम की संभावना
फल पेड़ पर फला
चौराहों पर निचुड़ गया--------
रखा था खरीदकर अपनों को
मंहगी अलमारी में
जरुरत पर खोलकर देखा
सूख कर सिकुड़ गया--------
"ज्योति खरे"
गुरुवार, जनवरी 17, 2013
गंगा तुम भी पवित्र हो जाओ--------
गंगा की छाती पर
भर गया महाकुंभ
महाकुंभ में बस गई
कई कई बस्तियां
बस्तियों में जुट रही हस्तियां------
वह जो उजाड़ते आये हैं
निरंतर,लगातार,हरदम
कई कई अधबनी बस्तियां
बस चुकी बस्तियां
बसने को आतुर बस्तियां---------
अरकाटीपन,बनावटीपन
चिन्तक की चिंता
तरह तरह के गुरु मंत्र
टांग दी गयी हैं
छलकपट की दुकानों पर
आध्यात्म की तख्तियां-------
हिमालय की कंदराओं से निकलकर
आ गये हैं नागा बाबा
देह पर जमी हुई
दीमक छुड़ाने
चमकने लगे हैं
जंग लगे हथियार अखाड़ों में-------
जारी है
पवित्र होने का संघर्ष-------
गंगा
बहा रही है अपने भीतर
पूजा के सूखे फूल
जले हुये मनुष्य की
अधजली अस्थियां
कचड़ा,गंदगी
थक गयी है
पापियों के पाप धोते-धोते------
कर्ज की गठरी में बंधा
खिचड़ी,तिल,चेवडा
बह रहा है गंगा में
चुपड़ा जा रहा है
उन्नत ललाट पर
नकली चंदन
संतों की भीड़ में लुट रही है
आम आदमी की अस्मिता-------
गंगा
पापियों के पाप नहीं
पापियों को बहा ले जाओ
एकाध बार अपने में ही डूबकर
स्वयं पवित्र हो जाओ----------
"ज्योति खरे"
भर गया महाकुंभ
महाकुंभ में बस गई
कई कई बस्तियां
बस्तियों में जुट रही हस्तियां------
वह जो उजाड़ते आये हैं
निरंतर,लगातार,हरदम
कई कई अधबनी बस्तियां
बस चुकी बस्तियां
बसने को आतुर बस्तियां---------
अरकाटीपन,बनावटीपन
चिन्तक की चिंता
तरह तरह के गुरु मंत्र
टांग दी गयी हैं
छलकपट की दुकानों पर
आध्यात्म की तख्तियां-------
हिमालय की कंदराओं से निकलकर
आ गये हैं नागा बाबा
देह पर जमी हुई
दीमक छुड़ाने
चमकने लगे हैं
जंग लगे हथियार अखाड़ों में-------
जारी है
पवित्र होने का संघर्ष-------
गंगा
बहा रही है अपने भीतर
पूजा के सूखे फूल
जले हुये मनुष्य की
अधजली अस्थियां
कचड़ा,गंदगी
थक गयी है
पापियों के पाप धोते-धोते------
कर्ज की गठरी में बंधा
खिचड़ी,तिल,चेवडा
बह रहा है गंगा में
चुपड़ा जा रहा है
उन्नत ललाट पर
नकली चंदन
संतों की भीड़ में लुट रही है
आम आदमी की अस्मिता-------
गंगा
पापियों के पाप नहीं
पापियों को बहा ले जाओ
एकाध बार अपने में ही डूबकर
स्वयं पवित्र हो जाओ----------
"ज्योति खरे"
गुरुवार, जनवरी 10, 2013
------गुस्सा हैं अम्मा--------
नहीं जलाया कंडे का अलाव
नहीं बनाया गक्कड़ भरता
नहीं बनाये मैथी के लड्डू
नहीं बनाई गुड़ की पट्टी
अम्मा ने इस बार-----
कड़कड़ाती ठंड में भी
नहीं रखी खटिया के पास
आगी की गुरसी
अम्मा ने इस बार------
नहीं गाये
रजाई में दुबककर
खनकदार हंसी के साथ
लोकगीत
नहीं जा रही जल चढाने
खेरमाई
नहीं पढ़ रही
रामचरित मानस-----
जब कभी गुस्सा होती थी अम्मा
छिड़क देती थीं पिताजी को
ठीक उसी तरह
छिड़क रहीं हैं मुझे
अम्मा इस बार-------
मोतियाबिंद वाली आंखों से
टपकते पानी के बावजूद
बस पढ़ रहीं हैं प्रतिदिन
घंटों अखबार
अम्मा इस बार------
दिनभर बड़बड़ाती हैं
अलाव जैसा जल रहा है जीवन
भरते के भटे जैसी
भुंज रही है अस्मिता
जमीन की सतहों से
उठ रही लहरों पर
लिख रही है संवेदनायें
घर घर मातम-----
रोते हुये गुस्से में
कह रहीं हैं अम्मा
यह मेरी त्रासदी है
कि
मैने पुरुष को जन्म दिया
वह जानवर बन गया-------
नहीं खाऊँगी
तुम्हारे हाथ से दवाई
नहीं पियूंगी
तुम्हारे हाथ का पानी
तुम मर गये हो
मेरे लिये
इस बार,हर बार---------
"ज्योति खरे"
(उंगलियां कांपती क्यों हैं-------से)
बुधवार, जनवरी 09, 2013
धुंधलाई यादों से बिसर गये हैं लोग--------
शराफत की ठंड से सिहर गये हैं लोग
दुश्मनी की आंच से बिखर गये हैं लोग------
जिनके चेहरों पर धब्बों की भरमार है
आईना देखते ही निखर गये हैं लोग--------
छुटपन का गाँव अब जिला कहलाता है
धुंधलाई यादों से बिसर गये हैं लोग--------
वो फिरौती की वजह से उम्दा बने
साजिशों के सफ़र से जिधर गये हैं लोग--------
दहशत के माहौल में दरवाजे नहीं खुलते
अपने ही घरों से किधर गये हैं लोग---------
"ज्योति खरे"
दुश्मनी की आंच से बिखर गये हैं लोग------
जिनके चेहरों पर धब्बों की भरमार है
आईना देखते ही निखर गये हैं लोग--------
छुटपन का गाँव अब जिला कहलाता है
धुंधलाई यादों से बिसर गये हैं लोग--------
वो फिरौती की वजह से उम्दा बने
साजिशों के सफ़र से जिधर गये हैं लोग--------
दहशत के माहौल में दरवाजे नहीं खुलते
अपने ही घरों से किधर गये हैं लोग---------
"ज्योति खरे"
सोमवार, जनवरी 07, 2013
ब से भारत-----ब से बाबा बाबाओं के लिये----------
यह बिलकुल सही है कि
बाबाओं की वाणी सुनकर
बाबाओं का जीवन देखकर
बाबाओं का सुख देखकर
साधारण आदमी भी
बाबा बनना चाहता है ...........
सरल है बाबा बनना
भगवा वस्त्र पहनना
चन्दन का टीका लगाना
शब्द जाल में
भक्तो को उलझाना
बाबा बनने के लिए
बिलकुल जरुरी नहीं है जानना
हिमालय क्यों पिघल रहा है
सूख रही है क्यों नदिया
युद्ध के क्या होंगे परिणाम
मनुष्य को पेट भर खाना मिल रहा है की नहीं
बाबा
बाबा
हर तरफ से आंखे मूंदकर
जीवन में भक्ति भाव का
पाठ पढाता है
बाबा के लिए
यह जानना भी जरुरी नहीं है
क्या होता है
किराये के मकान का दुख
पत्नी की प्रसव पीड़ा
लड़कियों से सड़कों में छेड़-छाड़
नारी की अस्मिता
लड़कियों से सड़कों में छेड़-छाड़
नारी की अस्मिता
बच्चे का स्कूल मे दाखिला
प्रतियोगिता के इस दौर में
खुद से खुद का संघर्ष
सच तो यह है कि
बाबा
बाबा
गृहस्थी के लफड़े से
भागा हुआ
भागा हुआ
गैर दुनियादार आदमी होता है ............
"'ज्योति खरे" '
बुधवार, जनवरी 02, 2013
अनुबंधों का रूप तुम्हारा---------
अनुबंधों का रूप तुम्हारा
रात नहीं सोता होगा
प्राणों के हर दरवाजे पर
मेरे मन का तोता होगा-------
आँखों का परिचय सब
आँगन देहरी बांध गया
पकड़े अहसासों की उंगली
मरुथल पूरा लांघ गया
नदी किनारे बैठकर
प्यासा पंछी रोता होगा------
प्रतिबिम्बों के लिये विनत हो
छत से उतर गया
नाखूनों के पॊर सामने
दर्पण कुतर गया
सांस हारती बाजी कैसे
तह वाला गोता होगा-------
"ज्योति खरे"
(उंगलियां कांपती क्यों हैं -------से)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)







