गुरुवार, मार्च 28, 2013
मंगलवार, मार्च 26, 2013
रविवार, मार्च 24, 2013
यार फागुन------
यार फागुन
सालभर में एक बार
दबे पांव आते हो
खोलकर प्रेम के रहस्यों को
चले जाते हो------
यार फागुन
तुम तो केवल
रंगों की बात करते हो
प्यार के मनुहार की बात करते हो
शहर की
संकरी गलियों में झांकों
मासूमों का
कतरा कतरा बहता मिलेगा
झोपड़ पट्टी में
कुछ दिन गुजारो
बच्चों के फटे कपड़ों का
टुकड़ा ही मिलेगा-----
यार फागुन
जहां रोटियां की कमी है
वहां
रोटियां परोसो
गुझिया के चक्कर में
रोटियां न छीनों
एक चुटकी गुलाल
मजदूर के गाल पर मलो
अपनों को रंगों-------
यार फागुन
गुस्सा मत होना
अपना समझता हूं
अपना ही समझना---------
"ज्योति खरे"
सालभर में एक बार
दबे पांव आते हो
खोलकर प्रेम के रहस्यों को
चले जाते हो------
यार फागुन
तुम तो केवल
रंगों की बात करते हो
प्यार के मनुहार की बात करते हो
शहर की
संकरी गलियों में झांकों
मासूमों का
कतरा कतरा बहता मिलेगा
झोपड़ पट्टी में
कुछ दिन गुजारो
बच्चों के फटे कपड़ों का
टुकड़ा ही मिलेगा-----
यार फागुन
जहां रोटियां की कमी है
वहां
रोटियां परोसो
गुझिया के चक्कर में
रोटियां न छीनों
एक चुटकी गुलाल
मजदूर के गाल पर मलो
अपनों को रंगों-------
यार फागुन
गुस्सा मत होना
अपना समझता हूं
अपना ही समझना---------
"ज्योति खरे"
बुधवार, मार्च 20, 2013
चिडिया-----
फुदक फुदक
आँगन में आकर
सामूहिक चहचहाती
अन्नपूर्णा का भजन सुनाती
दाना चुगती
फुर्र हो जाती---
धूप चटकती तब
तिनके तिनके जोड़ जोड़ कर
घर के कोने में
घोंसला बनाती
जन्मती
नन्ही चहचहाहट
देखकर आईने में
चोंच मारती
थक जाती तो
फुर्र हो जाती-----
समझ गयी जब से तुम
आँगन आँगन
जाल बिछे हैं
हर घर में
हथियार रखे हैं
फुदक फुदक कर
अब नहीं आती
टुकुर मुकुर बस देखा करती
फुर्र हो जाती------
एक निवेदन चिड़िया रानी
लौट आओ अब
घर आँगन
नये सिरे से
खोलो द्वार
चहको और चहकाओ-------
"ज्योति खरे"
सोमवार, मार्च 18, 2013
टेसू--------
समेटकर बैचेनियां
फागुन की
दहक गया टेसू
दो घूंट पीकर
महुये की
बहक गया टेसू------
सुर्ख सूरज को
चिढ़ाता खिलखिलाता
प्रेम की दीवानगी का
रूतबा बताता
चूमकर धरती का माथा
चमक गया टेसू------
गुटक कर भांग का गोला
झूमता मस्ती में
छिड़कता प्यार का उन्माद
बस्ती बस्ती में
लालिमा की ओढ़ चुनरी
चहक गया टेसू------
जीवन के बियावान में
पलता रहा
पत्तलों की शक्ल में
ढ़लता रहा
आंसुओं के फूल बनकर
टपक गया टेसू-------
"ज्योति खरे"
बुधवार, मार्च 13, 2013
जान लौट आयेगी-------
सींचकर आंख की नमी से
रखती है तरोताजा
अपने रंगीन फूल
संवारती है
टूटे आईने में देखकर
कई कई आंखों से
खरोंचा गया चेहरा
जानती है
सुंदर फूल
खिले ही अच्छे लगते हैं
मंदिर की सीढियां
उतरते चढ़ते
मनोकामनाओं की फूंक मारते
प्रेम के पत्तों में लपेटकर
बेच देती है
अपने फूल
भरती है राहत की सांस
चढ़ा देती है
बचा हुआ आखिरी फूल
कि शायद कोई देवता
चुन ले
कांटों में खिला फूल
खींच दे हाथ में
सुगंधित प्यार की लकीर
मुरझाये फूल में
जान लौट आयेगी-------
"ज्योति खरे"
रविवार, मार्च 10, 2013
वाह भोले वाह------------
गजब का जलवा है तुम्हारा
डंके की चोट पर
गली गली
स्थापित कर के रखे हो
अपना लिंग
और गुंडागर्दी तो देखो
दूध,दही,शहद से नहलाओ
फल फूल चढाओ
कोमल अखंडित
तीन पत्ती वाली
बेलपत्री रखो
तब मिलेगा पीने
चरणामृत
मजाल है कोई कर दे
तुम्हारे सामने नंगई
ना बांधे कोई भक्त
विरोध शमन का
रक्षासूत्र
कुचारवा देते हो
नंदियों से
कमाल के गोटीबाज हो
हड़का कर रखते हो
भक्तों को
वाह भोले वाह--------
"ज्योति खरे"
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