शुक्रवार, जुलाई 12, 2013
शुक्रवार, जून 28, 2013
जीवन बचा हुआ है अभी---------
जीवन बचा हुआ है अभी
दाई से क्या पेट छुपाना
"ज्योति खरे"
चित्र---
गूगल से साभार
शुक्रवार, जून 14, 2013
पापा ---------
पापा अब
केवल बातें करते हैं सपनों में-------
मौन साधना साधे अम्मा
मंदिर जाती सुबह सुबह
आँगन की उधड़ी यादों को
लीपा करती जगह जगह
पापा अब
दिखते सिर्फ अलबम के पन्नों में-------
सूख रहे गमले के पौधे
मांग रहे पानी पानी
अंधियारे में आंख ढूढ़ती
आले की सुरमेदानी
पापा अब
बूंद आँख की बदली झरनों में--------
उथले जीवन के बहाव में
डूब गयी रिश्तों की कश्ती
घर के भीतर बसती जाती
अलग हुये चूल्हों की बस्ती
पापा अब
नहीं रहा अपनापन अपनों में
पापा से
हमने कल बातें की सपनों में---------
"ज्योति खरे"
चित्र--
"पापा" एल्बम के पन्ने से
मंगलवार, जून 04, 2013
गुलमोहर------
माना कि तुम्हारे आँगन में
जूही,चमेली,रातरानी
महकती होगी
पर तुम अपने आँगन में
बस
एक गुलमोहर लगा लो
सौन्दर्य का जादू जमा लो-------
दोपहर की धूप में भी देहकर
खिलता,फूलता है
गुलमोहर
देता है छांव------
तपती जेठ की दोपहरी में
जब कोई खटखटाता है
तुम्हारा दरवाजा
"वातानुकूलित"कमरे से निकलकर
इस तपते समय में
तुम्हे और तुम्हारे आगंतुक को
गुलमोहर देगा छांव-------
लाल सुबह के रंग लिये
गुलमोहर के फूल
आत्मिक सौन्दर्य के धनी होकर भी
सुगंध से परे रहते हैं
शान से खिलते हैं-------
धूप से जूझते हैं
तब-----!
जब-----!
तुम्हारे "इनडोर प्लांट"
तपे हुये बंगले की दीवारों के बीच
प्यार भरे सहलाव,अपनत्व में भी
कायम नहीं रह पाते
तुम्हारे ही तरह
"सुविधाजीवि"हैं
तुम्हारे पौधे और फूल--------
तुम गुलमोहर हो सकते हो
किसी आतप से झुलसे जीवन के लिये
छांव दे सकते हो
किसी जलते मन को
प्रेम को-----
तुम्हे बाजार मिल जायेगा
सुगंध का
सुविधा से
तुम जूही,चमेली,गुलाब का
सुगंधित अहसास खरीद सकती हो
पर
गुलमोहर की छांव
नहीं मिलती बाजार में
नहीं बनता इसका "सेंट"
यह तो बस खिलता है
सौन्दर्य की सुगंध भरता है
आंखों से मन में,प्रेम में
जीवन में--------
तुम भी गुलमोहर हो सकते हो
बस
अपने आंगन में
एक गुलमोहर लगा लो
सौन्दर्य का जादू जमा लो------------
"ज्योति खरे"
जूही,चमेली,रातरानी
महकती होगी
पर तुम अपने आँगन में
बस
एक गुलमोहर लगा लो
सौन्दर्य का जादू जमा लो-------
दोपहर की धूप में भी देहकर
खिलता,फूलता है
गुलमोहर
देता है छांव------
तपती जेठ की दोपहरी में
जब कोई खटखटाता है
तुम्हारा दरवाजा
"वातानुकूलित"कमरे से निकलकर
इस तपते समय में
तुम्हे और तुम्हारे आगंतुक को
गुलमोहर देगा छांव-------
लाल सुबह के रंग लिये
गुलमोहर के फूल
आत्मिक सौन्दर्य के धनी होकर भी
सुगंध से परे रहते हैं
शान से खिलते हैं-------
धूप से जूझते हैं
तब-----!
जब-----!
तुम्हारे "इनडोर प्लांट"
तपे हुये बंगले की दीवारों के बीच
प्यार भरे सहलाव,अपनत्व में भी
कायम नहीं रह पाते
तुम्हारे ही तरह
"सुविधाजीवि"हैं
तुम्हारे पौधे और फूल--------
तुम गुलमोहर हो सकते हो
किसी आतप से झुलसे जीवन के लिये
छांव दे सकते हो
किसी जलते मन को
प्रेम को-----
तुम्हे बाजार मिल जायेगा
सुगंध का
सुविधा से
तुम जूही,चमेली,गुलाब का
सुगंधित अहसास खरीद सकती हो
पर
गुलमोहर की छांव
नहीं मिलती बाजार में
नहीं बनता इसका "सेंट"
यह तो बस खिलता है
सौन्दर्य की सुगंध भरता है
आंखों से मन में,प्रेम में
जीवन में--------
तुम भी गुलमोहर हो सकते हो
बस
अपने आंगन में
एक गुलमोहर लगा लो
सौन्दर्य का जादू जमा लो------------
"ज्योति खरे"
सोमवार, मई 27, 2013
तपती गरमी जेठ मास में---
एक दोपहरी जेठ मास में
प्यास प्यार की लगी हुई
बोली अनबोली आंखें
स्मृतियों के उजले वादे
चित्र- गूगल से साभार
गुरुवार, मई 23, 2013
ओ मेरी सुबह---------
ओ मेरी सुबह
बिन बुलाये ही पहुंच जाती हो
घर-घर
बिखेर देती हो उदारता से
शुभदिन की शुभकामनायें------
बिन बुलाये ही पहुंच जाती हो
घर-घर
बिखेर देती हो उदारता से
शुभदिन की शुभकामनायें------
ओ मेरी सुबह
कहां से लाती हो
इतना उजलापन--------
"ज्योति खरे"
चित्र-गूगल से साभार
कहां से लाती हो
इतना उजलापन--------
"ज्योति खरे"
चित्र-गूगल से साभार
शुक्रवार, मई 17, 2013
बूंद------
उबलता हुआ जीवन
भाप बनकर चिपक जाता है जब
भाप बनकर चिपक जाता है जब
अपने आगोश में
फिर भटक भटक कर
देखकर धरती की सतह पर
संत्रास की लकीरों का जादू
कलह की छाती पर
रंगों का सम्मोहन
दरकते संबंधों में
लोक कलाकारी
दहशत में पनप रहे संस्कार----
इस भारी दबाब में बरसती बारिश
बूंद बन जाती है
क्यों कि बूंद
सहनशील होती
बूंद खामोश होती है
अहसास की खुरदुरी जमीन को
चिकना करती है
बूंद में तनाव नहीं होता-----
अहसास की खुरदुरी जमीन को
चिकना करती है
बूंद में तनाव नहीं होता-----
बूंद
तृप्त कर देती है अतृप्त प्यार
सींच देती है
अपनत्व का बगीचा------
बूंद
तुम्हारे कारण ही
धरती और जीवन में जिन्दा है हरियाली-----
"ज्योति खरे"
चित्र गूगल से साभार
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