शुक्रवार, जनवरी 10, 2014
शुक्रवार, जनवरी 03, 2014
कि बाकी है --------
डूबते सूरज को
उठाकर ले आया हूं--
कि बाकी है
घुप्प अंधेरों के खिलाफ
कि बाकी है
साजिशों की
काली चादर से ढकीं
साजिशों की
धूप सा चमकना-
कि बाकी है
उजली सलवार कमीज़ पहनकर
नंगों की नंगई को
चीरते निकल जाना-
कि बाकी है
काली करतूतों की
काली किताब का
ख़ाक होना-
कि बाकी है
धरती पर
सुनहरी किरणों से
सुनहरी व्याख्या लिखना-
कि कुछ बाकी ना रहे
सूरज दिलेरी से ऊगो
आगे बढ़ो
हम सब तुम्हारे साथ हैं-
इंकलाब जिन्दाबाद
इंकलाब जिन्दाबाद -----
"ज्योति खरे"
चित्र साभार--गूगल
गुरुवार, दिसंबर 19, 2013
बेहरूपिये सो रहें हैं-------
समर्थक परजीवी हो रहें हैं
सड़क पर कोलाहल बो रहें हैं----
जश्न में डूबा समय अब मौन है
थैलियां आश्वासन की खो रहें हैं----
चौखटों के पांव पड़ते थक गऐ
भदरंगे बेहरूपिये सो रहें हैं----
घाट पर धुलने गई है व्यवस्था
आँख से बलात्कार हो रहें हैं----
"ज्योति खरे"
सोमवार, नवंबर 25, 2013
आशाओं की डिभरी ----------
कंक्रीट के जंगल में
जो दिख रहें हैं
जो दिख रहें हैं
सतरंगी खिले हुए
दर्दीले फूल
अनगिनत आंख से टपके
कतरे से खिलें हैं ---
फाड़कर चले जाते थे जो तुम
आहटों के रेशमी पर्दे
आश्वासनों कि जंग लगी सुई से
रोज ही सिले हैं---
जहरीली हवाओं से कहीं
बुझ ना जाए
आशाओं की डिभरी
चढ़ी है भावनाओं की सांकल
दरवाजे इसीलिए नहीं खुले हैं---
पवित्र तो कतई नहीं हो
मनाने चौखट पर नहीं आना
बदबूदार हो जाएगा वातावरण
बदबूदार हो जाएगा वातावरण
हमें मालूम है
कलफ किए तुम्हारे
सफ़ेद पीले कुर्ते
गंदे पानी से धुले हैं------
"ज्योति खरे"
चित्र
गूगल से साभार
शनिवार, नवंबर 02, 2013
उजाले की उजली शुभकामनाऐं-------
प्रारंभ में
एक दीपक जला
उजाला दूर दूर तक फैला
और भटकते अंधेरों से लड़ने लगा
संवेदनाओं के चंगुल में फंसा
जनमत के बाजार में
नीलाम हुआ
जूझता रहा आंधियों से
नहीं ख़त्म होने दी
अपनी,टिमटिमाहट
जूझता रहा आंधियों से
नहीं ख़त्म होने दी
अपनी,टिमटिमाहट
बारूद के फूलों की पंखुड़ियों पर
लिख रहा है
अपने होने का सच
दीपक
आज भी उजाले को
मुट्ठियों में भर भर कर
घर घर पहुंचा रहा है---
घर घर पहुंचा रहा है---
" ज्योति खरे "
मंगलवार, अक्टूबर 22, 2013
करवा चौथ का चाँद ------
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
मेरे आवारापन को
स्वीकारा था तुमने-
सूरज से चमकते गालों पर
पपड़ाए होंठों पर
रख दिये थे मैने
कई कई चाँद----
करवा चौथ का चाँद
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
विरोधों के बावजूद
ओढ़ ली थी तुमने
उधारी में खरीदी
मेरे अस्तित्व की चुन्नी--
और अब
क्यों देखती हो
प्रेम के आँगन में
खड़ी होकर
आटे की चलनी से
चाँद----
तुम्हारी मुट्ठी में कैद है
तुम्हारा अपना चाँद----
"ज्योति खरे"
चित्र -
गूगल से साभार
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
मेरे आवारापन को
स्वीकारा था तुमने-
सूरज से चमकते गालों पर
पपड़ाए होंठों पर
रख दिये थे मैने
कई कई चाँद----
करवा चौथ का चाँद
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
विरोधों के बावजूद
ओढ़ ली थी तुमने
उधारी में खरीदी
मेरे अस्तित्व की चुन्नी--
और अब
क्यों देखती हो
प्रेम के आँगन में
खड़ी होकर
आटे की चलनी से
चाँद----
तुम्हारी मुट्ठी में कैद है
तुम्हारा अपना चाँद----
"ज्योति खरे"
चित्र -
गूगल से साभार
गुरुवार, अक्टूबर 17, 2013
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