सोमवार, मई 20, 2019

नदी और पहाड़


अच्छे दोस्त हैं
नदी और पहाड़
दिनभर एक दूसरे को धकियाते
खुसुर-पुसुर बतियाते हैं

रात के गहन सन्नाटे में
दोनों
अपनी अपनी चाहतों को
सहलाते पुचकारते हैं

चाहती है नदी
पहाड़ को चूमते बहना
और पहाड़
रगड़ खाने के बाद भी
टूटना नहीं चाहता

दोनों की चाहतों में
दुनियां बचाने की
चाहते हैं------

"ज्योति खरे"

रविवार, मई 12, 2019

अम्मा कभी नहीं हुई बीमार

अम्मा
सुबह सुबह
फटा-फट नहाकर
अध-कुचियाई साड़ी लपेटकर
तुलसी चौरे पर
सूरज को प्रतिदिन बुलाती
आकांक्षाओं का दीपक जलाती

फिर
दर्पण के सामने खड़ी होकर
अपने से ही बात करतीं
भरती चौड़ी लम्बी मांग
सिंदूर की बिंदी माथे पर लगाते-लगाते
सोते हुये पापा को जगाती
सिर पर पल्ला रखते हुए
कमरे से बाहर निकलते ही
चूल्हे-चौके में खप जातीं--

तीजा,हरछ्ट,संतान सातें,सोमवती अमावस्या,वैभव लक्ष्मी
जाने अनजाने अनगिनत त्यौहार में
दिनभर की उपासी अम्मा
कभी मुझे डांटती
दौड़ती हुई छोटी बहन को पकड़ती
बहुत देर से रो रहे मुन्ना को
अपने आँचल में छुपाये
पालथी मार कर बैठ जातीं थी

दिनभर की उपासी अम्मा को
ऐसे ही क्षणों में मिलता था आराम---

अम्मा कभी नहीं हुई बीमार
वे जानती थीं कि
कौन ले जायेगा अस्पताल
वर्षों हो गये बांये पैर की ऐड़ी में दर्द हुए
किसने की फिकर
किसको है चिंता
शाम होते ही
दादी को चाहिए पूजा की थाली
पापा को चाहिये आफिस से लौटते ही खाना
दिनभर बच्चों के पीछे भागते
गायब हो जाता था ऐड़ी का दर्द--

कभी-कभी बहुत मुस्कराती थीं अम्मा
जिस दिन पापा
आफिस से, देर से लौटते समय
ले आते थे मोंगरे की माला
छेवले के पत्ते में लिपटा मीठा पान
उस दिन अम्मा
दुबारा गुंथती थी चोटी
खोलती थी "श्रृंगारदान"
लगाती थी "अफगान" स्नो
कर लेती थीं अपने होंठ लाल
सुंदर अम्मा और भी सुंदर हो जातीं
उस शाम महक जाता था
समूचा घर--

अम्मा जैसे ही जलाती थीं
सांझ का दीपक
जगमगा जाता था घर
महकने लगता था कोना कोना
सजी संवरी अम्मा
फिर जुट जातीं थीं रात की ब्यारी में
चूल्हा,चौका,बरतन समेटने में

लेट जाती थी,थकी हारी 
चटाई बिछाकर अपनी जमीन पर--

अम्मा के पसीने से सनी मिट्टी से बने घर में
तुलसी चौरे पर रखा
उम्मीदों का दीपक
आज भी जल रहा है
आकांक्षाओं का सूरज
प्रतिदिन ऊग रहा है

जीवन का सृजन
अम्मा से ही प्रारंभ होता है-----

"ज्योति खरे"

रविवार, अप्रैल 14, 2019

इन दिनों


नंगी प्रजातियों की नंगी जबान
थूककर गुटक रहें अपने बयान-

फेंक रहे लपेटकर मुफ्त आश्वासन
मनभावन मुद्दों की खुली है दुकान----

देश को लूटने की हो रही साजिश
बैठे गये हैं बंदर बनाकर मचान--

उधेड़ दो चेहरों से मखमली खाल
चितकबरे चेहरे बने न महान--

पी गये चचोरकर सारी व्यवस्थायें
सूख गए खेत खलियान और बगान--

"ज्योति खरे"

बुधवार, अप्रैल 10, 2019

ठूंठ पेड़ से क्या मांगे

बरगद जैसे फैले
बरसों जीते
चन्दन रहते
और विष पीते --

मौसम गहनों जैसा
करता मक्कारी
पूरे जंगल की बनी
परसी तरकारी
नंगे मन का भेष धरें
जीवन जीते----

उपहार मिला गुच्छा
चमकीले कांटों का
वार नहीं सहता मन
फूलों के चांटों का
हरियाली को चरते
शहरी चीते----

ठूंठ पेड़ से क्या मांगे
दे दो मुझको छाँव
दिनभर घूमें प्यासे
कहाँ चलाये नांव
नर्मदा के तट पर
धतूरा पीते-----

"ज्योति खरे"

सोमवार, अप्रैल 01, 2019

मूर्ख दिवस पर -- समझदारी की बातें

चिल्लाकर मुहं खोल बे
खुल्म खुल्ला बोल बे

नेताओं की तोंद देखकर
पचका पेट टटोल बे

सुरा सुंदरी और सत्ता का
स्वाद चखो बकलोल बे

सत्ता नाच रही सड़कों पर
चमचे बजा रहे ढोल बे

बहुमत का फिर हंगामा 
बता दे अपना मोल बे

भिखमंगे जब बहुमत मांगें 
खोल दे इनकी पोल बे

तेरे बूते राजा और रानी
दिखा दे अपना रोल बे

बेशकीमती लोकतंत्र को
फोकट में मत तॊल बे

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, मार्च 29, 2019

आई पी एल और बच्चे

खेल तो हम कभी भी खेल लेंगे
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जीत और हार की संभावनाओं के साथ
पान पराग, विमल, राजश्री, के पाऊच और गोल्डफ्लेग सिगरेट के पैकेट लिए
जहां चाय सुलभता से मिल जाए
इसकी चुस्कियों लेने
अपने अपने अड्डों पर
विराजमान हो जाते हैं
सभ्य समाज के
सभ्य लोग

ऐसी जगहों पर
मासूम बच्चे
टेबल पर पोंछा मारते
खाली कप ग्लास उठाते
अक्सर मिल जाते हैं--

इन दिनों
आई पी एल का क्रेज है
यह माँ बाप और रिश्तों को भी
नहीं समझता है

यहीं पर
मासूम बच्चे
गिरते विकटों के साथ
चौके, छक्कों के साथ
खाते रहते हैं
मां-बहन की गालियां
और अपनी मासूमियत
का परिचय देते
पेट भरने के इंतजाम में
पोंछते रहते हैं टेबल
खाली करते रहते हैं
एशट्रे

समय मिलते ही
कनखियों से
स्क्रीन पर देखती मासूम आंखे
बल्ले और बाल पर नहीं
चिप्स,चॉकलेट,मैगी,कामप्लेन 
पर ठहर जाती हैं
बालमन के भीतर
घुटती
भविष्य की संभावनाओं को
मां बहन की गालियां
भिंगो जाती हैं

हार और जीत की
जश्न की
तैयारियों में लगे लोग
मेकडावल, रॉयलचेलेंज, टीचर,सिग्नेचर
प्लेन,मसाला के
इंतजाम के साथ
पंडाल में बैठकर
असफलता, सफलता का राग
दो घूंट चढ़ाने के बाद
गुनगुनाने लगते हैं
टेबल पोंछते बच्चों की
मासूम घुटन को
नहीं पहचानते
मां बहन की गालियों देकर
इन्हें अपना यार समझते हैं

टेबल पोंछते इन बच्चों की
मासुमियत को समझने
कोई भी राष्ट्रीय प्रतियोगता
नहीं होती

खेेल तो हम कभी भी खेल लेंगे
पहले
इन मासूम बच्चों की
मासूमियत को
चौके,छ्क्के में
तबदील करें

मासूम जीवन को जीतने का
खेल
जल्दी से
प्रारंभ करवाओ
इस खेल में
आम आदमी
सम्मलित होना चाहता है--

"ज्योति खरे"

सोमवार, मार्च 18, 2019

छेवला उर्फ टेसू

फागुन की
समेटकर बैचेनियां
दहक रहा टेसू
महुये की
दो घूंट पीकर
बहक रहा टेसू---

सुर्ख सूरज को
चिढ़ाता खिलखिलाता
प्रेम की दीवानगी का
रूतबा बताता
चूमकर धरती का माथा
चमक रहा टेसू---

गुटक कर भांग का गोला
झूमता मस्ती में
छिड़कता प्यार का उन्माद
बस्ती बस्ती में
लालिमा की ओढ़ चुनरी
चहक रहा टेसू--

जीवन के बियावान में
पलता रहा
पत्तलों की शक्ल में
ढ़लता रहा
आंसुओं के फूल बनकर
टपक रहा टेसू---

"ज्योति खरे"