सोमवार, सितंबर 02, 2019

बारिश थम गयी

बारिश थम गयी
सड़कों का पानी सूख गया
घर का आंगन
अभी तक गीला है
मां के आंसू बहे हैं

कितनी मुश्किलों से खरीदा था
ईंट ,सीमेंट ,रेत
उस साल बाबूजी बेच कर आये थे पुश्तैनी खेत
सोचा था
शहर के पक्के घर में
सब मिलकर हंसी ठहाके लगायेंगे 
तीज-त्यौहार में
सजधज कर बहुऐं चहकेंगी

घर बनते ही सबने
आँगन और छत पर
गाड़ ली हैं अपनी अपनी बल्लियाँ
बांध रखे हैं अलग अलग तार
तार पर फेले सूख रहे हैं
अलग अलग किरदार

इतिहास सा लगता है
कि, कभी चूल्हे में सिंकी थी रोटियां
कांसे की बटलोई में बनी थी
राहर की दाल
बस याद है
आया था रंगीन टीवी जिस दिन
करधन,टोडर,हंसली
बिकी थी उस दिन

बर्षों बीत गये
चौके में बैठकर
नहीं खायी बासी कढ़ी और पुड़ी
बेसन के सेव और गुड़ की बूंदी
अब तो हर साल
बडी़ और अचार में भी
लग जाती है फफूंदी

औपचारिकता निभाने
दरवाजे खुले रखते हैं
एक दूसरे को देखकर
व्यंग भरी हँसी हंसते हैं

बारिश थम गयी
सड़कों का पानी सूख गया
घर का छत
अभी तक गीला है
माँ बाबूजी रो रहे हैं--------
            
"ज्योति खरे"

शुक्रवार, अगस्त 23, 2019

कृष्ण का प्रेम


आधुनिक काल की
कंदराओं से निकलकर
कृष्ण का
सार्वजानिक जीवन में
कब प्रवेश हुआ
इतिहास में इसकी तिथि दर्ज नहीं है
दर्ज है केवल कृष्ण का प्रेम

इतिहासकार बताते हैं
भक्ति की सारी मान्यतायें
भक्ति काल में ही
सिकुड़ कर रह गयी थी
जैसे सूती कपड़े को पहली बार
धोने के बाद होता है

सूती साड़ियों से
द्रोपती का तन ढांकने वाला कृष्ण
आधुनिक काल में
नारियों को देखते ही
मंत्र मुग्ध हो जाता है
चीरहरण के समय की
अपनी उपस्थिति को भूल जाता है

सार्वजनिक जीवन में
नाबालिगों से लेकर बूढ़ों तक का
नायक है कृष्ण
राजनितिक दलों का महासचिव
बॉलीवुड का सिंघम

स्वीकार भी करता है कृष्ण
कि, राजनीतिक दखलअंदाजी 
और सूचनाओं के अभाव में
मुझे कई कांडों का पता ही नहीं चलता
कि, इस देश में
शाश्वत प्रेम
अब बलात्कारियों के घरों में रहने लगा है

घनौनी साजिश से लिपटी हवाओं ने
मेरे भीतर के कृष्ण को
बहुत पहले मार दिया था
और मैं अनुशासनहीनता की
छाती से चलकर
बियर बार में बैठने लगा
युवा मित्रों को प्रेम के गुर सिखाने

आत्मग्लानि से भरा मैं
अपने आपको भाग्यशाली मानता हूँ
कि, आज भी मेरे जन्मदिन पर
शुद्ध घी के असंख्य दीपक जलाकर 
प्रार्थना करते हैं लोग
हे कृष्ण
घर परिवार,नाते-रिश्तेदारों
अड़ोसी- पड़ोसी
और देश को
वास्तविक प्रेम का पाठ पढ़ाओ
ताकि इस देश के लोग
जीवन में
वास्तविक प्रेम का अर्थ समझ सकें---

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, अगस्त 16, 2019

बच्चे सहेजना चाहते हैं

स्वतंत्रता दिवस की परेड में खड़े
इस महादेश के बच्चे
आपस में बातें कर रहें हैं
कि जहां
मजदूर,किसान,खेत और रोटी की बात होना चाहिए
वहां हथियारों की बात हो रही है

सन्नाटे में खदबदाते तनाव को
सिरे से खारिज कर
मनुष्य के बेहतर जीवन की घोषणाऐं
हो रही हैं

लेकिन इस देश के बच्चे
आज भी सरकारी स्कूल की
चूती छतों के नीचे बैठकर
अच्छा नागरिक बनने
भूखे पेट स्कूल जा रहैं हैं

ऐसे भयानक खतरनाक समय में
राष्ट्रगीत भी गाना जरुरी है

बच्चे खड़े खड़े
नई सुबह के उजाले को पकड़कर
भविष्य का तार तार बुनने का
प्रयास कर रहें हैं

युद्ध मेँ भाग रहे सैनिकों को
एक चुम्बन के बहाने
अपने पास बुला रहें हैं

बच्चे पकड़ना चाहते हैं
माँ का आंचल
दीदी की तार तार हो रही चुन्नी
थामना चाहते हैं पापा की उंगली
पहचानना चाहते हैं
अपनी सभ्यता और संस्कृति

बच्चे सहेजना चाहते हैं
दरक चुकी भारत माता की तस्वीर
आसमान को अपना समझकर
करना चाहते हैँ
ध्रुव तारे से दोस्ती.......

"ज्योति खरे"

रविवार, अगस्त 04, 2019

दोस्तो मेरे पास आओ

तूफानो को
पतवार से बांध दिया है
बहसों, बेतुके सवालों
कपटपन और गुटबाजी की
राई, नून, लाल मिर्च से
नजर उतारकर
शाम के धुंधलके में
जला दिया है

कलह, किलकिल और
संघर्षो को
पुटरिया में लपेटकर
बूढ़े नीम पर
टांग दिया है

बांध लिया है
बरगद की छांव में
बटोर कर रखे
तिनका तिनका
सुखों का झूला

दोस्तो मेरे पास आओ
खट्टी- मीठी
तीखी- चिरपरी
स्मृतियों को झुलायेंगे
थोड़ा सा रो लेंगे
थोड़ा सा हंस लेँगे---

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, अगस्त 02, 2019

अस्पताल से

तड़फते,कराहते
वातावरण में
धड़कनों की
महीन आवाजें
पढ़ती हैं
उदास संवेदनाओं
के चेहरों पर
अनगिनत संभावनाऐं

घबड़ाहटें
चुपचाप
देखती हैं
प्लास्टिक की बोंतलों से
टपककती ग्लूकोज की बूंदें
इंजेक्शनों की चुभती सुई के साथ
सिकुड़ते चेहरे

सफेद बिस्तर पर लेटी देह
देखती है
मिलने जुलने वालों के चेहरों को
अपनी पनीली आंखों से
कि,कौन कितना अपना है

अपनों में
अपनों का अहसास
अस्पताल में ही होता है -------

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, जुलाई 26, 2019

वाह रे पागलपन

सावन में
मंदिर के सामने
घंटों खड़े रहना
तुम्हें कई कोंणों से देखना

तुम्हारे चमकीले खुले बाल
हवा में लहराता दुपट्टा
मेंहदी रचे हांथ
जानबूझ कर
सावनी फुहार में तुम्हारा भींगना
दुपट्टे को
नेलपॉलिश लगी उंगलियों से
नजाकत से पकड़ना,
ओढ़ना
कीचड़ में सम्हलकर चलना
यह सब देखकर
सीने में लोट जाता था सांप-

पागल तो तुम भी थी
जानबूझ कर निकलती थी पास से
कि,
मैं सूंघ लूं
तुम्हारी देह से निकलती
चंदन की महक
पढ़ लूं आंखों में लगी
कजरारी प्रेम की भाषा
समझ जाऊं
लिपिस्टिक लगे होठों की मुस्कान-

आज जब
खड़ा होता हूँ
मौजूदा जीवन की सावनी फुहार में
झुलस जाता है
भीतर बसा पागलपन
जानता हूं
तुम भी झुलस जाती होगी
स्मृतियों की 
सावनी फुहार में--

वाकई पागल थे अपन दोनों-----

"ज्योति खरे"

सोमवार, जुलाई 22, 2019

पढ़ना जरूरी है


बारूद में लिपटी
जीवन की किताब को
पढ़ते समय
गुजरना पड़ता है
पढ़ने की जद्दोजहद से

दहशतजदा हवाओं का
खिड़कियों से सर्राते चले आना
छत के ऊपर किसी
आतातायी के भागते समय
पैरों की आवाजें आना
खामोश दीवारों की परतों का
अचानक उधड़ कर गिर जाना
बच्चों की नींद की तरह
कई-कई सपनों को
चौंककर देखना
ऐसे समय में भी
पढ़ना तो जरूरी है

जीवन की कसैली नदी में
तैरते समय
डूबने की फड़फडाहट में
पकड़ाई आ जाता है
आंसुओं की बूंदों से भरा आंचल

अम्मा ले आती हैं हमेशा
जीवन के डूबते क्षणों म़े
कसैली नदी से निकालकर
पकड़ा देती है
बारुद से लिपटी किताब

अगर नहीं पढ़ोगे किताब
तो दुनियां में लगी आग को
कैसे बुझा पाओगे---

"ज्योति खरे"