मंगलवार, मार्च 15, 2022

टेसू और फागुन

टेसू और फागुन
************
कटे हुए टेसू का हालचाल
पूंछने 
सालभर में एक बार आता है फागुन
टेसू फागुन से मिलते ही
टपकाने लगता है
विकास के पांव तले कुचले
खून से सने 
अपने फूलों के रंग

कहता है अपने दोस्त
फागुन से 
तुम
प्रेम के रंगों से भरे 
रहस्यों को
शहर की गलियों में
रह रहे लोगों को समझाओ
कुझ दिन झोपड़ पट्टी में भी गुजारो
भूखे बच्चों से बात करो
उजड़ रहे गांव में जाओ
जहां पैदा तो होता है अनाज
पर रोटियां की कमी है
एक चुटकी गुलाल
मजदूरों के गाल पर भी
मलो
क्योंकि इन्हें सम्हलने में लंबा समय लगेगा
मेरा क्या
मैं अपने कटे जाने की
पीड़ा से
एक दिन मुक्त हो जाऊंगा
सूखकर 
मिट्टी में मिल जाऊंगा

फागुन
तुम्हें हर साल आना है
क्यों सूख रहे हैं
प्रेम के रंग
उनका जवाब देना है ---

◆ज्योति खरे

सोमवार, मार्च 07, 2022

उपेक्षा के दौर से गुजर रहीं मजदूर नारियां

संदर्भ महिला दिवस
उपेक्षा के दौर से गुजर रही हैं मजदूर नारियां
****************
                 
नारी की छवि एक बार फिर इस प्रश्न को जन्म दे रही है कि,क्या भारतीय नारी संस्कारों में रची बसी परम्परा का निर्वाह करने वाली नारी है,या वह नारी है जो अपने संस्कारों को कंधे पर लादे मजदूरी का जीवन व्यतीत कर रही है.
परम्परागत भारतीय नारी और दूसरी तरफ बराबरी के दर्जे का दावा करने वाली आधुनिक भारतीय नारियां हैं,पर इनके बीच है, हमारी मजबूर मजदूर उपेक्षा की शिकार एक अलग छवि वाली नारी,इस नारी के विषय में कोई बात नहीं करता है.
नारी की नियति सिर्फ सहते रहना है-यह धारणा गलत है,इस धारणा को बदलने की आवाज चारों तरफ उठ रही है,आज की नारी इस धारणा से कुछ हद तक उबरी भी है.नारी किसी भी स्तर पर दबे या अन्याय सहे यह तेजी से बदल रहे समय में उचित नहीं है,लेकिन एक बात आवश्यक है कि इस बदलते परिवेश में इतना तो काम होना चाहिए कि मजदूर नारियों की स्थितियों को भी बदलने का कार्य होना चाहिए.
एक ही देश में,एक ही वातावरण में,एक जैसी सामाजिक स्थितियों में जीने वाली नारियों में इतनी भिन्नता क्यों?
वर्तमान में नारियों के पांच वर्ग हो गये हैं-----
१- नारियां जो पुर्णतः संपन्न हैं न नौकरी करती हैं न घर के काम काज
२- नारियां जो अपनी आर्थिक स्थिति को ठीक रखने के लिये नौकरी करती हैं अथवा सिलाई,बुनाई,ब्यूटी पार्लर आदि चलाती हैं
३- नारियां जो केवल अपना समय व्यतीत करने के लिये साज श्रृंगार के लिये,अधिक धन कमाने के लिये नौकरी करती हैं
४- नारियां जो केवल गृहस्थी से बंधीं हैं
५- नारियां जो अपना,अपने बच्चों का पेट भरने,घर को चलाने, मजदूरी करती हैं,
ये नारियां हमारे सामाजिक वातावरण में चारों तरफ घूमती नजर आती हैं 
पांचवे वर्ग की नारी  आर्थिक और मानसिक स्थिति से कमजोर है,ऐसी नारियों का जीवन प्रतारणाओं से भरा होता है,कुंठा और हीनता से जीवन जीने को विवश ये मजदूर नारियां तथाकथित नारी स्वतंत्रता अथवा नारी मुक्ति का क्या मूल्य जाने,इन्हें तो अपने पेट के लिये मेहनत मजदूरी करते हुए जिन्दगी गुजारना पड़ती है.
नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फार विमेन,सरकार के प्रयासों से तैयार एक योजना है,जिसे बनाने में महिला संगठनों की भागीदारी है,इसको बनाने के पहले महिलाओं की समस्या को सात खण्डों में बांटा गया है,रोजगार,स्वास्थ,शिक्षा,
संस्कृति,कानून,सामाजिक उत्पीडन,ग्रामीण विकास तथा राजनीती में हिस्सेदारी.
वूमन लिबर्टी अर्थात नारी मुक्ति की चर्चायें चारों ओर सुनाई देती हैं,बड़ी बड़ी संस्थायें नारी स्वतंत्रता की मांग करती हैं,स्वयं नारियां नारी मुक्ति के लिये आवाज उठाती हैं,आन्दोलन करती हैं,सभायें करती हैं,बडे बडे बेनर लेकर नारे लगाती हैं,
विचारणीय प्रश्न यह है कि मजदूरी कर जीवन चलाने वाली नारी अपना कोई महत्त्व नहीं रखती,इसके लिए क्या हो रहा है,क्या देश के महिला संगठन इनके उत्थान के लिए कभी आवाज उठायेंगे.
आज भी अधिकांश नारियां मजदूरी करती हैं, जो उपनगर या गाँव में रहती हैं और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की हैं,उनकी मजदूरी के पीछे भी स्वतंत्र अस्तित्व की चाह उतनी ही है, जितनी आधुनिक सामाजिक जीवन जीने वाली नारियों में है.
गाँव में ज्यादातर नारियां गरीब परिवारों की हैं, जो मजदूरों के रूप में खेतों पर,शहर में रेजाओं के रूप में,और कई अन्य जगह काम करती हैं,जी जान लगाकर दिनभर मेहनत करती हैं, पर वेतन पुरषों की तुलना में कम मिलता है,पिछले तीन दशकों में बनी अधिकांश कल्याणकारी योजनाओं के ज्यादातर फायदे उन्हीं नारियों के लिये हैं,जो उच्च आय में हैं,उच्च शिक्षा प्राप्त हैं.
उच्च वर्ग की नारियां मुक्त से ज्यादा मुक्त हैं ,किटी पार्टियाँ करती हैं,क्लबों में डांस करती हैं,फैशन में भाग लेती हैं,इनकी संख्या कितनी है,क्या इन्ही गिनी चुनी नारियों की चर्चा होती है,सही मायने मैं तो चर्चा मजदूर नारियों की होनी चाहिये.
महिला दिवस हर वर्ष आता है और चला जाता है,मजदूर नारियां ज्यों की त्यों हैं,नारी मुक्ति की बात तभी सार्थक होगी कि जब "महिला मजदूर"के उत्थान की बात हो,वर्ना ऐसे "महिला दिवस"का क्या ओचित्य जिसमें केवल स्वार्थ हो.

◆ज्योति खरे

रविवार, फ़रवरी 27, 2022

युद्ध की कहानियां

युद्ध की कहानियां
**************
लिखी जा रही हैं
संवेदनाओं की पीठ पर
युद्ध की कहानियां

झुंझलाते, झल्लाते 
वातावरण में
बांटा जा रहा है 
डिस्पोजल ग्लास में पानी
पीने वालों को 
हर घूंट कड़वा लग रहा है
लेकिन फिर भी पी रहें हैं
घूंट घूंट पानी

जश्न या मातम के दौरान
सुनाई जाती हैं
या गढ़ी जाती हैं
विद्रोह की कहानियां
ऐसे समय में 
पड़ती है पानी की ज़रूरत
क्योंकि
सदमें में
चीख चिल्लाहट में
सूख जाता है गला

विभाजित खेमों को
हालात का अंदाज़ा नहीं है
कि,दहशतज़दा लोग
सफेद चादरों पर बैठे
सिसक रहे हैं
कि,कब कोई जानी पहचानी लाश 
आंख के सामने से न गुजर जाए

काश!
युद्ध की 
कहानियां सुनते समय
किसी के 
कराहने की 
आवाज न सुनाई दे-----

◆ज्योति खरे

सोमवार, फ़रवरी 21, 2022

प्यार मैं ही, मैं करूं

प्यार मैं ही, मैं करूं
***********
मन-मधुर वातावरण में
प्यार बाँटें
प्यार कर लें

दु:ख अपने पांव पर
जो खड़ा था,
अब दौड़ता है
हर तराशे सुख के पीछे
कोई पत्थर तोड़ता है

आओ करें हम
नव सृजन-
एक मूरत और गढ़ लें

'प्यारे', 
प्यार मैं ही मैं करूं
और तुम कुछ ना करो
कैसे बंधाऊं आस मन को
तुम 'न' करो, न 'हाँ' करो!

रतजगे-सी जिन्दगी में
हम कहाँ से
नींद भर लें----

लंबा सफ़र है 
हम सभी का
हम मुसाफिर हैं सभी
दौड़ते हैं, हांफते हैं 
या बैठते हैं हम कभी

यह सिलसिला है राह का,
प्यार से 
कुछ बात कर लें-----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, फ़रवरी 17, 2022

जब से तुमने

जब से तुमने
**********
जब से तुमने
लहरों की तरह
उसके भीतर 
मचलना शुरू किया 
वह
समुंदर हो गया

जब से तुमने
इशारे से बुलाकर 
उसके कान में कहा 
तुम मेरे दोस्त हो 
वह
मैं बोलने लगा
सुनने भी लगा

जब से तुमने 
उसकी उंगलियों को
अपनी उंगलियों में
फसाकर 
साथ चलने को कहा
वह
अपरिचितों की भीड़ में
परिचित होने लगा

जब से तुमने 
सबके सामने 
उसको गले लगाया
वह 
साधारण आदमी से
विशेष आदमी बन गया----

◆ज्योति खरे

मंगलवार, अगस्त 17, 2021

बहन

बहन 
****
एक-
स्मृतियों में बहन
*************
मैं 
टूटकर बिखरते समय
जब भी घबड़ाता हूं
हंसती ,खिलखिलाती
गुलाबी बुंदके वाली
फ्राक पहने
दो चोटी में 
लाल रिबिन बांधें
आ जाती है
मेरे सामने
                 
और जब 
रहता हूँ चुप 
उसके गुनगुनाने की आवाज
कानों में पड़ते ही
टूट जाती है चुप्पी

साथ खेले,साथ बढे
लड़े,झगडे,रूठे,रोये,हंसे
जुडे रहे रिश्तो की
रेशमी डोर से

स्मृतियों के आँगन में
बूढा बचपन
अकेला टहलता है जब
संबंधों की जड़ों में 
लग रही दीमक से
वह ही बचाती है

जीवन बदला 
जीने की परिभाषा बदली
पर नहीं बदली
उसके रिश्तों की भाषा

जानता हूँ 
वह भी 
उलझ गयी है
अपने बनाए 
नये रिश्तों के जंगल में

उससे कहता हूं
जब कभी 
समय निकालकर
ऐसे ही
आ जाया करो
स्मृतियों में
दोनों मिलकर
खीर पूड़ी बनाएंगे---

दो
बहन
*****
बहन 
छोटी या बड़ी
इत्र की शीशी में भरी
परिवार के
संस्कार और परम्पराओं को
सुगंधित करने वाली
गहरी और सुनिश्चित भाग्य रेखा होती है

जीवन की धुरी 
कदमों की पहचान
घटनाओं की आहट 
और जीवन का
तरण द्वार होती है

सैनिको की जान 
ध्वज पकड़े हथेलियाँ 
खिलाड़ियों की सांसें
शिशु की माता 
पिता की धड़कन
मां की सलाहकार
घूमती गोलाकार धरती
कुल्हाडी सी कठोर
फूल सी कोमल
होती है

किसी बदमाश के गाल पर 
झनझनाता 
करारा चांटा भी होती है

बहन
कलाई में लिपटा
एक धागा नहीं 
जीवन का 
सार होती है---

" ज्योति खरे "

सोमवार, अगस्त 09, 2021

आदिवासी लड़कियां

आदिवासी लड़कियां
****************
भिनसारे उठते ही 
फेरती हैं जब
घास पर 
गुदना गुदी
स्नेहमयी हथेलियां
उनींदी  घास भी
हो जाती है तरोताजा 
लोकगीत गुनगुनाने की
आवाज़ सुनते ही
घोंसलों से पंख फटकारती
निकल आती हैं चिड़ियां
टहनियों पर बैठकर
इनसे बतियाने

मन ही मन मुस्कराती हैं 
बाडी में लगी
भटकटैया,छुईमुई,कुंदरू
नाचने लगती हैं
घास पूस से बनी
बेजान गुड़ियां 
जलने को मचलने लगता है 
मिट्टी का रंगीन चूल्हा
जिसे ये बचपन में
खरीद कर लायीं थी 
चंडी के
हाट बाजार से

इनकी गिलट की 
पायलों की आहट सुनकर
सचेत हो जाता है 
आले में रखा शीशा
वह जानता है
शीशे के सामने ही खड़ी होकर 
ये आदिवासी लड़कियां
अपने होने के अस्तित्व को
सजते सवंरते समय
स्वीकारती हैं

इनके होने और इनके अस्तित्व के कारण 
युद्ध तो आदिकाल से 
हो रहा है
लेकिन
जीत तो
इन्हीं लड़कियों की ही होगी 
ठीक वैसे ही , जैसे 
काँटों के बीच से
रक्तिम आभा लिए
निकलती हैं
गुलाब की पंखुड़ियां-----

◆ज्योति खरे