शनिवार, मार्च 06, 2021

लड़कियां

लड़कियां
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फुटपाथ पर
बेचती है
पालक,मैथी और लाल भाजी
यह वह 
अपनी जमीन के 
छोटे से टुकड़े में बोती है
उसके पास ही 
बेचती है एक लड़की
अदरक,लहसुन और हरी मिर्च
यह वह आढ़त से खरीदती है
दोनों 
अपनी अपनी साइकिलों में
बोरियां बांधकर
पास के गांव से आती हैं

शाम को दुकान समेटने के बाद
खरीदती हैं
घर के लिए 
जरूरत का सामान

दोनों
घर पहुंचने के पहले
एक जगह खड़े होकर
बांटती हैं
अपने अपने दुख

कल मिलने का वादा कर
लौट आती हैं
अपने अपने घर 

सुबह 
फिर मिलती हैं
आती हैं बाजार
संघर्षों के गाल पर
चांटा मारने----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, मार्च 04, 2021

फूल

फूल
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मैं 
किसकी जमीन पर 
अंकुरित हुआ
किस रंग में खिला 
कौन से धर्म का हूं
क्या जात है मेरी
किस नाम से पुकारा जाता हूं 
मुझे नहीं मालूम

मुझे तो सिर्फ इतना मालूम है
कि,छोटी सी क्यारी में 
खिला एक फूल हूं 
जिसे तोड़कर 
अपने हिसाब से 
इस्तेमाल करने के बाद
कचरे के ढेर में 
फेंक दिया जाता है----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, फ़रवरी 25, 2021

बूढ़ी महिलाएं

बूढ़ी महिलाएं
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अपनी जवानी को 
गृहस्थी के 
हवन कुंड में तपाकर
सुनहरे रंग की हो चुकी
बूढ़ी महिलाएं
अपने अपने घरों से निकलकर
इकठ्ठी हो गयी हैं

गुस्से से भरी
ये बूढ़ी महिलाएं
कह रहीं हैं
जमीन से उठती
संवेदनाओं पर
ड़ाली जा रही है मिट्टी

अब हम 
जीवन भर साध के रखी 
अपनी चुप्पियों को 
तोड़ रहें हैं
डाली जा रही 
मिट्टी को हटाकर
आने वाले समय के लिए
रास्ता बना रहे हैं--

"ज्योति खरे"

सोमवार, फ़रवरी 15, 2021

प्रेम

प्रेम
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लड़कों की जीन्स के जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की 
चुन्नी के छोर में 
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
कलगी के साथ खुसा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच में फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है प्रेम 

फूलों की सुगंध
भंवरों की जान
बसंत की मादकता
पतझर में ठूंठ सा है प्रेम 

जंगली जड़ी बूटियों का रसायन
झाड़ फूंक और सम्मोहन
के ताबीज में बंद
सूखे रोग की दवा है प्रेम 

फुटबॉल जैसा
एक गोल से
दूसरे गोल की तरफ 
जाता है
बच्चों की तरह 
उचका दिया जाता है 
आकाश की तरफ
गोद में गिरते ही
खिलखिलाने लगता है  
दरकी जमीन पर 
कोमल हरी घास
की तरह 
अंकुरित होता है  

खाली बोतलों सा लुढ़कता 
बिस्किट की तरह
चाय में डूबता
पाउच में बंद
पान की दुकान में बिकता 
च्यूइंगम की तरह
घंटों चबाया जाता है प्रेम

माँ बाप की
दवाई वाली पर्ची में लिखा
फटी जेबों में रखा रखा
भटकता रहता है प्रेम 

और अंत में
पचड़े की पुड़िया में लपेटकर 
डस्टबिन में 
फेंक दिया जाता है प्रेम---

"ज्योति खरे"

सोमवार, फ़रवरी 08, 2021

गुलाब

गुलाब
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कांटेदार तनों में
खिलते ही 
सम्मोहित कर देंने वाले 
तुम्हारे रंग
और
देह से उड़ती जादुई
सुगंध को सूंघने
भौंरों का 
लग जाता है मजमा
सुखी आंखों से
टपकने लगता है
महुए का रस

जब
तने से टूटकर 
प्रेम में सनी 
हथेलियों में तुम्हें
रख दिया जाता है

उन हथेलियों को
क्या मालूम
गुलाब की पैदाईश
बीज से नहीं 
कांटेदार कलम को
रोपकर होती है

गुलाबों के
सम्मोहन में बंधा यह प्रेम
एक दिन
सूख जाता है

प्रेम को  
गुलाब नहीं
गुलाब का 
बीज चाहिए----

"ज्योति खरे"

मंगलवार, फ़रवरी 02, 2021

बसंत तुम लौट आये हो

बसंत तुम लौट आये 
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अच्छा हुआ
इस सर्दीले वातावरण में
तुम लौट आये हो
 
सुधर जाएगी 
बर्फीले प्रेम की तासीर
मौसम की नंगी देह पर
जमने लगेगी
कुनकुनाहट 
 
लम्बे अवकाश के बाद
सांकल के भीतर से
आने लगेंगी
खुसुर-फुसुर की आवाजें
गर्म सांसों की 
सनसनाहट से 
खिसकने लगेंगी रजाई

दिनभर इतराती
धूप
चबा चबा कर 
खाएगी 
गुड़ की पट्टी
राजगिर की लैय्या  
और तिलि के लड्डू

वाह!! बसंत
कितने अच्छे हो तुम
जब भी आते हो
प्रेम में 
सुगंध भरकर चले जाते हो---

" ज्योति खरे "

शनिवार, जनवरी 23, 2021

पंछियों ने---

पंछी
आसमान में उड़ते समय
सीख लेते हैं
आजादी का हुनर
बैठते हैं जिस डगाल पर
कुतरते नहीं
रखते हैं हराभरा
बनाते हैं घोंसला

वे चोंच नहीं चलाते
चोंच से चुन-चुन कर 
लाते हैं दाना
भरते हैं
अपने बच्चों का पेट

बहेलिये 
किसी गुप्त जगह पर बैठकर 
बनाते हैं योजना 
बिछाकर लालच का जाल 
फैंक देते हैं
गिनती के दाने

जाल में फंसे
फड़फड़ाते पंछियों को
देखकर
फिर बहेलियों का झुंड 
लगाता है ठहाके
मनाता है 
जीत का जश्न

पंछियों ने
फड़फड़ाना छोड़कर 
अपने जिंदा रहने की
मुहिम चलाई
अपनी सतर्कता के पंख खोले
और जंगल में इकठ्ठे हो गए
यह तय किया
कि पहले
बहेलियों के जाल को
कुतरेंगे 
भूखे रहेंगे
पर उनका फेंका हुआ
दाना नहीं खाएंगे
साथ में 
यह भी तय किया
कि अब
घरों की छतों पर
नहीं बैठेंगे

पंछी अब
घर की छत पर 
आकर नहीं बैठते--

" ज्योति खरे "