शुक्रवार, मई 01, 2015

कामरेड आगे बढ़ो --------



कामरेड
तुम्हारी भीतरी चिंता
तुम्हारे चेहरे पर उभर आयी है
तुम्हारी लाल आँखों से
साफ़ झलकता है
कि,तुम
उदासीन लोगों को
जगाने में जुटे हो ----

 

कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं

मसीह सूली पर चढ़ा दिये गये
गौतम ने घर त्याग दिया
महावीर अहिंसा की खोज में भटकते रहे
गांधी को गोली मार दी गयी

संवेदना की जमीन पर
कोई नया वृक्ष नहीं पनपा
क्योंकि
संवेदना की जमीन पर
नयी संस्कृति
बंदूक पकड़े खड़ी है

बंजर और दरकी जमीन पर
तुम
नये अंकुर
उपजाने में जुटे हो----

कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं

जो लोग
संगीतबद्ध जागरण में बैठकर
चिंता व्यक्त करते हैं
वही आराम से सोते हैं
इन्हें सोने दो

कामरेड तुम्हारी चिंता
महानगरीय सभ्यता
और बाजारवाद पर नहीं
मजदूरों की रोटियों की हैं
उनके जीवन स्तर की है

तुम अपनी छाती पर
वजनदार पत्थर बांधकर
चल रहे हो उमंग और उत्साह के साथ
मजदूरों का हक़ दिलाने ----

कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं
तुम्हें लाल सलाम
लाल सलाम
इंकलाब जिंदाबाद
जिंदाबाद

"ज्योति खरे"

गुरुवार, फ़रवरी 26, 2015

आज भी रिस रहा है -----

 जब कभी
तराशा होगा
पहाड़ को
दर्दनाक चीख
आसमान तक तो
पहुंची होगी---
आसमान तो आसमान है
वह तो केवल
अपनी सुनाता है
दूसरों की कहां सुनता है--- 
कांपती सिसकती
पहाड़ की सासें
ना जाने कितने बरस
अपने बचे रहने के लिए
गिड़गिड़ाती रहीं---  
कारीगर  
पहाड़ की कराह
को अनसुना कर
उसे नया शिल्प देने
इतिहास रचने
करते रहे
प्रहार पर प्रहार--- अब जब कभी
कोई इनके करीब आता है
छू कर महसूसता है
इनका दर्द
पारा बन चुकी
पहाड़ की आंखों की बूंदें
टपक कर छन-छना जाती हैं---
बिखेर देती हैं
अंधेरी गुफाओं में उजाला
कि देखो
आज भी रिस रहा है
इतिहास की स्मृतियों से
कराहता खून-----
"ज्योति खरे"

 एलोरा की गुफाएं --- फोटो - ज्योति खरे











सोमवार, जनवरी 26, 2015

बसंत तुम लौट आये हो ------

अच्छा हुआ
तुम इस सर्दीले वातावरण में
लौट आये हो--
 
सुधर गई
बर्फीले प्रेम की तबियत    
जमने लगीं
मौसम की नंगी देह पर
कुनकुनाहट
 
लम्बे अंतराल के बाद
सांकल के भीतर
खुसुर-फुसुर होने लगी
सरक गयी सांसों की सनसनाहट से
रजाई
चबा चबा कर गुड़ की लैय्या 
धूप दिनभर इतराई

वाह!! बसंत
कितने अच्छे हो तुम
जब भी आते हो
प्रेम में सुगंध भर जाते हो---
                           
                      "ज्योति खरे"
 चित्र- गूगल से साभार








बुधवार, जनवरी 14, 2015

अम्मा का निजि प्रेम -------

आटे के ठोस
तिली के मुलायम लड्डू
मीठी नीम के तड़के से
लाल मिर्च शक्कर भुरका नमकीन
हींग,मैथी,राई से बघरा मठा
और नये चांवल की खिचड़ी
 
खाने तब ही मिलती थी
जब सभी
तिल चुपड़ कर नहाऐं
और अम्मा के भगवान के पास
एक एक मुठ्ठी कच्ची खिचड़ी चढ़ाऐं
 
पापा ने कहा
मुझे नियमों से बरी रखो
बच्चों के साथ मुझे ना घसीटो 
सीधे पल्ले को सिर पर रखते हुए
अम्मा ने कहा
नियम सबके लिए होते हैं

 
पापा ने पुरुष होने का परिचय दिया
अब मुझसे प्रेम नहीं करती तुम
अम्मा ने तपाक कहा
बिलकुल नहीं करती तुमसे प्रेम
 
पापा की हथेली से
फिसलकर गिर गया सूरज 
माथे की सिकुड़ी लकीरों को फैलाकर
पूंछा क्यों
जमीन में पड़े पापा के सूरज को उठाकर
सिंदूर वाली बिंदी में
लपेटते हुए बोलीं
तुम्हारा और मेरा प्रेम
समाज और घर की चौखट से बंधा है
जो कभी मेरा नहीं रहा
 
बंधा प्रेम तो
कभी भी टूट सकता है
निजि प्रेम कभी नहीं टूटता
मेरा निजि प्रेम मेरे बच्चे हैं

 
पापा बंधें प्रेम को तोड़कर
वैकुंठधाम चले गये
अम्मा आज भी
अपने निजि प्रेम को जिन्दा रखे
अपनी जमीन पर खड़ी हैं -----

                                                  "ज्योति खरे "


चित्र -- गूगल से साभार



   

शनिवार, जनवरी 03, 2015

इस बरस और कई कई बरस ----

 
कई वर्षों से इकठ्ठे
टुकनियां भर निवेदनों को
एक ही झटके में झटककर
मन के हवालात में
अपराधियों की कतार में
खड़ा कर दिया
 
मैंने तो कभी नहीं किया निवेदन
ना ही दिए कोई संकेत
ना ही देखा समूची पलकों को खोलकर
कनखियों से देखना
अपराध है क्या ?
 
तुम भी तो खरोंच देती हो
कनखियों से देखते समय
मेरी मन की देह को
और भींग जाती हो
भीतर तक
ऊग जाती हैं
तुम्हारे चेहरे पर बूंदें
पोंछकर बूंदों को
अपराधी ठहराना गुनाह है
 
स्वीकार कर लो
नए बरस की नयी कामनायें
ताकि प्रेम के खारे समंदर में
आ जाये मिठास
इस बरस और कई कई बरस ----
 
                                                              "ज्योति खरे "

चित्र- गूगल से साभार

बुधवार, दिसंबर 17, 2014

दुनियां की सभी माओं के आंसू ----


सीढ़ी पर बैठे बच्चे
बच्चे नहीं
समूची दुनियां के
नयी सदी के मनुष्य थे
 
सीढ़ी पर बैठकर बच्चे
घुप्प अंधेरे और
आतंक के साये में
जीवन की नयी संभावनाओं का
तार-तार बुन रहे थे
पढ़ रहे थे
मनुष्यता का पाठ
चाहते थे
दुनियां के हर बच्चेां से
दोस्ती करना
 
सीढ़ी पर बैठकर बच्चे
पकड़े थे माँ का आँचल
पापा की उंगली
दादा की लाठी
दादी का चश्मा
 
दुनियां के ये बच्चे
अपनी अपनी माँ से कह रहे थे
पोंछती रहें हर बच्चे के आंसू 
कह रहे थे पापा से
आतंक के अंधेरे को करते रहें नष्ट
तय करें उजाले का सफर
कह रहे थे दादी से
चश्मे के बिना तारे गिनों
दादा की लाठी से
बदलना चाहते थे
संस्कृति
 
सीढ़ी पर बैठे बच्चे
सभ्यता और संस्कृति की
भरी बंदूक से
मार दिये गए
पाठशाला में ही रंग गयी
मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाली किताबें
 
क्या अब
उसी सीढ़ी पर बैठकर बुद्धिजीवी
तलाशकर लौटा पायेंगे
मां की गोद के
लापता खून से लथपथ बच्चे
 
दुनियां के बचे हुए लोगो
सभ्यता और संस्कृति की
ओढ़कर तार-तार चादर
आसमान में देखो
ध्रुव तारे के पास से
बह रहे हैं
दुनियां की सभी माओं के आंसू ------

"ज्योति खरे"



शुक्रवार, अक्टूबर 10, 2014

करवा चौथ का चाँद-------

चाँद तो मैंने
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
मेरे आवारापन को
स्वीकारा था तुमने--

सूरज से चमकते गालों पर
पपड़ाए होंठों पर
रख दिये थे मैंने
कई कई चाँद----


चाँद तो
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
तमाम विरोधों के बावजूद
ओढ़ ली थी तुमने
उधारी में खरीदी
मेरे अस्तित्व की चुन्नी--


और अब
क्यों देखती हो
प्रेम के आँगन में
खड़ी होकर
आटे की चलनी से
चाँद----


तुम्हारी तो मुट्ठी में कैद है
तुम्हारा अपना चाँद----


"ज्योति खरे" 

चित्र - गूगल से साभार