शुक्रवार, मार्च 26, 2021

वृद्धाश्रम में होली

वृद्धाश्रम में होली
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बूढ़े दरख्तों में
अपने पांव में खड़े रहने की 
जब तक ताकत थी
टहनियों में भरकर रंग
चमकाते रहे पत्तियां और फूल
मौसम के मक्कार रवैयों ने
जब से टहनियों को
तोड़ना शुरू किया है
समय रंगहीन हो गया

रंगहीन होते इस समय में
सुख के चमकीले रंगों से
डरे बूढ़े दरख़्त
कटने की पीड़ा को 
मुठ्ठी में बांधें
टहलते रहते हैं
वृद्धाश्रम की
सुखी घास पर

इसबार
बूढ़े दरख्तों के चिपके गालों पर
चिंतित माथों पर
लगाना है गुलाल
खिलाना है स्नेह से पगी खुरमी
मुस्कान से भरी गुझिया 

एक दिन
हमें भी बूढ़े होना है---

"ज्योति खरे"

42 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (28-03-2021) को   "देख तमाशा होली का"   (चर्चा अंक-4019)    पर भी होगी। 
-- 
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
--  
रंगों के महापर्व होली और विश्व रंग मंच दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
--
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
--

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

ठीक कहा आपने आदरणीय ज्योति जी ।

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना आज शनिवार २७ मार्च २०२१ को शाम ५ बजे साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन " पर आप भी सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद! ,

yashoda Agrawal ने कहा…

सही..
सटीक..
आभार..
सादर...

शुभा ने कहा…

वाह! अद्भुत ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

होना तो चाहिए ऐसा ही लेकिंकैसे पैदा हो इतनी संवेदना । जब खुद के बच्चे भुला देते अपने ही मां बाप को ।
सुंदर भाव

Kamini Sinha ने कहा…

इस बार बुढ़े दरखतो के गालों पर, चिंतीत माथों लगाना है गुलाल... बहुत खूब, ये नेक काम करके हम उन्हें तो सुख देगे ही, हमें भी शुकून मिलेगा, बेहद प्यारी रचना आदरणीय सर, आप को भी होली की हार्दिक शुभकामनाएं

Amrita Tanmay ने कहा…

निर्वाक !!! हार्दिक शुभकामनाएँ ।

anita _sudhir ने कहा…

आ0 सत्य को दिखाता सटीक सृजन

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल ने कहा…

प्रभावशाली लेखन - - होली की शुभकामनाएं।

Onkar ने कहा…

सटीक सृजन

Meena sharma ने कहा…

वृद्धावस्था की व्यथा को इस अभिव्यक्ति ने जुबां दी है। होली हो या दीवाली, बूढ़े दरख्त अपनी बहारों के मौसम को याद तो करते ही होंगे। कोरोना ने वृद्धों का जीवन और भी दूभर कर दिया है। वे कहीं जा नहीं सकते, कोई उनके पास आ नहीं सकता।

Vinbharti blog.spot.in ने कहा…

बहुत खूब प्रस्तुति, होली की हार्दिक शुभकामनाएं

Anita ने कहा…

सही है

उषा किरण ने कहा…

बहुत सुन्दर संवेदनशील रचना...होली की शुभकामनाएँ

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

संवेदनशील रचना...

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आज के वर्तमान परिस्थितियों पर बिल्कुल सटीक रचना

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत प्रशंसनीय सुन्दर रचना |

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा है बूढ़ा तो हमें भी होना है ... चिंता आज करने की ज़रूरत है ... लाजवाब रचना है ...

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

रेणु ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
रेणु ने कहा…

आदरणीय सर , अनायास आँखें नम कर जाती ये रचना | यकायक जीवन में अप्रासंगिक हो जाना और जीवन का सफर वृद्धाश्रम में जाकर रुकना ! हम भूल जाते हैं हम भी एक -एक पग धरकर इसी व्यवस्था की ओर अग्रसर हैं | मार्मिक रचना जो जीवन की दारुणता का दहला देने वाला जीवंत चित्र उपस्थित करती है | सादर