गुरुवार, मार्च 04, 2021

फूल

फूल
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मैं 
किसकी जमीन पर 
अंकुरित हुआ
किस रंग में खिला 
कौन से धर्म का हूं
क्या जात है मेरी
किस नाम से पुकारा जाता हूं 
मुझे नहीं मालूम

मुझे तो सिर्फ इतना मालूम है
कि,छोटी सी क्यारी में 
खिला एक फूल हूं 
जिसे तोड़कर 
अपने हिसाब से 
इस्तेमाल करने के बाद
कचरे के ढेर में 
फेंक दिया जाता है----

"ज्योति खरे"

20 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

लाजवाब सृजन हमेशा की तरह।

Sweta sinha ने कहा…

गहन भाव कम शब्दों में।
बेहतरीन सृजन सर।

प्रणाम।

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

गहरी बात बड़े ही मासूम अंदाज में कह गए सर। आपके अनुभव व पारखी नजर को नमन।

Jigyasa Singh ने कहा…

हर परिदृश्य को शब्दों में बाँधना,वो भी भावपूर्ण..बहुत ख़ूब..

रेणु ने कहा…

मासूम लोग दुनिया को बहुत कुछ देते हैं पर दुनिया बड़ी बेदर्दी से उन्हें प्रयोग कर धुल में मिला देती है| यही फूल के साथ भी होता है | मासूम सा आत्मकथ्य पुष्प का , जो उसकी अनकही व्यथा कहता है | सादर

Meena Bhardwaj ने कहा…

गहन भाव लिए सुन्दर सृजन सर .

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

क्या बात है ! अति सुंदर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

और यह भी मालूम है कि छोटे से जीवन में बहुत सी खुशियाँ बिखेरता हूँ . गहन अभिव्यक्ति

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

ज्योति सिंह ने कहा…

मूक जीव इंसानो से बेहतर होते है ,ये भेदभाव के मतलब से अंजान होते है ,बहुत ही सुंदर रचना, बधाई हो

Preeti Mishra ने कहा…

लाजवाब लेखन

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर