शनिवार, फ़रवरी 10, 2018

टेडी-बियर

टेडी-बियर
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कपास के जंगल से उड़कर
असुंदर,रंगीन गुदगुदा गोला
युद्धरत आदमियों के बीच गिरा

झुर्रीदार चमड़ी और
धधकती आंखों ने
सजाकर, संवारकर
सहमे सिसकते बच्चों के बीच बैठा दिया
बच्चों ने अपनाया, पुचकारा और बहुत चूमा

मैं अपने भाग्य पर
इतराता नहीं हूं
क्योंकि पुराना होते ही
टुकड़े-टुकड़े कर
फेंक दिया जाता हूँ
कचरे के ढेर पर

मैं दयालु हत्यारों की तलाश में
उड़ रहा हूँ
आकाश से धरती तक
क्योंकि कभी मरता नहीं है
टेडी-बियर

आपके घर फिर आऊंगा
बच्चों के आंसू पोछने-----

" ज्योति खरे "

गुरुवार, फ़रवरी 08, 2018

स्त्री

स्त्री
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स्त्री
छोटी या बड़ी
गहरी और सुनिश्चित भाग्य रेखा
संस्कार और परंपराओं में लिपटी
जलती हुई सुगंधित अगरबत्ती

स्त्री
जीवन की धुरी
कदमों की पहचान
घटनाओं की आहट
आसमान और नदी
पार उतारने वाली नांव 
घर की पहरेदार
तरण का द्वार

स्त्री
सैनिको की जान
ध्वज पकड़े हथेलियाँ
खिलाड़ियों की सांसें

स्त्री
शिशु की माता
स्नेह- सहज पिता
घूमती गोलाकार धरती
कुल्हाडी सी कठोर
फूल सी कोमल

स्त्री
किसी बदमाश के गाल पर
झन्नाटेदार तमाचा

स्त्री
चूल्हे की आग
लालटेन की बाती
सांझ की आरती

स्त्री
ढोलक की थाप
सितार के तार
हारमोनियम के सरगम
बांसुरी के सुर

स्त्री
कलाई में लिपटा
एक धागा नहीं
रक्षा सूत्र है
जीवन का सार है---

" ज्योति खरे "

रविवार, फ़रवरी 04, 2018

गुम गयी है व्यवहार की किताब

गुम गयी है व्यवहार की किताब
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धुंधली आंखें भी
पहचान लेती हैं
भदरंग चेहरे
सुना है
इन चेहरों में
मेरा चेहरा भी दिखता है--

गुम गयी है
व्यवहार की किताब
शहर में
सुना है
गांव के कच्चे घरों की
दीवालों से
अपनापन
आज भी रिसता है---

इस अंधेरे दौर में
जला कर रख देती है
एक बूढ़ी औरत
लालटेन
सुना है
बूढ़ा धुआं
उजालों की आड़ में
रात भर
दर्द अपना लिखता है----

नीम बरगद के भरोसे
खिलखिलाती अल्हड़
झूलती हुई झूला
उड़ रही है आकाश में
सुना है
प्यार की चुनरी के पीछे
चांद
रोज आकर छिपता है----

"ज्योति खरे"

बुधवार, जनवरी 31, 2018

चुप्पियों की उम्र क्या है

चुप्पियों की उम्र क्या है
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अपराधियों की दादागिरी
साजिशों का दरबार
वक्त का जालिम करिश्मा
अंधी है सरकार

बेगुनाही का नमूना
ढूंढ कर हम क्या करेंगे
झूठ की भगदड़ मची है
और हांथ में तलवार

किरदारों के बीच खड़ी
सच बोलती हैं सिसकियां
खूब धड़ल्ले से चल रहा
दंगों का व्यापार

बैठ गए हम यह सोचकर
पेटभर भोजन करेंगे
छेदवाली पत्तलों का
दुष्ट सा व्यवहार

इंसानियत मरने लगी है
कीटनाशक गोलियों से
छाप रहा झूठी खबर
बिक हुआ अखबार

चुप्पियों की उम्र क्या है
एक दिन विद्रोह होगा
आग धीमी जल रही
बस! भड़कने का इंतजार

"ज्योति खरे"

गुरुवार, जनवरी 25, 2018

अपने ही घरों से ------

शराफत की ठंड से सिहर गये हैं लोग
दुश्मनी की आंच से बिखर गये हैं लोग--

जिनके चेहरों पर धब्बों की भरमार है
आईना देखते ही निखर गये हैं लोग--

छुटपन का गाँव अब जिला कहलाता है
स्मृतियों के आंगन से बिसर गये हैं लोग--

वो फिरौती की वजह से उम्दा बने
साजिशों के सफ़र से जिधर गये हैं लोग--

दहशत के माहौल में दरवाजे नहीं खुलते  
अपने ही घरों से किधर गये हैं लोग--

"ज्योति खरे"

सोमवार, जनवरी 22, 2018

बसंत के आने की आहट

सफर से लौटकर
आने की आहटों से
चोंक गए
बरगद, नीम, आम
महुओं का
उड़ गया नशा
बड़े बड़े दरख्तों के
फूल गए फेंफड़े

हर तरफ
कानों में घुलने लगा शोर
कनखियाँ
खोलने लगी
बंधन के छोर

फूलों की धड़कनों को
देने उपहार
खरीदकर ले आया मौसम
सुगंध उधार
फूलों में आ गयी
गुमशुदा जान

सूख गए पनघट पर
ठिठोली की जमघट
बिन ब्याहे सपनों ने
ले ली है करवट

प्रेम के रोग की
इकलौती दवा
आ गयी इठलाती
बासंती हवा----

" ज्योति खरे "

मंगलवार, जनवरी 16, 2018

गंगा की छाती पर

गंगा की छाती पर
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गंगा की छाती पर
जब भरने लगता है महाकुंभ
महाकुंभ में बस जाती हैं
कई कई बस्तियां
बस्तियों में सम्मलित हो जाती हैं हस्तियां

हस्तियां उजाड़ते आती हैं
कई कई अधबनी बस्तियां
बसने को आतुर बस्तियां

अरकाटीपन,बनावटीपन
चिन्तक की चिंता
तरह तरह के गुरु मंत्र
टांगकर चली जाती हैं हस्त्तियाँ
और टनांगकर चली जाती हैं
छलकपट की दुकानों पर
आध्यात्म की तख्तियां

हिमालय की कंदराओं से निकलकर
आ गये हैं नागा बाबा
देह पर जमी हुई
दीमक छुड़ाने
चमकने लगे हैं
जंग लगे हथियार अखाड़ों में

जारी है
पवित्र होने का संघर्ष

गंगा
बहा रही है अपने भीतर
पूजा के सूखे फूल
जले हुये मनुष्य की
अधजली अस्थियां
कचड़ा,गंदगी
थक गयी है
पापियों के पाप धोते-धोते

कर्ज की गठरी में बंधा
खिचड़ी,तिल,चेवडा
बह रहा है गंगा में
चुपड़ा जा रहा है
उन्नत ललाट पर
नकली चंदन
संतों की भीड़ में लुट रही है
आम आदमी की अस्मिता

गंगा
पापियों के पाप नहीं
पापियों को बहा ले जाओ
एकाध बार अपने में ही डूबकर
स्वयं पवित्र हो जाओ---

"ज्योति खरे"