बुधवार, मार्च 25, 2026

राह देखते रहे

राह देखते रहे
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राह देखते रहे उम्र भर 
क्षण-क्षण घडियां 
घड़ी-घड़ी दिन 
दिन-दिन माह बरस बीते 
आंखों के सागर रीते--

चढ़ आईं गंगा की लहरें 
मुरझाया रमुआ का चेहरा 
होंठों से अब 
गयी हंसी सब  
प्राण सुआ है सहमा-ठहरा 

सुबह, दुपहरी, शामें 
गिनगिन 
फटा हुआ यूं अम्बर सीते--

सुख के आने की पदचापें 
सुनते-सुनते सुबह हो गयी 
मुई अबोध बालिका जैसी 
रोते-रोते आंख सो गयी 

अपने दुश्मन 
हुए आप ही 
अपनों ने ही किए फजीते--

धोखेबाज खुश्बुओं के वृत
केंद्र बदबुओं से शासित है 
नाटक-त्राटक, चढ़ा मुखौटा 
रीति-नीति हर आयातित है 

भागें कहां, 
खडे सिर दुर्दिन 
पड़ा फूंस है, लगे पलीते---

◆ज्योति खरे

शनिवार, फ़रवरी 14, 2026

प्रेम

प्रेम
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लड़कों की जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की चुन्नी में
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
कलगी के साथ खुसा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच में फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है 

फूलों का रंग
भवरों की जान
बसंत की मादकता
हरे ठूंठ मधुमास है 

जंगली जड़ी बूटियों का रसायन
झाड़ फूक और सम्मोहन
के ताबीज में बंद
बीमारों की दवा है 

फुटबॉल की तरह उचक कर 
आकाश की तरफ जाता है
और उल्का पिंड बनकर   
दरकी जमीन पर गिरकर
हरियाता है 

कोल्ड ड्रिंग्स की खाली बोतलों सा लुढ़कता 
चाय की चुस्कियों के साथ बिस्किट के साथ गुटक लिया जाता है
और च्यूइंगम की तरह
घंटों चबाया जाता है 

बूढे माँ बाप की
दवाई वाली पर्ची में लिखा
फटी जेबों में रखा रखा
भटकता रहता है 

और अंत में
पचड़े की पुड़िया में लपेटकर 
डस्टबिन में 
फेंक दिया जाता है ---

◆ज्योति खरे