जेठ मास में--------
तपती गरमी जेठ मास में-----
प्यास प्यार की लगी हुई
होंठ मांगते पीना
सरकी चुनरी ने पोंछा
बहता हुआ पसीना
रूप सांवला हवा छू रही
बेला महकी जेठ मास में-----
बोली अनबोली आंखें
पता मांगती घर का
लिखा धूप में उंगली से
ह्रदय देर तक धड़का
कोलतार की सड़कों पर
राहें पिघली जेठ मास में-----
स्मृतियों के उजले वादे
सुबह-सुबह ही आते
भरे जलाशय शाम तलक
मन के सूखे जाते
आशाओं के बाग़ खिले जब
यादें टपकी जेठ मास में-----
"ज्योति खरे"
10 टिप्पणियां:
जेठ मॉस के इस खेल को हर साल भोगते हैं सब ... बहुत सुन्दरता से आपने इसकी कई खूबियों को संवेदना पूर्ण उतारा है इन पंक्तियों में ...
Is kavita ne jeath maas ko bhi bahaar se bhar diya, ati uttam!
उत्कृष्ट प्रस्तुति
सुंदर अभिव्यक्ति, जेठ मास में...
बहुत ही सुंदर सार्थक प्रस्तुति!!!
जेठ की गर्मी भी जरुरी है आम, खरबूजा आदि फल तेज गर्मी में ही पकते हैं, मिठास से भर जाते हैं
बहुत बढ़िया
बेहद सामयिक खूबसूरत रचना...
ज्योति जी आपके ब्लॉग पर आना बहुत अच्छा लगा | अब आना होता रहेगा
ज्योति जी आपके ब्लॉग पर आना बहुत अच्छा लगा | अब आना होता रहेगा
Khoobsoorat shringarik bhavabhivyakti
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