गुरुवार, सितंबर 07, 2023

अपने चेहरे में

अपने चेहरे में
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वर्षों से सम्हाले 
प्यार के खुरदुरेपन ने
खरोंच डाला है
चेहरे को
लापता हो गयी हैं
दिन,दोपहरें और शामें
काश
पीले पड़ रहे चेहरे को
सुरमा लगाकर
पढ़ पाता इंद्रधनुष
उढ़ा देता
सतरंगी चुनरी

जब कोई
छुड़ाकर हाथों से हाथ
बहुत दूर चला जाता है
तो छूट जाते हैं
जाने-अनजाने
अपनों से अपने
अपने ही सपने
कांच की तरह
टूटकर बिखर जाता है जीवन

फिर नये सिरे से 
कांच के टुकड़ों को समेटकर
जोड़ने की कोशिश करते हैं
देखते हैं 
अपने चेहरे में
अपनों का चेहरा---

◆ज्योति खरे

19 टिप्‍पणियां:

Sweta sinha ने कहा…

टूटे काँच की महीन किर्चियाँ चुभती रहती है आजीवन हम चाहे न चाहे कुछ दर्द साँसों का हिस्सा हो जाती है।
बेहतरीन अभिव्यक्ति सर।
प्रणाम सादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ सितंबर २०२३ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

बेनामी ने कहा…

बेहद खूबसूरत भाव....फिर से जोड़कर देखने की कोशिश 👌👌
#chandana

MANOJ KAYAL ने कहा…

सुन्दर कृति

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

बहुत आभार आपका

Anita ने कहा…

कोमल भावों से सजी सुंदर रचना

शिवम कुमार पाण्डेय ने कहा…

वाह।

Sudha Devrani ने कहा…

जब कोई
छुड़ाकर हाथों से हाथ
बहुत दूर चला जाता है
तो छूट जाते हैं
जाने-अनजाने
अपनों से अपने
अपने ही सपने
कांच की तरह
टूटकर बिखर जाता है जीवन
सटीक एवं उत्कृष्ट सृजनवाह!!!

Meena sharma ने कहा…

एक वक्त आता है जब हम अपने आप में ही अपनों को खोजने लगते हैं। मन की चलविचल स्थिति का सटीक चित्रण। सादर।

Meena Bhardwaj ने कहा…

जीवन के पहलुओं को संजीदगी से स्पर्श करती लाजवाब कृति ! सादर वन्दे !

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... कमाल का लिखते हैं आप ...