शनिवार, जून 16, 2018

ईद मुबारक


सुबह से
इन्तजार है
तुम्हारे मोगरे जैसे खिले चेहरे को
करीब से देखूं
ईद मुबारक कह दूँ
पर तुम
शीरखुरमा, मीठी सिवईयाँ
बांटने में लगी हो

मालूम है
सबसे बाद में
मेरे घर आओगी
दिनभर की थकान उतारोगी
बताओगी
किसने कितनी ईदी दी

तुम
बिंदी नहीं लगाती
पर मैं
इस ईद में
तुम्हारे माथे पर
गुलाब की पंखुड़ी
लगाना चाहता हूं

मुझे नहीं मालूम
तुम इसे
प्रेम भरा बोसा समझोगी
या गुलाब की सुगंध का
आत्मीय अहसास
या ईदी

अब जो भी हो
प्रेम तो जिन्दा रखना है
अपन दोनों को ----

"ज्योति खरे"

बुधवार, जून 06, 2018

विकलांग

निकले थे
गमझे में कुछ जरुरी सामान बांध कर  
किसी पुराने पेड़ के नीचे बैठकर
बीनकर लाये हुए कंडों को सुलगाकर
गक्क्ड़ भरता बनायेंगे
तपती दोपहर की छाँव में बैठकर
भरपेट खायेंगे

एक हरे और बूढ़े पेड़ की तलाश में
विकलांग पेड़ों के पास से गुजरते
भटकते रहे

सोचा हुआ कहाँ पूरा हो पाता है

सच तो यह है कि
हमने
घर के भीतर से
निकलने और लौटने का रास्ता
अपनों को ही काट कर बनाया है ----

"ज्योति खरे"

मंगलवार, मई 22, 2018

चाहत

अच्छे दोस्त हैं
नदी और पहाड़
दिनभर एक दूसरे को धकियाते
खुसुर-पुसुर बतियाते

रात के गहन सन्नाटे में
दोनों
अपनी अपनी चाहतों को
सहलाते पुचकारते हैं

चाहती है नदी
पहाड़ को चूमते बहना
और पहाड़
रगड़ खाने के बाद भी
टूटना नहीं चाहता

दोनों की चाहतों में
दुनियां बचाने की
चाहते हैं------

"ज्योति खरे"

शनिवार, अप्रैल 14, 2018

प्रेम नहीं विद्रोह लिखो

प्रेम नहीं विद्रोह लिखो--
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नंगी प्रजातियों की नंगी ज़बान
थूककर चाट रहे अपने बयान

चेहरों पर कराकर फेशियल
खोल ली है बारूद की दुकान

कन्या भोजन में कन्याओं का रैप
खादी पहनकर बन रहे महान

पी रहे चचोरकर सारी व्यवस्थायें
सुख रहे खेत,खलिहान और बगान

लतखोरों की रोज उधेडो खाल
भाषा नहीं डंडों से सम्हालो कमान---

"ज्योति खरे"

शनिवार, मार्च 31, 2018

गम अगरबत्ती की तरह देर तक जला करते हैं-- मीना कुमारी

              मीना कुमारी की पुन्य तिथि पर 
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      ये मेरे हमनशी चल कहीं और चल 
      इस चमन में तो अपना गुजारा नहीं 
      बात होती गुलों तक तो सह लेते हम 
      अब काँटों पर भी हक़ हमारा नहीं---

३१मार्च इसी दिन महान अभिनेत्री मीना कुमारी फ़िल्मी दुनियां को सूना कर, इस संसार से विदा हो गयी थीं,और अपने चाहने वालों के लिये एक सदमा छोड़ गयी थीं ,आज भी वह सदमा उनके चाहने वालों के दिल पर ज्यों का त्यों बना हुआ है।
             "चाँद तन्हां है,आसमां तन्हां 
             दिल मिला है,कहाँ कहाँ तन्हां 
             रात देखा करेगा सदियों तक 
              छोड़ जायेंगे यह जहां तन्हां ---

भारतीय फिल्मों में मीना कुमारी को उच्च कोटि का अभिनेत्री माना जाता था,क्योंकि वह ऐसा सागर था जिसकी थाह पाना मुस्किल था, बाहर से शांत पर भीतर से गंभीर,उनके मन में कितने तूफान उमडते थे यह कोई नहीं जानता था, बस ! सब इतना जानते थे कि , मीना कुमारी वास्तविक प्रेम को सदैव महत्व दिया करती थीं. लेकिन प्रेम मार्ग में जो उन्हें ठोकरें मिली वही दर्द उनके अभिनय में दुखांत बनकर आया था, इसको भोगते हुये अभिनय करना ही मीना कुमारी की
अभिवयक्ति बकन गयी थी यही कारण था कि, उन्हें दुखांत भूमिकाओं की रानी बना दिया गया, जिसके जीवन में दर्द,तड़प और आंसुओं के सिवा कुछ भी न था.
          "मसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है
          ना जाने कौन सी उम्मीद पर दिल ठहरा है 
     तेरी आँखों से छलकते हुये इस गम की कसम 
          ये दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत गहरा है ---

मीना कुमारी का जन्म १अगस्त १९३२ में हुआ था,इनकी माँ इकबाल बेगम अपने जमाने की प्रसिद्ध अदाकारा थी,मीना कुमारी पर अपनी माँ का प्रभाव पड़ा और इनका झुकाव अभिनय की तरफ बढ़ा,उन दिनों वे गरीबी के दिन से गुजर रहीं थी,उस वक़्त उनकी उम्र करीब आठ साल की रही होगी,गन्दी सी बस्ती में रहने वाली बालिका पर एक दिन स्वर्गीय मोतीलाल की निगाह पड़ी और मीना जी का भाग्य वहीँ से चमकना शुरू हो गया,सर्वप्रथम मीना कुमारी ने "बच्चों का खेल" फिल्म में भूमिका की, कुछ दिनों तक बाल अभिनेत्री के रूप में अभिनय करने के बाद, मीना जी को फिल्मों से किनारा करना पड़ा,कुछ सालों बाद वाडिया ब्रदर्स ने उन्हें फिल्मों में पुनः स्थापित किया,फिर तो मीना जी निरंतर फिल्मो में काम करती रहीं.
     "जिन्दगी आँख से टपका हुआ बे रंग कतरा 
     तेरे दामन की पनाह पाता तो आंसू होता ---

मीना कुमारी जिनका नाम "महजबी"
था, दुखांत भूमिकाओं की रानी बन गयी,उनके पास दौलत,शौहरत थी मगर प्रेम,प्यार नहीं था कमाल अमरोही से विवाह कर किया लेकिन बाद में अलग होना पड़ा,प्रेम की चाह अंत तक उनके जेहन में बसी रही और उन्हें रुलाती रही.
        "पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है 
        रात खैरात की सदके की सहर होती है 
       जैसे जागी हुई आँखों में चुभे कांच के ख्वाब 
        रात इस तरह दीवानों की बसर होती है---- 

भोली सूरत,प्यारी आँखें और मासूम सा चेहरा,गुलाबी होंठ---सचमुच मीना जी समुद्र में पड़ते चंद्रमा के प्रतिबिम्ब के समान थीं, उनके मन में प्यार था,सत्कार था,पर उनकी वास्तविक भावनाओं को कोई नहीं समझ पाया,उनकी आँखों से ही ह्रदय की सारी अभिव्यक्ति झलक उठती थी।
        "बॊझ लम्हों का लिये कंधे टूटे जाते हैं                  बीमार रूह का यह भार तुम कहीं रख दो 
        सदियां गुजरी हैं कि यह दर्द पपोटे झुके
        तपते माथे पर जरा गर्म हथेली रख दो---- 

गम की  राह से गुजरी मीना जी वास्तव में एक हीरा थीं, वे प्यार जुटाना चाहती थी, प्यार पाना चाहती थी, प्यार बांटना चाहती थीं,इसी प्यार की प्यास ने उन्हे अंत तक भटकाया।
          "यूँ तेरी राहगुजर से दीवाना बार गुजरे 
          कांधे पे अपने रख के अपना मजार गुजरे 
          मेरी तरह सम्हाले कोई तो दर्द जानूं
          एक बार दिल से होकर परवर दिगार गुजरे 
          अच्छे लगे हैं दिल को तेरे जिले भी लेकिन 
          तू दिल को हार गुजरा हम जान हार गुजरे--

दर्द की दुनियां में जीने वाली मीना जी, आखिर यह संसार छोड़ गयीं,लेकिन अपनी शायरी में अपना दर्द बयां कर गयीं, एक बेहतरीन अदाकारा,एक बेहतरीन शायरा अपने चाहने वालों को अपना प्यार,दर्द और कुछ नगमें दे गयीं,ऐसा लगता है मीना जी आज भी तन्हाई में रह रहीं हैं और अपने चाहने वालों को कह कह रहीं हैं----
   " तू जो आ जाये तो इन जलती हुई आँखों को 
    तेरे होंठों के तले ढेर सा आराम मिले                    तेरी  बाहों में सिमटकर तेरे सीने के तले 
    मेरी बेख्वाब सियाह रातों को आराम मिले--

एक पाकीज़ा शायरा की यादें हमेशा जिन्दा रहेंगी प्यार करने वालों के दिलों में-----

"ज्योति खरे"

रविवार, मार्च 25, 2018

गर्मी आने की आहट

समय के गाल पर मारकर चांटा
इधर उधर भाग रहा है
मौसम
चबूतरे पर
पसरा पड़ा है
बेसुध सन्नाटा

कुत्ते भी
उदास होकर
हांफने लगे है
कुआं , तलाब और छांव की
की तलाश कर

छतों पर खोज रहीं है
चिड़ियां
दाना पानी

पिछले बरस ही
फेंक दिया गया था
फूटा मटका

घर घर
ढूंढा जा रहा है पानी ---

"ज्योति खरे"

गुरुवार, मार्च 08, 2018

महिलाएं चाहती हैं

महिलाएं चाहती हैं
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चाहती हैँ
ईँट भट्टोँ मेँ
काम करने वाली महिलाएं
कि उनका भी
अपना घर हो

चाहती हैँ
खेतोँ पर
भूखे रहकर
अनाज ऊगाने वाली महिलाएं
कि उनका भी
भरा रहे पेट

चाहती हैँ
मजबूर महिलाएं
कि उनकी फटी साड़ी मेँ 
न लगे थिगड़ा
सज संवर कर
घूम सकेँ बाजार हाट

चाहती हैँ
यातनाओँ से गुजर रही महिलाएं
उलझनों और प्रताड़ना की
खोल दे कोई गठान
ताकि उड़ सकें
कामनाओँ के आसमान मेँ
बिना किसी भय के

चाहती है
महिलाएं
देश दुनियां में
उपेक्षित महिलाओं का नाम भी
दर्ज किया जाए

चाहती हैं
महिलाएं
केवल सुख भोगती महिलाओं का
जिक्र न हो
जिक्र हो
उपेक्षा के दौर से गुजर रहीं महिलाओं का
रोज न सही
महिला दिवस के दिन तो
होना चाहिए---

"ज्योति खरे"