बुधवार, सितंबर 16, 2020

कैसी हो मेरी "अपना"

कैसी हो मेरी "अपना"
***********
बहुत बरस तक
अक्सर मिलते थे
बगीचे में
बैठकर छूते थे 
एक दूसरे की कल्पनाएं
टटोलते थे एक दूसरे के दिलों में बसा प्रेम

आज भी उस बगीचे में जाकर बैठता हूं
मुठ्ठियों में भरकर
चूमता हूं यादों को
सोचता हूँ
जब तुम
हरसिंगार के पेड़ के नीचे से 
गुजकर आती थीं
औऱ बैठ जाती थी 
चीप के टुकड़े पर
मैँ भी बैठ जाता था तुम्हारे करीब
निकालता था फंसे हुए हरसिंगार के फूल
तुम्हारे बालों से
इस बहाने
छू लेता था तुम्हें
डूब जाता था
तुम्हारी आंखों के
मीठे पानी में

अब तुम दूर हो
बदल गयी हैं
भीतर की बेचैनियां
पहले मिलने की होती थी
अब यादों में होती हैं

भागती हुई यादों से 
कहता हूं रुको
मेरी "अपना"
आती होगी
उसके बालों में फंसे
हरसिंगार के फूल निकालना हैं
जिन्हें मैँ जतन से
सहेजकर रखता हूँ

तुम अब नहीं ही मेरे पास
फिर भी 
मेरे पास हो
तुम्हारे होने का अहसास
थोड़े से लम्हों के लिए ही सही
प्रेम को जिंदा रखने का
सलीका तो सिखाता है
 
कैसी हो मेरी "अपना"

"ज्योति खरे"

सोमवार, सितंबर 14, 2020

माय डियर लच्छू

माय डियर लच्छू
गुडमार्निंग
आज हिंदी दिवस है
वोकल कार्ड को साफ कर
मतलब गले से
अंग्रेजी को बाहर निकाल कर
रख दे कहीं गिरवी
और गुटक ले हिंदी
क्योंकि, आज अपन को 
ओनली हिंदी में टाक करना है

राजभाषा डिपार्टमेंट ने 
नोटिस सर्व किया है 
आज सभी इंडियन
आल वर्क हिंदी में करेंगे
ईवन 
टॉक भी हिंदी में करेंगे
अपनी अपनी कॉलोनियों की
रोड़ों में
मार्च पास्ट करेंगे
औऱ
गांव गांव
मीटिंग करेंगे
क्रिएटिव वर्क की
क्लास लगाएंगे
जिससे आत्मनिर्भरता 
औऱ डिजिटल इंडिया का
निर्माण होगा

सभी अपनी अपनी
प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ 
क्लासिक फोटोग्राफ 
मंत्रालय को 
सीधे सेंड करेंगे
फिर दिनभर
ट्विटर हेंडिल पर
इनको 
ट्वीट किया जाएगा

यह प्रोग्रेस रिपोर्ट 
विश्व में सर्कुलेट की जाएगी 
जिससे "ओपन द डोर " 
नीति के अंतर्गत 
विकासशील राष्ट्रों की श्रेणी में 
"एन्ट्री" पाने की 
"कन्फर्म" दावेदारी होगी

माय डियर लच्छू
यह भी सुना है
प्रेस क्लब में 
"फ्रीडम फ़ॉर हिंदी" का 
अनाउंस होगा  

अंत में
राजभाषा ऑफिसर
अंग्रेजी वाइन के साथ
देशी चखना खायेंगे

पर डियर लच्छू
अपन तो 
कड़की के दौर से गुजर रहे हैं
विदेशी कहाँ खरीद पाएंगे
अपन तो अपनी 
"ओरिजनल्टी" को ही
"फालो" करेंगे
कलारी में बैठकर 
देशी मदिरा के साथ
पॉपकार्न खायेंगे

तो फिर मिलते हैं
देशी कलारी में
वहीं बैठकर
हिंदुस्तान की चर्चा करेंगे----

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, सितंबर 11, 2020

प्रेम

प्रेम
***
मैंने जब जब प्रेम को
हथेलियों में रखकर
खास कशीदाकारी से
सँवारने की कोशिश की
प्रेम
हथेलियों से फिसलकर
गिर जाता है
औऱ मैं फिर से
खाली हाँथ लिए
छत के कोने मैँ बैठ जाती हूँ
चांद से बतियाने 

रतजगे सी जिंदगी में
सपनों का आना भी
कम होता है
जब भी आतें हैं
लिपट जाती हूँ
सपनों की छाती से
ओढ़ लेती हूं
आसमानी चादर

चांद 
एक तुम ही हो
जो कभी पूरे 
कभी अधूरे 
दिखते हो
मिलते हो

सरक कर चांद 
उतर आया छत पर
रात भर 
सुनता रहा 
औऱ नापता रहा
सपनों से प्रेम की दूरी

फेरता रहा माथे पर उंगलियां
सपनों में उड़ा जाता है
प्रेम में बंधा जाता है---

"ज्योति खरे"

रविवार, अगस्त 23, 2020

नदी

सुबह
तुम जब
सिरहाने बैठकर 
फेरकर माथे पर उंगलियां
मुझे जगाती हो

मैँ 
तुम्हारी तरह
नदी बन जाती हूँ
दिनभर 
चमकती,इतराती,लहराती हूं---

"ज्योति खरे"

बुधवार, अगस्त 12, 2020

कृष्ण का प्रेम

कृष्ण का प्रेम
***********
भक्तिकाल की 
कंदराओं से निकलकर 
आधुनिक काल की
चमचमाती रौशनियों से सजे 
सार्वजानिक जीवन में
कृष्ण के स्थापित प्रेम का
कब प्रवेश हुआ
इसकी कोई तिथि दर्ज नहीं है
दर्ज है केवल प्रेम

प्रेम की सारी मान्यतायें
भक्ति काल में ही
जीवित थी
आधुनिक काल में तो प्रेम
सूती कपड़ों की तरह 
पहली बार धुला
औऱ सिकुड़ गया

रेशमी साड़ियों से
द्रोपती का तन ढांकने वाला यह प्रेम
स्त्रियों को देखते ही
मंत्र मुग्ध हो जाता है
चीरहरण के समय की
अपनी उपस्थिति को 
भूल चुका यह प्रेम 
नाबालिगों से लेकर 
बूढ़ों तक का
नायक बन जाता है
राजनितिक दलों का प्रवक्ता
औऱ थानों के हवलदारों
की जेब में रख लिया जाता है 

घिनौनी साजिशों से 
लिपटी हवाओं ने
कृष्ण के प्रेम को
जब नये अवतार में
पुनर्जीवित किया 
अनुशासनहीनता की छाती में 
पांव रखवाकर
बियर बार में बैठाया
उसी दिन से 
दिलों की धड़कनों में
धड़कने लगा प्रेम 
इस गुर को सिखाने 
वाले कई उस्ताद 
पैदा होने लगे

आत्मसम्मान से भरे
इस प्रेम को
कभी भी आत्मग्लानि का
अनुभव नहीं हुआ
क्योंकि वह आज भी
अपने आपको 
भाग्यशाली मानता है
कि,मेरे जन्मदिन पर
शुद्ध घी के 
असंख्य दीपक जलाकर 
प्रार्थना करते हैं लोग-----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, अगस्त 06, 2020

प्रेम तुम कब आ रहे हो

प्रेम तुम कब आ रहे हो
*******************
तार पीतल के हों
एल्युमिनियम के हों
या हों टेलीफोन के 
प्रेम के तार 
किसी भी तार से नहीं बंधते
प्रेम तो
हवा में तैरकर अपना रास्ता बनाता है

लोग जब
अपने आप से घबड़ाते हैं
तो बैचेनियाँ के पहाड़ पर
चढ़ कर
प्रेम को बुलाने की कोशिश करते हैं 
अपनी टूटती साँसों  से निकलती
थरथराती आवाज से
आग्रह करते हैं

कभी 
प्रेमी और प्रेमिका के अलावा
मुझे भी याद कर लिया करो 
कसम से 
शरीर में बिजली दौड़ जाएगी
टूटती साँसों को 
राहत का ठिकाना मिलेगा

जल्दी आओ प्रेम
रिश्तों के टकराव से
दरक रही छत पर बैठकर 
तुम्हें बताएंगें
मनमुटाव के किस्से
दिखाएंगे
कलह की जमीन के हो रहे टुकड़े

मुझे तुमको छूकर देखना है
अपने भीतर महसूसना है
जल्दी आओ प्रेम
मेरा रोम-रोम 
तुम्हारी प्रतीक्षा में 
खड़ा है 

प्रेम तुम कब आ रहे ही--- --

"ज्योति खरे "

रविवार, अगस्त 02, 2020

सावन सोमवार औऱ मैं

वाह रे पागलपन
*************
तुम्हारे चमकीले खुले बाल
मेंहदी रचे हांथ
जानबूझ कर
सावनी फुहार में भींगना
हरे दुपट्टे को
नेलपॉलिश लगी उंगलियों से 
नजाकत से पकड़ना
ओढ़ना
कीचड़ में सम्हलकर चलना

यह देखने के लिए
घंटो खड़े रहते थे
सावन सोमवार के दिन
मंदिर के सामने
कितना पागलपन था उन दिनों

पागल तो तुम भी थी 
जानबूझ कर निकलती थी पास से
कि में सूंघ लूं
देह से निकलती चंदन की महक
पढ़ लूं काजल लगी
आंखों की भाषा
समझ जाऊं
लिपिस्टिक लगे होठों की मुस्कान--

आज जब
खड़ा होता हूँ
मौजूदा जीवन की सावनी फुहार में
झुलस जाता है
भीतर बसा पागलपन
जानता हूं
तुम भी झुलस जाती होगी
स्मृतियों की  
सावनी फुहार में-

वाकई पागल थे अपन दोनों-----

"ज्योति खरे"

दोस्तों के लिए दुआ

दोस्तों के लिए दुआ
****************
मैं बजबजाती जमीन पर खड़ा
मांग रहा हूँ 
दोस्तों के लिए दुआ

सबकी गुमशुदा हंसी
लौट आये घर
कोई भी न करे
मजाकिया सवाल 
न सुनाए बेतुके कहकहे 

मैं सबकी आँखों में 
धुंधलापन नही
सुनहरी चमक 
दुख सहने का हुनर
औऱ
सुख भोगने का सलीका 
दुश्मनों से दोस्ती हो
 
मैं मांग रहा हूँ 
तुम्हारे और मेरे भीतर 
पनप रही खामोशियों को
तोड़ने की ताकत

दोस्तो
हम सब मिलकर
सिद्ध करना चाहते है
कि
अपन पक्के दोस्त हैं----

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, जुलाई 24, 2020

चाय पीते समय

चाय पीते समय
*************
सुबह के कामों से फुरसत होकर अकेला बैठा एक कप काली चाय पी रहां हूं. इस तरह का अकेलापन  60 साल के बाद ही आता है,ऐसे समय में मष्तिष्क क्षमता से अधिक काम करता है, बीते हुए दिन नये दिनों से टकराते हैं औऱ हम क्या क्या सोचने समझने लगते हैं.
समझ आता है कि कौन अपना है कौन पराया है, किसने कब कितना अपमान किया, किसने कब अपना समझा, हम हमेशा सही होकर भी गलत ठहराए गए,उस समय हमने विरोध भी किया औऱ मौन रहने की हिम्मत भी जुटाई, खूब डांट डपट खाई अब सोचते हैं सही किया, अपने विरोध के जब मायने बदलने लगे और इसे सिरे से खारिज किया जाने लगे तो समझ जाना चाहिए कि कोई आपको समझ ही नहीं रहा,जीवन में यदि सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करना हो तो कभी कभी मौन होना पड़ता है, यह मौन हमें आंतरिक ताकत देता है और हम नकारात्मक ऊर्जा से बचे रहते हैं, जो ऊर्जा हमने मौन रहकर,सहकर बचाई थी वह अब काम आ रही है, अच्छा लिखना,अच्छा पढ़ना, जीवन का मनोहारी संगीत सुनना अब अच्छा लगता है,उन दिनोँ के संघर्षों से गुजरते समय जो मित्र साथ थे या नही थे उनको अब याद करना पड़ता है.
आज हम चेतना की सतह पर खड़े होकर सुबह सुबह सूरज की पहली किरण का स्वागत करते हैं.अतीत हमारा सबसे ताकतवर मित्र होता है,यही हमारे चेतन मन को शक्तिशाली बनाता है, जिसके बल पर हम अब जीवन जीने की कला और संघर्षों से लड़ने की तमीज सीख पाएं है.                                   हम कठिन समय के दौर से गुजर रहें हैं,यह दौर जीवन मूल्यों को समझने,जात पांत,धर्म,को एक करने का दौर है,राजनीति से परे आत्मचिंतन का दौर है, बुजुर्ग पीढ़ी को सम्हालने औऱ नयी पीढ़ी को अच्छे संस्कार देने का दौर है
अरे चाय पीना तो भूल ही गया खैर चाय तो फिर पी जा सकती हैं पर इस तरह के विचार बहुत मुश्किल से पनपते है.
दौर पतझड़ का सही
उम्मीद तो हरी है--

"ज्योति खरे"

गुरुवार, जुलाई 02, 2020

कोहरे के बाद धूप निकलेगी

लघु कथा
********
कोहरे के बाद धूप निकलेगी
**********************
सिवनी जाने वाली बस अपने निर्धारित समय से बीस मिनट पहले
ही दीनदयाल बस स्टेंड में लग गयी.
यात्री अपनी अपनी सीटों पर बैठने के लिए चढ़ने लगे, मैं भी अपनी सीट पर जाकर बैठ गया, कुछ देर बाद बस कोलतार की सड़क पर दौड़ने लगी. 
स्वाति से मेरी पहली मुलाकात बस में ही हुई थी, वह बालाघाट जा रही थी और मैं छिंदवाड़ा, बातों का सिलसिला चला उसने बताया कि मेरे पति कालेज में प्रोफेसर हैं, मैं उन्हें सर कहती हूं, पिछले साल ही हमारी शादी हुई है.
बातों के कई दौर चले और हम दोंनो फेसबुक मित्र भी बन गये मोबाइल नम्बरों का आदान प्रदान भी हो गया.
वह सिवनी उतर गयी क्योंकि उसे दूसरी बस पकड़कर बालाघाट जाना था, मैं छिंदवाड़ा पहुंच गया.

कई दिनों तक स्वाति की याद बनी रही उसकी सुंदर छवि आंखों के सामने तैरती रही, फेसबुक में एक दूसरों की पोस्टों में लाईक कमेंटस होते रहे और कभी कभार फोन पर भी बातें हो जाया करती, वह जब भी बात करती, मुझे उसकी हंसी बहुत अच्छी लगती थी,वह कहती आप मेरे अच्छे दोस्त हो ऐसे ही बात कर लिया करो, एक बार तो उसने सर से भी बात करवा दी
"क्या जादू किया है भाई आपने मेरी बीवी पर आपकी बहुत तारीफ करती है.

समय कब कैसे जीवन को बदलता है कोई नहीं जानता और न ही कोई समझ पाता है.
मैं कंम्पनी की तरफ से एक माह की ट्रेनिंग में हैदराबाद चला गया और वह अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गयी.

एक दिन सुबह से ही स्वाति की याद आती रही , आफिस में भी उसे लेकर मन उचाट रहा आखिरकार लंच टाईम में उसे फोन लगा ही लिया.
फोन किसी पुरुष ने रिसीव किया
मैंनें कहा "स्वाति से बात करना है"
पुरुष ने भर्रायी आवाज में कहा
" वह बात नहीं कर सकती है, आज उसके पति का गंगा पूजन है" और उसने फोन काट दिया. 
 उस दिन अपने ऊपर ही क्रोध आता रहा कि मैंने इस बीच उससे बात क्योंं नहीं कि कितना लापरवाह था मैं, लगभग एक माह बाद हिम्मत जुटाकर उससे फोन पर माफी मांगी, उसने इस शर्त पर माफ किया कि मुझसे मिलने आओ तुमसे बात करके मेरे दुख हल्के हो जायेंगे
और मैं दूसरे ही दिन बस में बैठा गया.

बस सिवनी बस स्टेंड में रुकी, उतरकर एक कप चाय पी और कुछ देर बाद बालाघाट वाली बस में बैठ गया.
वह अंतिम रात कैसी रही होगी जब स्वाति सर के पास मौन बैठी होगी
सर जितना बोले होंगे उसमें गहरे अर्थ छिपे होंगे, मौन मैं ही बहुत सारी बातें हुई होंगी,क्योंकि मौन आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम होता है, सर के पास स्वाति की मौजूदगी और मृत्यु की निकटता होगी इस कशमकश में बहुत कुछ घटा होगा, सर ने स्वाति के आंसुओं को पोछने की कोशिश भी की होगी, स्वयं की लाचारी, मृत्यु का भय और स्वाति का भविष्य आंखों के सामने टूटकर बिखर रहे होंगे, सर बहुत समझाना चाह रहे होंगे पर रुंधे कंठ से आवाज़ कहां निकलती है.
उस रात स्वाति सर की मृत देह से लिपटकर बहुत देर तक रोती रही होगी.
पास में बैठे सज्जन ने मुझे हिलाया और कहा " भाई जी बालाघाट आ गया"
मैंने वर्तमान की उंगली पकड़ी और बस से उतर गया.
पास ही खड़े रिक्शे में बैठा और कहा पुराना पुलिस थाना चलो, पता पूंछते पूंछते उसके दरवाजे के सामने खड़ा हो गया,
दरवाजा खटखटाया, स्वाति ने दरवाजा खोला उसे देखकर दुख हुआ, सुंदर, गोरी, मुटदरी सी स्वाति दुबली और काली लग रही है.
वह मुझे देखते ही कहने लगी
" आ गये आभासी दुनियां के मित्र हो न इसिलिए इतने दिनों बाद याद किया"
ऐसा नहीं है, मैंने उसकी हथेलियों को अपनी हथेलियों में रखा और जोर से दबाकर कहा
अब कोहरे के बाद धुप निकलेगी.

"ज्योति खरे"

शनिवार, जून 20, 2020

पापा

अंधेरों को चीरते
सन्नाटे में 
अपने से ही बात करते पापा
यह सोचते थे कि
कोई उनकी आवाज 
नहीं सुन रहा होगा

मैं सुनता था

कांच के चटकने जैसी
ओस के टपकने जैसी
पेड़ से शाखाओं के टूटने जैसी
काले बादलों से निकलकर
बारिश की बूंदों जैसी
इन झणों में पापा
व्यक्ति नहीं
समुद्र बन जाते थे

उम्र के साथ 
पापा ने अपनी दशा और 
दिशा बदली
पर भीतर से नहीं बदले पापा
क्योंकि
उनके जिंदा रहने की वजह
रिश्तों के असतित्व को 
बचाने की जिद थी

पापा 
जीवन के किनारे खड़े होकर
नहीं सूखने देते थे
कामनाओं का जंगल
उड़ेलते रहते थे
अपने भीतर का
मीठा समुद्र

आंसुओं को समेटकर
अपने कुर्ते के जेब में
रखने वाले पापा
वास्तविक जीवन के हकदार थे

पापा
आज भी
दरवाजे के बाहर खड़े होकर 
सांकल
खटखटाते हैं------

"ज्योति खरे"



मंगलवार, जून 02, 2020

फिरोजी चुन्नी

बहुत देर से अंकिता दीवाल पर छिपकली के रेंगने और चालाकी से कीड़े को पकड़ने का संघर्ष देख रही है. छिपकली की आंखें कितनी तेज और खतरनाक होती हैं, कीड़े का साहस और बचने का तरीका भी तो किसी खतरनाक खिलाड़ी से कम नहीं होता है.
यकायक छिपकली कीड़े को पकड़ते पकड़ते अंकिता के सामने पट्ट से गिर पड़ी, वह सहम सी गयी और उसके चेहरे पर घबड़ाहट की लकीरें खिंच आयीं. वह जब तक संयत होती छिपकली दीवाल पर फिर से रेंगने लगी.
ड्राईग रुम के चुप्पी भरे माहौल में बिलकुल अकेली अंकिता सोफे पर एक गहरी सांस लेते हुए बैठ गयी, ऐसा नहीं है कि वह पहली बार अकेली है, उसे तो दो बरस हो गये हैं इस शहर में अकले रहते हुए और अपने कमरे में छिपकली और कीड़ो के संघर्ष को देखते हुए.
यह संघर्ष सिर्फ छिपकली और कीड़ो का नहीं हैं, इस तरह का संघर्ष उसका अपना भी तो रहा है, कम उम्र में मां बाप का गुजर जाना, बड़े भाई का विवाह करके बदल जाना जिस मोहल्ले में रहती थी वहां लोगों के ताने कि पढ़ती ही रहेगी या कभी विवाह करेगी, वह कैसे समझाती कि भाई  को मेरी चिंता हो तब न विवाह हो, यहां तो भाई को पड़ी है कि यह घर से कब भाग जाए.अनगिनत परेशानियों से जूझते, अपमान का चांटा सहते पढ़ाई पूरी की, बुरे समय के दौर से निकलकर सुख का रास्ता तय करने के लिए.
लेकिन आज भी अपने आप से ऐसा ही लड़ रही है, जैसा छिपकली और  कीड़े लड़ते हैं.
इस नीरस और उलझे माहौल में केवल अंकिता की सांसों की आवाज आ रही है.
वह सोफे से उठकर खिड़की के पास चली आयी, बाहर देखा सड़क पर सन्नाटों का अहसास पसरा पड़ा है.
यह वही सड़क है जिस पर चलकर वह अपना शहर छोडकर यहां प्राईवेट कालेज में पढ़ाने आयी है.
अंकिता रोज कालेज जाती और लौट आती , उसके दिमाग में यह बात हमेशा घूमती रहती है कि ,क्या सोचकर नौकरी स्वीकारी थी और क्या हो रहा है.
वह यह इस नौकरी में अपने को व्यस्त रखना चाहती थी और मन में दबी अपनी चित्रकला को कागज में उकेर कर फिर से रंग भरना चाहती है, लेकिन पुरानी यादें उसे परेशान  किए हुए हैं, कुछ नया करने का मन ही नहीं होता.
" सब बकवास है " वह बुदबुदाते हुए खिड़की पर रखी कुहनी को साफ करते हुए सोफे पर बैठ गयी.
आज अविनाश आने वाला है, परसों उसका फोन आया था, वह क्यों आ रहा है मेरे लाख पूछने पर उसने  नहीं बताया बस बातों को घुमाता रहा.
वह आम टिपिकल लड़कों से कुछ अलग ही सोच का लड़का है, हम दोनों कालेज में साथ पढ़ते थे. मजाक मजाक में बहुत गहरी बातें किया करता था लेकिन भीतर से बहुत गंभीर रहता, ऐसा मुझे महसूस होता था, मुझे उससे बात करना बहुत अच्छा लगता था, शायद उसे भी मुझसे बात करना अच्छा लगता हो, तभी तो वह मेरे बनाये चित्रों को गंभीरता से देखता था और अपनी राय भी देता था. यह वह दौर था जब हम दोनों कालेज से छूटने के बाद पास वाले बगीचे में बैठकर ढेर सारी बातें किया करते थे.वह अक्सर मुझसे पूछता था कि "तुम्हें कौन सा रंग पसंद है" मैं कई रंग बताती थी वह खीझ जाता, कहता "कोई एक रंग बताओ" 
स्मृतियां आकाश में बहुत महीन धागो से टंगी तारो जैसी होती हैं जो कभी टूटकर नहीं गिरती.
अविनाश के आने से अंकिता बहुत खुश, पर भीतर ही भीतर खीझ भी रही है, जब दो बरस से उसने मेरी कोई खबर नहीं ली, फिर अब क्यों आ रहा है.
वह उससे लड़ने का पूरा मूड बना चुकी है.
अंकिता किचन से चाय बनाकर ले आयी और चुसकियां लेते फिर से सोचने लगी और खिलखिलाकर हंसने लगी, काश! उन दिनों मैंने अपने भीतर पनपती प्रेम की झुरझुरी को मन में दबाया न होता, 
कुछ ईशारा तो किया होता, मैंने तो उससे यह भी कभी नहीं बताया कि मुझे फिरोजी रंग पसंद है.
अविनाश ने भी तो कभी नहीं कहा न कोई भी संकेत दिया, जिसे मैं समझ पाती.
खैर !
वह अपने वर्तमान में लौट आयी,  
चाय को एक ही घूंट में खत्म किया और अविनाश को लेने स्टेशन जाने की तैयारी करने लगी.
वह स्टेशन ट्रेन आने से पहले पहुंच गयी, ट्रेन समय से ही आ गयी.
अंकिता उसे दूर से देखते ही पहचान गयी, दौड़कर अविनाश के पास आयी और हाथ पकड़कर बोली, तुम आ गये, उसने कहा "तूम्हारे सामने खड़ा हूं"
अविनाश ने अपने बैग से एक पैकेट निकालकर अंकिता को देते हुए कहा, मम्मी ने तुम्हारे लिए भेजा है, खोलकर देख लो"
अंकिता ने पैकैट खोला 
अरे वाह "फिरोजी रंग की चुन्नी" और वह बहुत देर तक रोती रही--

" ज्योति खरे "

बुधवार, मई 27, 2020

बूढ़े आदमी की पर्ची

एक मित्र का फोन आया कहने लगा "तुम्हें कोई पर्ची मिली क्या"
मैंने कहा कैसी पर्ची, वो बोला " जब मिलेगी तो पढ़ना, मुझे तो मिली है पर बताऊंगा नहीं क्या लिखा है" मेरे आग्रह के बाद भी उसने नहीं बताया. बात खत्म होने के कुछ देर बाद पर्ची का ख्याल दिमाग से गायब हो गया. दो दिन बाद फिर एक मित्र का फोन आया "कोई पर्ची मिली क्या."
मौहल्ले में कुछ लोगों से पूछा तो सबने कहा पर्ची के बारे में सुना तो है पर ज्यादा जानकारी नहीं है और जिनको मिली है वे बता भी नहीं रहे कि क्या लिखा है, कहतें हैं जब मिलेगी तो पढ़ना.
कुछ दिनों बाद, भरी दोपहर में एक आवाज आयी
 " दरवाजा खोलिये" 
बाहर निकलकर देखा एक बूढ़ा आदमी खड़ा है, मैंने पूछा "कहिये" 
उसने अपने थैले में से एक पर्ची निकाली और मुझे देते हुए कहने लगा "यह आपके लिए है इसे आराम से पढ़ना  पर किसी को बताना नहीं कि इसमें क्या लिखा है, बस सोचना और समझना"
और वह चला गया.
अंदर आकर पर्ची खोली और पढ़ने लगा--
पैदा हुआ तो बाप ने चुप कराया, स्कूल गया तो मास्टर ने चुप कराया, कालेज गया तो सीनियर ने चुप कराया, नौकरी में अधिकारी, बाजार में व्यापारी, विवाह के बाद पत्नी मुझे और मैं पत्नी को चुप कराता रहा, बेटी मम्मी को और बेटा मुझे चुप कराते रहे, बहू और बेटी अपनी अपनी ससुराल में चुप, स्वतंत्रता के बाद से बड़े, मझोले और छोटे नेता चुप कराते रहे, डाक्टर, नर्स, कामवाले और पड़ोसी भी चुप कराते रहे.
जीवन भर चुप ही रहा, आप भी इस चुप्पी के शिकार होंगे, परिवार, रिश्तेदार, दोस्त, अड़ोसी,पड़ोसी सभी इस चुप्पी के तले दबे हैं.
यह चुप्पी हमारे अस्तित्व  हमारी स्वतंत्रता,हमारे अधिकरों और हमारी महत्वकांक्षाओं को नष्ट कर रही है और हम मनुष्य से जानवर में परिवर्तित हो रहें हैं.
अब समय है चुप्पी तोड़ने का, अब हमें असंख्य आवाजों के साथ चीखना होगा.
हम सब की मिलीजुली चीख काले आसमान को फाड़कर, नये सूरज का स्वागत करेगी.
एक बूढ़ा आदमी
मरने से पहले
आसमान में
प्रतिरोध की
चीख सुनना चाहता है---

"ज्योति खरे"

सोमवार, मई 25, 2020

ईद मुबारक

सुबह से 
इंतजार है 
तुम्हारे मोंगरे जैसे 
खिले चेहरे को
करीब से देखूं
ईद मुबारक 
कह दूं

पर तुम 
शीरखोरमा
मीठी सिवैंईयां
बांटने में लगी हो

मालूम है
सबसे बाद में
मेरे घर आओगी
दिनभर की 
थकान उतारोगी
बताओगी
किसने कितनी 
ईदी दी

तुम 
बिंदी नहीं लगाती हो
पर में
इस ईद में
तुम्हारे माथे पर
गुलाब की पंखुड़ी 
लगाना चाहता हूं

मुझे नहीं मालूम
तुम इसे
प्रेम भरा
बोसा समझोगी
या गुलाब की सुगंध का
कोमल अहसास
या ईदी

अब जो भी हो
प्रेम को 
जिंदा रखना है
अपन दोनों को

"ज्योति खरे"


सोमवार, मई 18, 2020

लौट रहें हैं अपने गांव--

तुम्हारे वादों को 
आवाजों को
सिरे से खारिज कर 
अपने मजबूत पांव में
बांधकर आत्मनिर्भरता
हम तो लौट रहें हैं अपने गांव--

शातिरों ने
संवेदनाएं
लिखकर कागज में भेजी
रोटियों के बदले
खाली पन्नी भेजी
झुलसा हुआ जीवन
भींग रहा है
भूखा पेट चीख रहा है
तुम बचाओ अपना आत्मसम्मान
हम तो लौट रहे हैं अपना गांव--

सूरज की खामोशियां
सब जानती हैं
तपती हवायें
पसीने और आंसुओं को
पहचानती हैं
लाठियां क्या रोकेंगी 
हमारे इरादे 
तुम्हारे शब्दजालों को फाड़कर
हम तो लौट रहें हैं अपने गांव---

उजाले 
कितने चालक निकले
दे गये धोखा
इन दिनों
पास में माचिस तो है
पर तीली नहीं 
है सिर्फ धोखा

आश्वासनों की दुकान से
रहन रखे 
जीवन को छुड़ाकर
हम तो लौट रहे हैं अपने गांव
हम तो लौट रहे हैं अपने गांव----

"ज्योति खरे"

शनिवार, मई 09, 2020

घर पहुंचने की चाहत में--

घर पहुंचने की चाहत में
निकले थे 
गमछे में 
कुछ जरूरी सामान बांधकर
कि, रास्ते में चलते समय
जब बहुत हताश 
और भूख से बेहाल हो जायेंगे
तो किसी 
पुराने पेड़ के नीचे बैठकर
भीख में मिली
सूखी रोटियों को
पानी के साथ खायेंगे
पेड़ की छांव की बैठकर 
दर्द से टूट रही
हड्डियों को सेकेंगे

सोचा हुआ 
कहां हो पाता है पूरा
सच तो यह है कि
घर से निकलने 
और लौटने का रास्ता
दो सामानंतर रेखाओं से
होकर जाता है
एक पर पांव होते हैं
और दूसरी पर सिर

हादसों के चके
सिर और पांव को
कुचल देते हैं
धड़
दो रेखाओं के बीच 
निर्जीव पड़ा रहता है

घर में तो केवल
गमछे में बंधा 
कुछ सामान पहुंचता है---

"ज्योति खरे"


शुक्रवार, मई 01, 2020

कहां खड़ा है हमारा मजदूर--

स्वतंत्र भारत के प्राकृतिक वातावरण में हम बेरोक टोक सांस ले रहे हैं, पर एक वर्ग ऐसा है, जिसकी साँसों में आज भी नियंत्रण है.
ये वर्ग है हमारा "मजदूर"- 
"दुनियां के मजदूरों एक हो" का नारा पूरी दुनियां में विख्यात है,क्या केवल नारों तक सीमित है मजदूर "कामरेड" और लाल सलाम जैसे शब्दों के बीच अरसे से घुला-मिला यह मजदूर.अपने आप को ही नहीं समझ पाया है कि वह वास्तव में क्या है. 
सच तो ये है कि जिस तेजी से जनतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे देश में,मजदूरों के हितों का आन्दोलन चला उतनी ही तेजी से बिखर भी
गया,मजदूरों के कंधों से क्रांति लाने वाले हमारे नेता,आंदोलनकारी 
अपने चरित्र से गिरे और धीरे धीरे उनके लक्ष्य भी बदलने लगे. 
 एकता का राग अलापते श्रमजीवियों के मठाधीश,नारे,हड़ताल,और जुलूसों की भीड़ में अपने आप को माला पहने, फोटो खिंचवाने की होड़ में जुटे रहे, और बेचारा मजदूर यह नहीं समझ पा आया कि हमारे नेता तो व्यक्तिगत सुधार में लगें हैं.
मजदूर तो केवल इतना समझता है कि हम जितनी माला अपने नेताओं को पहनायेंगे उससे दुगनी हमारी तरक्की होगी, रोटियों की संख्या बढ़ेगी. 
उसे क्या पता कि वह कितना भोला है
लच्छेदार बातों में उलझ रहा है और अपने हिस्से की रोटियां उन्हें दे रहा है.  
 "मई दिवस" मेहनत करने वाले,
कामगारों के अधिकारों के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.
इसका अपना एक ऐतिहासिक महत्व है, यह एक विचारधारा है.
सभ्य समाज का इतिहास अपनी तरह से वर्गों की उपज है,
यही उपज वर्तमान में शोषक के रूप में उभरी है. 
जब सामंती समाज था तो जमीन थोड़े से लोगों के कब्जे में थी,
इस जमीन पर काम करने वाले अपने मालिक की आय बढ़ाया करते थे.
"जमीन के गुलामों"का यह वर्ग अपने बुनियादी हकों से वंचित था,
साथ ही साथ इन पर जुल्म होते थे.धीरे धीरे विज्ञानं ने तरक्की की,
कल-कारखाना समाज की स्थापना हुई, इस बदलाव से पूंजीवादी विचारधारा वाले ही लाभ ले सके.
गुलाम गुलाम ही रहें,
फर्क सिर्फ इतना हुआ की दास प्रथा से थोड़ा मुक्त हुये और
"कामगार" कहलाने लगे,पर शोषण और अत्याचार से मुक्ति नहीं मिल पायी आज तक.
           1789 में फ़्रांस की क्रांति में पहली बार इस वर्ग ने असंतोष प्रकट 
किया.
18 वीं शताब्दी के समाप्त होते होते तक कल कारखाना समाज का ढांचा तेजी से उभरने लगा था,
फ़्रांस की क्रांति सिर्फ इसलिये महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इसने राज्य शक्ति को समाप्त किया,बल्कि इस क्रांति का महत्व इसलिये है कि पहली बार सदियों से शोषित वर्ग ने एक करवट ली और इसी करवट ने एक इतिहास बनाया.
औद्योगिक समाज में पनपती पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरों ने पहली बार अपना असंतोष जाहिर किया.
मजदूर शोषण की जटिल गिरफ्त में था ,इससे मुक्त होना चाहता था,धीरे-धीरे इस मुक्त होने की इच्छा को संगठित किया,जो विरोध फ़्रांस की 
क्रांति के समय फूटा था,उसने एक विचारधारा का रूप लिया, 
इस विचारधारा का नाम रखा "मार्क्सवाद" 
"मार्क्स"ने पहली बार मजदूरों की भूमिका और इतिहास पर एक नयी नजर डाली, इसका आंकलन किया और एक नारा दिया 
"दुनियां के मजदूरों एक हो" 
उन्होने प्रथम इंटरनेशनल 
मजदूर संघ की स्थापना की.
1879 की पहली शताब्दी के मौके पर मजदूरों के हकों की पहली लड़ाई पर उसकी याद में "एक मई"को अंतराष्ट्रीय "श्रमिक दिवस" के रूप में 
मनाने की घोषणा की गयी.
इस व्यवस्था से मजदूर और सचेत हुये, राजनैतिक पार्टियां मजदूरों के हितों की चर्चा करने लगीं
"हड़ताल" एक नया शब्द जुड़ा.
यह इतिहास है.पर वास्तविकता यह है कि आज भी "मजदूर "अपने हक़ के लिये लड़ रहा है.
क्या कभी मजदूर शोषण से मुक्त हो पायेगा.
भौतिकवादी युग में सभी की आवश्यकतायें बढ़ती जा रहीं हैं,
पर बेचारा मजदूर ज्यों का त्यों है,
न वह भौतिकता को समझ पा रहा, 
न ही इस ओर ध्यान दे पा रहा है.
        "सर्वहारा"वर्ग की बात करना सहज है पर सहज नहीं है इनके 
ऊपर हो रहे शोषण से मुक्त कराना.
नारे,जलशों,जुलूसों से इनके खिलाफ हो रहे शोषण को उजागर तो किया जाता है, बड़े-बड़े अधिवेशनों में इनकी तरक्की की चर्चा होती है पर यह केवल औपचारिकता है,यह महज 
चाय,नाश्ते और डिनर में समाप्त हो जाती है.
निजी स्वामित्व की आकांक्षाओं,
गतिविधियों,विचारधाराओं, और क्षमताओं का अब अधिक जोर है.
अपने अपने दबदबे,अपने अपने 
व्यक्तित्व को शिखर पर ले जाने की कार्यप्रणाली ज्यादा सक्रिय है,
यही सक्रियता अब वर्ग विरोधों में बंट गयी है.अब हम जिस समाज में रहते हैं, उसके दो वर्ग हो गये हैं एक "धनपति"और दूसरा"गरीब"--शोषक और मजदूर यह ध्रुवीकरण पूंजीवादी 
समाज में विशेष रूप से बढ़ता जा रहा है, व्यक्तिवाद और 
अहंवाद अपनी चरम सीमा पर है.
विकास के नाम पर नेता या पूंजीपति इसका लाभ ले रहें हैं.जिनके विकास के लिये कार्यक्रम होता है,
वे इस विकास के मायने से वाकिफ भी नहीं हो पाते.
सड़क और बिल्डिंग बनाने में अपना पसीना टपकाने वाले मजदूर न कभी महानगरीय सड़क पर चल पाये और न ही पक्के मकान में रह पाये 
वेतन और सुविधाओं के मामले में मजदूर आर्थिक प्रक्रिया के कुचक्र में फंस हुआ है,वह अपने अधिकारों से भी वंचित है.
"रोटी" के चक्कर में उसे अपनी तमाम योग्यताओं और प्रतिभा की बलि चढ़ाना पड़ती है.
आधुनिकीकरण और कम्प्यूटरीकरण के इस युग में सामाजिक और मानवीय मान्यतायें खोखली हो गयीं हैं.आर्थिक नीतियां भी प्रशासनिक सेवाओं के इर्द-गिर्द घूम रहीं हैं,
मजदूरों के वेतन की सारी  परिभाषायें
जर्जर हो गयी हैं. 
मजदूरों के विकास की सारी बातें,
सरकारी फाइलों में लिखी हैं,
इन फाइलों को दीमक खा रही है.
सारे के सारे उद्देश्य बेजान हो गयें हैं.
कई दशकों से मजदूरों का शोषण हो रहा है इस शोषण को सरकार और राज्य सरकारें जानती हैं.
पर मजदूरों के हित में कुछ भी नहीं करना चाहती हैं.
भारत में लगभग चार करोड़ मजदूर हैं जिनके बल पर ही देश 
का विकास होता है,कल कारखाने चलते हैं बडी बडी ईमारतें बनती हैं,
इनके ही पसीना बहाने से पैसा आता है, जो पूंजपतियों के जेबों में जाता है. सरकार मजदूरों के संबंध में सब जानती है पर अनदेखा करती है 
काश सरकार ने कभी इनकी सुविधा का ध्यान रखा होता तो आज जो 
कोरोना दौर में मजदूरों की फजीहत हो रही वह न होती.
मजदूर सड़क पर न आते, भूखे नहीं रहते अगर ईमानदारी की बात कही जाय तो इन प्रताड़ित मजदूरों ने 
सरकार और राज्य सरकारों की कलई खोल दी है,और देश दुनियां को दिखा दिया कि देख लो भारत का वास्तविक सच.
नंगी जमीन पर सोने वालों को इंतजार है एक सुखद सपने का.
"मजदूर दिवस"हर वर्ष आता है,
चला जाता है, मजदूर वहीँ खड़ा है 
जहां से चला था.
मजदूर तो एक चाबीदार खिलौना है,
जिसके साथ खेला जाता है.
समय ने करवट बदली बदली है 
अब मजदूरों को फिर से एक जुट होना चाहिए, अपने संघर्षों पर विजय पाने के लिए नये सिरे से लड़ना चाहिए, अपने संस्कारों,
अपने परिवार के चरमराये संघर्ष को 
चुपचाप अपनी टपरिया में सुलाना 
नहीं चाहिए बल्कि अपने हक की आवाज को बुलंद करना चाहिए-
मजदूरों को लाल सलाम--
मजदूर एकता जिन्दाबाद--

 "ज्योति खरे"

बुधवार, अप्रैल 15, 2020

मृत्यु ने कहा- मैं मरना चाहती हूं---

मैं अहसास की जमीन पर ऊगी
भयानक, घिनौनी, हैरतंगेज
जड़हीना अव्यवस्था हूं
जीवन के सफर में व्यवधान
रंग बदलते मौसमों के पार
समय के कथानक में विजन

मैं जानना चाहती हूं
अपनी पैदाइश की घड़ी
दिन, वजह
जैसे भी जी सकने की कल्पना 
लोग करते हैं
क्या वैसा ही
मैं उन्हें करने देती हूं
शायद नहीं

प्रश्न बहुत हैं
मुझमें मुझसे
काश ! विश्लेषण कर पाती
मृत्यु नाम के अंधेरे में नहीं
स्वाभाविक जीवन क्रम में भी
अपनी भूमिका तय कर पाती

मैं सोचती थी
प्रश्न सभी हल कर दूंगी
संघर्षों से मुक्त कर दूंगी
लोग करेंगे मेरी प्रतीक्षा 
वैसे ही 
जैसे करते हैं जन्म की
मेरा अस्तित्व 
अनिर्धारित टाइम बम की तरह है
हर घड़ी गड़ती हूं 
कील की तरह 

हर राह पर मैंने
अपना कद नापा है
मापा है अपना वजन
मेरी उपस्थिति से ज्यादा
भयावह है 
मेरा अहसास
पर मैं कभी नहीं समा पायी
लोगों के दिलों की
छोटी सी जिन्दगी में
मुझे हमेशा
फेंक दिया गया
अफसोस की खाई में

क्यों लगा रहे हो मुझे गले
मरने से पहले 
प्रेम की दुनियां में
किसी सुकूनदेह 
घटना की तरह

मैं अब 
भटकते भटकते 
बेगुनाह लोगों को मारते 
ऊकता गयी हूं
क्या करुं
नियति है मेरी
जो भी मेरे रास्ते में मिलेगा 
उसे मारना तो पड़ेगा

मैं अपने आप को
मिटा देना चाहती हूं 
स्वभाविक जीवन और 
तयशुदा बिन्दुपथ से

बस एक शर्त है मेरी
बंद दरवाजों के भीतर 
अपनों के साथ 
अपनापन जिंदा करो
क्योंकि
मेरे रास्ते में 
जो भी व्यवधान डालेगा
वह पक्का मारा ही जायेगा

मुझे सुनसान रास्ते चाहिए
ताकि मैं 
बहुत तेज दौड़कर
किसी विशाल 
पहाड़ से टकराकर 
टूट- फूट जाऊं
क्योंकि 
मैं मरना चाहती हूं
मैं मरना चाहती हूं---

( इसे यूट्यूब पर भी सुन सकते हैं- http://www.youtube.com/c/jyotikhare  )





शनिवार, अप्रैल 04, 2020

इन दिनों सपने नहीं आते


सपने
अभी अभी लौटे हैं
कोतवाली में
रपट लिखाकर

दिनभर
हड़कंप मची रही
सपनों की बिरादरी में
क्या अपराध है हमारा
कि आंखों ने
बंद कर रखे हैं दरवाजे

बचाव में
आंखों ने भी
रपट लिखा दी
दिनभर की थकी हारी आंखेँ
नहीं देखना चाहती सपने

जब समूची दुनियां में
कोहराम मचा हो
मृत्यु के सामने 
जीवन
जिंदा रहने के लिए 
घुटनों के बल खड़ा 
गिड़गिड़ा रहा हो 

मजदूर और मजबूर लोग 
शहरों और महानगरों से
अपना कुछ जरुरी सामान 
सिर पर रखकर 
पैदल जा रहें हों

भुखमरी ने पांव पसार  लिए हों 
भय और आशंका ने  
दरवाजों पर सटकनी चढ़ा रखी हो
नींद आंखों से नदारत हो तो 
आंखें   
सपने कहां देख पायेंगी
इनसे केवल 
आंसू ही टपकेंगे 

सपने और आंखों की
बहस में 
शहर में 
लोगों में 
तनाव और दंगे का माहौल बना है
शांति के मद्देनजर
दोनों हवालात में
नजरबंद हैं

जमानत के लिए
अफरा तफरी मची है-----


सोमवार, मार्च 23, 2020

सन्नाटा


सन्नाटे के गाल पर 
मारो नहीं चांटा
गले लगाओ इसे

घबड़ाहट में यहां वहां
भाग रहे मौसम को
छतों,बालकनी 
आंगन पर पसरे सन्नाटे के 
करीब लाओ
यह दोस्ती 
हमें जिंदा रहने की 
ताकत देगी

कई दशकों बाद
कुआं , तलाब और छांव
की स्मृतियां ताजा हो रहीं हैं
उदास कुत्तों के 
हांफने की आवाजें आ रहीं हैं

चिड़ियां 
छतों पर बैठने से 
नहीं कतरा रहीं 
ऐसे एकांत समय में
इन्हें दाना पानी
तो दिया ही जा सकता है

सन्नाटे को 
कभी समझा ही नहीं  
समझ तो तब आया
जब बूढ़े मां बाप से 
बात करते समय 
उनके चेहरों से 
अपनेपन का संतोष 
आंखों से टपक गया 

सन्नाटे ने 
प्रेम करने का सलीका सिखाया
बच्चों ने 
दिन में कई बार भीतर तक 
गुदगुदाया

सन्नाटा 
तुम
सुधार तो दोगे देश के हालात
पर निवेदन है
सुधारते रहना 
समय समय पर
मध्यमवर्गीय परिवारों के
मानसिक हालात

छुट्टी के दिन 
बिना आहट के आना
स्वागत रहेगा तुम्हारा---


मंगलवार, मार्च 17, 2020

कोरोना


विषाणु
कतई लापरवाह नहीं है
इसे याद है 
अपना शिविर-घर
चालाक और समझदार भी है
जानता है कि
इसके इशारे से ही 
दिल धड़केगा 
या नहीं धड़केगा
आंसुओं का बहना या ना बहना
यही तय करेगा

समय की नब्ज को 
टटोलकर पहले इसने जाना
कि,जब समूची दुनियां के मनुष्य
अपने ही आप से झूझ रहें हों
तो आसानी से इनके भीतर
घुसा जा सकता है

वह यह भी जानता है कि 
मनुष्य 
हजार विडंबनाओं के बावजूद 
प्रेम-स्पर्श और सदभाव के
रास्ते चलता है

वह चुपचाप 
सदभाव के रास्ते चला
अंधेरे और उजाले के बीच के क्षणों में 
आक्सीजन में मिले कणों के साथ
भीड़ भरे इलाकों में घुसकर 
बना लिया
लाल,सफ़ेद रक्त कोशिकाओं के मध्य
अपना शिविर-घर

माईक्रोस्कोप से गुजरते हुए
दुनियां की किसी प्रयोगशाला में
नहीं पकडा़या 

वह कौन था----?
जिसने इसे पहली बार 
महसूसा होगा
परखा होगा
सुख को दुःख में बदलने के बाद
प्रेम को प्रेम से बिछडने के बाद

शायद
इसी शख्स ने रखा होगा
इस अद्रश्य सूक्ष्म विषाणु का नाम
मृत्यु का तांडव
कोरोना


रविवार, मार्च 08, 2020

चाहती हैं स्त्रियां


ईट भट्टोंँ में
काम करने वाली स्त्रियां
चाहती हैं
कि, उनका भी 
अपना घर हो

खेतों पर
भूखे रहकर
अनाज ऊगाने वाली स्त्रियां
चाहती हैं
कि, उनका भी
और उनके बच्चों का
भरा रहे पेट

मजबूर और गरीब स्त्रियां
चाहती हैं
कि, उनकी फटी साड़ी मेँ  
न लगे थिगड़ा
सज संवर कर
घूम सकें बाजार हाट

यातनाओं से गुजर रही स्त्रियां
चाहती हैं
कि , कोई 
उलझनों की
खोल दे कोई गठान 
ताकि उड़ सकें
कामनाओं के आसमान में
बिना किसी भय के

ऐसी स्त्रियां चाहती हैं
देश दुनियां में 
केवल सुख भोगती स्त्रियों का 
जिक्र न हो
जिक्र हो 
उपेक्षा के दौर से गुजर रहीं स्त्रियों का

रोज न सही 
महिला दिवस के दिन तो 
होना चाहिए---

बुधवार, मार्च 04, 2020

यार फागुन


यार फागुन
सालभर में एक बार
चले आते हो दबे पांव
खोलकर प्रेम के रहस्यों को
फिर चले जाते हो

तुम केवल
बात करते हो 
रंगदारी से रंगों की
प्रेम के मनुहार की

यार फागुन
शहर की
संकरी गलियों में भी
झांक लिया करो
मासूम गरीबों के सपने
रंगहीन पानी की तरह 
बहता मिलेंगे
झोपड़ पट्टी में
कुछ दिन गुजारो
भूखे बच्चों के शरीर में
कपड़ों के नाम पर
चिथड़ा ही मिलेंगे

यार फागुन
उजड़ते गांव में भी 
एकाध बार आओ
जहां पैदा तो होता है अनाज
पर रोटियां की कमी है
सर्वहारा वर्ग को
गुझिया के चक्कर में 
कर्ज में ना लादो

यार फागुन
एक चुटकी गुलाल
मजदूरों के गाल पर भी मल देना
गुस्सा मत होना
दोस्त हो
बिना गुलाल के भी
गले लगा लेना

यार फागुन
आते रहना इसी तरह
हर साल
तुम्हारे बहाने 
रुठों को गले लगा लेते हैं
दुश्मनों के माथे पर
टीका लगाकर
अपना बना लेते हैं------

गुरुवार, फ़रवरी 27, 2020

सावधान हो जाओ


बादल दहाड़ते आते हैं
बिजली
बार-बार चमककर
जीवन के
उन अंधेरे हिस्सों को दिखाती है
जिन्हें हम अनदेखा कर
अपनी सुविधानुसार जीते हैं
और सोचते हैं कि,
जीवन जिया जा रहा है बेहतर

बादल बिजली का यह खेल
हमें कर रहा है 
सचेत और सर्तक
कि, सावधान हो जाओ
आसान नहीं है अब
जीवन के सीधे रास्ते पर चलना

लड़ने और डटे रहने के लिए
एक जुट होने की तैयारी करो

बेहतर जीवन जीने के लिए
पार करना पड़ेगा
बहुत गहरा दलदल ----


शुक्रवार, फ़रवरी 14, 2020

अपन दोनों

देखते,सुनते,झगड़ते चौंतीस वर्ष   
हो गये
************
तुम्हारे मेंहदी रचे हाथों में
रख दी थी मैंने
अपनी भट्ट पड़ी हथेली
और तुमने
महावर लगे पांव
रख दिये थे 
मेरे खुरदुरे आंगन में

साझा संकल्प लिया था 
कि,बढेंगे मंजिल की तरफ एक साथ

सुधारने लगे खपरैल छत
जिसमें
गर्मी में धूप 
छनकर नहीं
सूरज के साथ उतर आती थी
बरसात बिना आहट के
सीधे कमरे में बरस जाती थी
कच्ची मिट्टी के घर को
बचा पाने की विवशताओं में
पसीने की नदी में
फड़फड़ाते तैरते रहे 

फासलों को हटाकर
अपने सदियों के संकल्पित
सपनों की जमीन पर लेटकर
प्यार की बातें करते रहे
अपन दोनों

साझा संकल्प तो यही लिया था
कि,मार देंगे
संघर्ष के गाल पर तमाचा
और जीत के जश्न में
हंसते हुए
एक दूसरे में
डूब जायेंगे 
अपन दोनों---

"ज्योति खरे"

बुधवार, फ़रवरी 05, 2020

मेरी नागरिकता की पहचान


मेरी नागरिकता की पहचान
उसी दिन घोषित हो गयी थी
जिस दिन
दादी ने
आस-पड़ोस में
चना चिंरोंजी
बांटते हुए कहा था
मेरे घर
एक नया मेहमान आने वाला है
मेरी नागरिकता की पहचान
उसी दिन घोषित हो गयी थी
जिस दिन
मेरी नानी ने
छत पर खड़े होकर
पड़ोसियों से कहा था
मैं नानी बनने वाली हूं
मेरी नागरिकता की पहचान
किसी सरकारी सफेद पन्ने पर
काली स्याही से नहीं
लिखी गयी है
मेरी पहचान तो
मां के पेट में उभरी
लकीरों में दर्ज है
जो कभी मिटती नहीं हैं
सृष्टि का यह सत्य
हमारी नागरिकता की वास्तविक
पहचान है---

सोमवार, फ़रवरी 03, 2020

प्रेम को बचाने के लिए

मेरी जमानत का
इंतजाम करके रखना

जा रहा हूं
व्यवहार की कोरी कापी में
प्रेम लिखने
हो सकता है
लिखते समय
मुझे लाठियों से मारा जाए
सिर फोड़ दिया जाए
या मेरे घर पर
पत्थर बरसायें जाए
कोतवाली में रपट लिखा दी जाए

प्रेम
खेमों और गुटों में विभाजित हो गया है

दोस्तों तैनात हो जाओ
प्रेम को बचाने के लिए---

"ज्योति खरे"

मंगलवार, जनवरी 28, 2020

आम आदमी के हरे भरे सपने

हरे-भरे सपने
***********
आम आदमी के कान में
फुसफुसाती आवाजें
निकल जाती हैं
यह कहते हुए
कि,
टुकड़े टुकड़े जमीन पर
सपनें मत उगाओ

जानते हो
कबूतरों को
सिखाकर उड़ाया जाता है
लाल पत्थरों के महल से
जाओ
आम आदमी के
सुखद एहसासों को
कुतर डालो
उनकी खपरीली छतों पर बैठकर
टट्टी करो
कुतर डालो सपनों को

सपने तो सपने होते हैं
आपस में लड़ते समय
जमीन पर गिरकर
टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं

काले समय के इस दौर में
सपनों को ऊगने
भुरभुरी जमीन चाहिए
तभी तो सपनें
हरे-भरे लहरायेंगे---

"ज्योति खरे"

बुधवार, जनवरी 22, 2020

बसंत तुम लौट आये हो

बसंत तुम लौट आये
****************
अच्छा हुआ
इस सर्दीले वातावरण में
तुम लौट आये हो

सुधरने लगी है
बर्फीले प्रेम की तासीर
जमने लगी है
मौसम की नंगी देह पर
कुनकुनाहट

लम्बे अंतराल के बाद
सांकल के भीतर से
आने लगी हैं
खुसुर-फुसुर की आवाजें
सांसों की सनसनाहट से
खिसकने लगी है रजाई

धूप
दिनभर इतराती
चबा चबा कर
खाने लगी है
गुड़ की लैय्या 
औऱ आटे के लड्डू

वाह!! बसंत
कितने अच्छे हो तुम
जब भी आते हो
प्रेम में सुगंध भरकर चले जाते हो---

" ज्योति खरे "

गुरुवार, जनवरी 16, 2020

गुस्सा हैं अम्मा

गुस्सा हैं अम्मा
***********
नहीं जलाया कंडे का अलाव
नहीं बनाया गक्कड़ भरता
नहीं बनाये मैथी के लड्डू
नहीं बनाई गुड़ की पट्टी
अम्मा ने इस बार--

कड़कड़ाती ठंड में भी
नहीं रखी खटिया के पास
आगी की गुरसी

नहीं गाये
रजाई में दुबककर
खनकदार हंसी के साथ
लोकगीत
नहीं जा रही जल चढाने
खेरमाई
नहीं पढ़ रही
रामचरित मानस--

जब कभी गुस्सा होती थी अम्मा
झिड़क देती थीं पिताजी को
ठीक उसी तरह
झिड़क रहीं हैं मुझे

मोतियाबिंद वाली आंखों से
टपकते पानी के बावजूद
बस पढ़ रहीं हैं प्रतिदिन
घंटों अखबार

दिनभर बड़बड़ाती हैं
अलाव जैसा जल रहा है जीवन
भरते के भटे जैसी
भुंज रही है अस्मिता
जमीन की सतहों से
उठ रही लहरों पर
लिखी जा रही हैं संवेदनायें
घर घर मातम है
सड़कों पर
हाहाकार पसरा पड़ा है

रोते हुये गुस्से में
कह रहीं हैं अम्मा
यह मेरी त्रासदी है
कि
मैने पुरुष को जन्म दिया
और वह तानाशाह बन गया--

नहीं खाऊँगी
तुम्हारे हाथ से दवाई
नहीं पियूंगी
तुम्हारे हाथ का पानी
तुम मर गये हो
मेरे लिये
इस बार
हर बार---------

"ज्योति खरे"

सोमवार, जनवरी 13, 2020

सिगड़ी में रखी चाय

सिगड़ी में रखी चाय
****************
गली की
आखिरी मोड़ वाली पुलिया पर बैठकर
बहुत इंतजार किया
तुम नहीं आयीं
यहां तक तो ठीक था
पर तुम घर से निकली भी नहीं ?

मानता हूं
प्रेम दुनियां का सबसे
कठिन काम है

तुम अपने आलीशान मकान में
बैठी रही
मैं मुफ्त ही
अपनी टपरिया बैठे बैठे
बदनाम हो गया

बर्फीला आसमान
उतर रहा है छत पर
सोच रहा ह़ू
कि आयेंगे मेरे लंगोटिया यार
पूछने हालचाल

रख दी है
सिगड़ी पर
गुड़,सौंठ,तुलसी की चाय उबलने
यारों के ख्याल में ही डूबा रहा

हक़ के आंदोलन के लिए
लड़ने वाले
ईमानदार लड़ाकों को
भेज दिया गया है
हवालात में
जमानत लेने में
बह गया पसीना

सिगड़ी में रखी चाय
उफन कर बह रही है----

"ज्योति खरे"

शनिवार, जनवरी 04, 2020

कुछ नया होना चाहिए

नये वर्ष में
********
इस धरती पर
कुछ नया
कुछ और नया होना चाहिए

चाहिए
अल्हड़पन सी दीवानगी
जीवन का
मनोहारी संगीत
अपनेपन का गीत

चाहिए
सुगन्धित हवाओं का बहना
फूलों का गहना
ओस की बूंदों को गूंथना
कोहरे को छू कर देखना 
चिड़ियों सा चहचहाना
कुछ कहना
कुछ बतियाना--

इस धरती पर
कितना कुछ है
गाँव,खेत,खलियान
जंगल की मस्ती
नदी की दौड़
आंसुओं की वजह
प्रेम का परिचय
इन सब में कहीं
कुछ और नया होना चाहिए
होना तो कुछ चाहिए

चाहिए
किताबों,शब्दों से जुडे लोग
बूढों में बचपना
सुंदर लड़कियां ही नहीं
चाहिए
पोपले मुंह वाली वृद्धाओं  में
खनकदार हंसी--

नहीं चाहिए
परचित पुराने रंग
पुराना कैनवास
कुछ और नया होना चाहिए
होना तो कुछ चाहिए ---------

"ज्योति खरे"