शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2012

रेत

रेत
तुमसे बात करना
तुम्हे मुट्ठी में भरना
तुम्हारी भुरभुरी छाती पर
उँगलियों से नाम लिखना
बहुत भाता है
तुमसे कई जन्मों का नाता है-------

रेत
अपनी लगती हो तुम
चिपक जाती हो
खुरदुरी देह पर
भर जाती हो 
खली जेब में-------

रेत
कल्पनाओं की जमीन पर बना
अहसास का घरौंदा हो
सहयोग से ही तुम्हारे
बनते हैं पदचिन्ह
नहीं मिटाती तुम
अपनी चमकीली देह पर बने
 उंगलियों के निशान--------

रेत
अपनी संगठित परत में
समा लो
जीवन की नदी में
अपने साथ बहा लो---------
                "ज्योति खरे"
(उंगलियाँ कांपती क्यों हैं---से )
 



6 टिप्‍पणियां:

Shubhansh Khare ने कहा…

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बेनामी ने कहा…

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सीमांत सोहल ने कहा…

सहज,सरल कविताएं !

सीमांत सोहल ने कहा…

सहज,सरल कविताएं

shivangi ने कहा…

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shivangi ने कहा…

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