गुरुवार, फ़रवरी 14, 2013

प्रेम *******


पुरखों की पगड़ी में बंधा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है-----

फूलों का रंग
भवरों की जान
बसंत सी मादकता
पतझर में ठूंठ सा है----

जंगली जड़ी बूटियों का रसायन
सूखे रॊग की ताबीज में बंद
झाड़ फूक की दवा है-----

चाहे जब
उछाल दिया जाता है आकाश में
मासूम बच्चे की तरह
गिरता है
उल्का पिंड बनकर    
कोमल दूब से निखरी जमीन पर

फेंक दिया जाता है
कोल्ड ड्रिंग्स की बोतलों के साथ
समा जाता है अंतस में
चाय की चुस्कियों के संग
च्यूइंगम की तरह
घंटों चबता है-------

बूढे माँ बाप की
दवाई वाली पर्ची में लिखा
फटी जेब में रखा
भटकता रहता है-----                                

और अंत में
मुर्दे के संग
मुक्ति धाम में
जला दिया जाता है-------

"ज्योति खरे" 

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