मंगलवार, अप्रैल 30, 2013

कहाँ खड़ा है आज का मजदूर------?



मजदूर दिवस पर-----
 
स्वतंत्र भारत के प्राकृतिक वातावरण में हम बेरोक टोक सांस ले 

       रहे हैं, पर एक वर्ग ऐसा है, जिसकी साँसों में नियंत्रण है,ये वर्ग है 
       हमारा "मजदूर"- "दुनियां के मजदूरों एक हो" का नारा पूरी दुनियां 
       में विख्यात है,क्या केवल नारों तक सीमित है,मजदूर "कामरेड" 
       और लाल सलाम जैसे शब्दों के बीच अरसे से घुला-मिला यह 
       मजदूर.अपने आप को नहीं समझ पाया है कि वह क्या है.यह 
       सच है कि जिस तेजी से जनतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे मुल्क में,
       मजदूरों के हितों का आन्दोलन चला उतनी ही तेजी से बिखर 
       गया,मजदूरों के कंधों से क्रांति लाने वाले हमारे नेता,आंदोलनकारी 
       सहसा अपने चरित्र से गिरे और उनके लक्ष्य भी बदलने लगे 
       एकता का राग अलापते श्रमजीवियों के मठाधीश,नारे,हड़ताल,
       और जुलूसों की भीड़ में अपने को माला पहने पातें हैं,यह उनका 
       व्यक्तिगत सुधार है,पर मजदूर अपनी हाँथ से बनायीं माला 
       पहनाकर भूखा है. 
 
"मई दिवस"मेहनत करने वाले,कामगारों के अधिकारों के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.इसका अपना एक ऐतिहासिक महत्व है  यह एक विचारधारा है.सभ्य                     समाज का इतिहास अपनी तरह से वर्गों की उपज है,यही उपज 
             वर्तमान में शोषक के रूप में उभरी है. 
             जब सामंती समाज था तो जमीन थोड़े से लोगों के कब्जे में थी,
             इस जमीन पर काम करने वाले अपने मालिक की आय बढ़ाया 
             करते थे."जमीन के गुलामों"का यह वर्ग अपने बुनियादी हकों से 
            वंचित था,साथ ही साथ इन पर जुल्म होते थे.धीरे धीरे विज्ञानं ने 
            तरक्की की,कल-कारखाना समाज की स्थापना हुई,इस बदलाव   
            से पूंजीवादी विचारधारा वाले ही लाभ ले सके.गुलाम गुलाम ही रहें,
            फर्क सिर्फ इतना हुआ की दास प्रथा से थोड़ा मुक्त हुये "कामगार" 
           कहलाने लगे,पर शोषण और अत्याचार से मुक्ति नहीं मिली पायी.
           फ़्रांस की क्रांति 1789 में पहली बार इस वर्ग ने असंतोष प्रकट 
           किया.
           18 वीं शताब्दी के समाप्त होते होते तक कल कारखाना समाज का 
           ढांचा तेजी से उभरने लगा था,फ़्रांस की क्रांति सिर्फ इसलिये 
          महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इसने राज्य शक्ति को समाप्त किया,
          बल्कि इस क्रांति का महत्व इसलिये है कि पहली बार सदियों से 
          शोषित वर्ग ने एक करवट ली और इसी करवट ने एक इतिहास 
          बनाया.औद्योगिक समाज में पनपती पूंजीवादी व्यवस्था में 
          मजदूरों ने पहली बार अपना असंतोष जाहिर किया.मजदूर शोषण 
         की जटिल गिरफ्त में था ,इससे मुक्त होना चाहता था,धीरे-धीरे 
         इस मुक्त होने की इच्छा को संगठित किया,जो विरोध फ़्रांस की 
         क्रांति के समय फूटा था,उसने एक विचारधारा का रूप लिया 
         इस विचारधारा का नाम रखा "मार्क्सवाद"
        "मार्क्स"ने पहली बार मजदूरों की भूमिका और इतिहास पर 
        एक नयी नजर डाली,इसका आंकलन किया और एक नारा दिया
       "दुनियां के मजदूरों एक हो" उन्होने प्रथम इंटरनेशनल और 
       अंतराष्ट्रीय मजदूर संघ की स्थापना की.1879 की पहली 
       शताब्दी के मौके पर मजदूरों के हकों की पहली लड़ाई पर उसकी 
       याद में "एक मई"को अंतराष्ट्रीय "श्रमिक दिवस" के रूप में 
       मनाने की घोषणा की गयी.इस व्यवस्था से मजदूर और सचेत 
       हुये,राजनीतिक पार्टियां मजदूरों के हितों की चर्चा करने लगीं
       "हड़ताल"एक नया शब्द जुड़ा.यह इतिहास है.
       वास्तविकता यह है कि आज भी "मजदूर "अपने हक़ के लिये 
       लड़ रहा है.क्या कभी मजदूर शोषण से मुक्त हो पायेगा.
       कहाँ खड़ा है आज का मजदूर-----?
        भौतिकवादी युग में सभी की आवश्यकतायें बढ़ती जा रहीं हैं,
        पर बेचारा मजदूर ज्यों का त्यों है,न वह भौतिकता को समझ 
        पा रहा, न ही इस ओर ध्यान दे पा रहा है.
        "सर्वहारा"वर्ग की बात करना सहज है पर सहज नहीं है इनके 
        ऊपर हो रहे शोषण से मुक्त कराना.नारे,जलशों,जुलूसों से 
        इनके खिलाफ हो रहे शोषण को उजागर तो किया 
        जाता है,बड़े-बड़े अधिवेशनों में इनकी चर्चा आम है,यह महज 
        एक प्रक्रिया है जो चाय,नाश्ते और डिनर में समाप्त हो जाती है.
        निजी स्वामित्व की आकांक्षाओं,गतिविधियों,विचारधाराओं,
        क्षमताओं का अब अधिक जोर है.अपने अपने दबदबे,अपने अपने 
        व्यक्तित्व को शिखर पर ले जाने की कार्यप्रणाली ज्यादा सक्रिय है,
        यही सक्रियता अब वर्ग विरोधों में बंट गयी है.
        अब हम जिस समाज में रहते हैं उसके दो वर्ग हो गये हैं "धनपति"
        और "गरीब"--शोषक और मजदूर यह ध्रुवीकरण पूंजीवादी 
        समाज में विशेष रूप से बढ़ता जा रहा है, व्यक्तिवाद और 
        अहंवाद अपनी चरम सीमा पर है.विकास के नाम पर नेता 
        या पूंजीपति इसका लाभ ले रहें हैं.जिनके विकास के लिये 
        कार्यक्रम होता है,वे इस विकास के मायने से वाकिफ भी 
         नहीं हो पाते.सड़क बनाने में अपना पसीना टपकाने वाले 
         कभी सड़क पर नहीं चलते उन्हें पगडंडी ही विरासत में 
         मिली है. 
         मजदूरी के मामले में श्रमिक आर्थिक प्रक्रिया के कुचक्र में 
         फंस जाता है,अपने अधिकारों से भी वंचित रहता है,"रोटी"के 
         चक्कर में उसे अपनी तमाम योग्यताओं और प्रतिभा की 
         बलि चढ़ाना पड़ती है.आधुनिकीकरण और कम्प्यूटरीकरण 
         के इस युग में सामाजिक और मानव की श्रमजीवी मान्यतायें 
        खोखली हो गयीं हैं.आर्थिक नीतियां भी प्रशासनिक सेवाओं के 
        इर्द-गिर्द घूम रहीं हैं, मजदूरों के वेतन की सारी  परिभाषायें जर्जर  
        हो गयी हैं. 
        मजदूरों के विकास की सारी बातें,उनके हित की बातें 
        सरकारी फाइलों में लिखी हैं,इन फाइलें को दीमक खा 
        रही है.सारे के सारे उद्देश्य बेजान हो गयें हैं
        नंगी जमीन पर सोने वालों को इंतजार है एक सुखद 
        सपने का.
        "मजदूर दिवस"हर वर्ष आता है,चला जाता है,मजदूर 
         वहीँ खड़ा है स्थिर,मजदूरों के विकास,उनके वेतन 
         निर्धारण की ओर ध्यान रखने वाले इस देश में पता 
         नहीं कितने संगठन व गुट होंगे,लेकिन ये सभी 
         राजनीतिक प्रष्ठभूमि पर आधारित हैं.  
         मजदूर तो एक चाबीदार खिलौना है,जिसका मजाक 
          उड़ाया जाता है.वह भूखा है पर उसके नाम की राजनैतिक 
         रोटियां सेंकी जा रही है,बेचारा मजदूर अपनी भूखी आँतो
         अपने संस्कारों,अपने परिवार के चरमराये संघर्ष को 
         चुपचाप अपनी टपरिया में सुला रहा है.
                                                       "ज्योति खरे"     
          



      
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