गुरुवार, जनवरी 25, 2018

अपने ही घरों से ------

शराफत की ठंड से सिहर गये हैं लोग
दुश्मनी की आंच से बिखर गये हैं लोग--

जिनके चेहरों पर धब्बों की भरमार है
आईना देखते ही निखर गये हैं लोग--

छुटपन का गाँव अब जिला कहलाता है
स्मृतियों के आंगन से बिसर गये हैं लोग--

वो फिरौती की वजह से उम्दा बने
साजिशों के सफ़र से जिधर गये हैं लोग--

दहशत के माहौल में दरवाजे नहीं खुलते  
अपने ही घरों से किधर गये हैं लोग--

"ज्योति खरे"

एक टिप्पणी भेजें