मंगलवार, जनवरी 28, 2020

आम आदमी के हरे भरे सपने

हरे-भरे सपने
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आम आदमी के कान में
फुसफुसाती आवाजें
निकल जाती हैं
यह कहते हुए
कि,
टुकड़े टुकड़े जमीन पर
सपनें मत उगाओ

जानते हो
कबूतरों को
सिखाकर उड़ाया जाता है
लाल पत्थरों के महल से
जाओ
आम आदमी के
सुखद एहसासों को
कुतर डालो
उनकी खपरीली छतों पर बैठकर
टट्टी करो
कुतर डालो सपनों को

सपने तो सपने होते हैं
आपस में लड़ते समय
जमीन पर गिरकर
टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं

काले समय के इस दौर में
सपनों को ऊगने
भुरभुरी जमीन चाहिए
तभी तो सपनें
हरे-भरे लहरायेंगे---

"ज्योति खरे"

बुधवार, जनवरी 22, 2020

बसंत तुम लौट आये हो

बसंत तुम लौट आये
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अच्छा हुआ
इस सर्दीले वातावरण में
तुम लौट आये हो

सुधरने लगी है
बर्फीले प्रेम की तासीर
जमने लगी है
मौसम की नंगी देह पर
कुनकुनाहट

लम्बे अंतराल के बाद
सांकल के भीतर से
आने लगी हैं
खुसुर-फुसुर की आवाजें
सांसों की सनसनाहट से
खिसकने लगी है रजाई

धूप
दिनभर इतराती
चबा चबा कर
खाने लगी है
गुड़ की लैय्या 
औऱ आटे के लड्डू

वाह!! बसंत
कितने अच्छे हो तुम
जब भी आते हो
प्रेम में सुगंध भरकर चले जाते हो---

" ज्योति खरे "

गुरुवार, जनवरी 16, 2020

गुस्सा हैं अम्मा

गुस्सा हैं अम्मा
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नहीं जलाया कंडे का अलाव
नहीं बनाया गक्कड़ भरता
नहीं बनाये मैथी के लड्डू
नहीं बनाई गुड़ की पट्टी
अम्मा ने इस बार--

कड़कड़ाती ठंड में भी
नहीं रखी खटिया के पास
आगी की गुरसी

नहीं गाये
रजाई में दुबककर
खनकदार हंसी के साथ
लोकगीत
नहीं जा रही जल चढाने
खेरमाई
नहीं पढ़ रही
रामचरित मानस--

जब कभी गुस्सा होती थी अम्मा
झिड़क देती थीं पिताजी को
ठीक उसी तरह
झिड़क रहीं हैं मुझे

मोतियाबिंद वाली आंखों से
टपकते पानी के बावजूद
बस पढ़ रहीं हैं प्रतिदिन
घंटों अखबार

दिनभर बड़बड़ाती हैं
अलाव जैसा जल रहा है जीवन
भरते के भटे जैसी
भुंज रही है अस्मिता
जमीन की सतहों से
उठ रही लहरों पर
लिखी जा रही हैं संवेदनायें
घर घर मातम है
सड़कों पर
हाहाकार पसरा पड़ा है

रोते हुये गुस्से में
कह रहीं हैं अम्मा
यह मेरी त्रासदी है
कि
मैने पुरुष को जन्म दिया
और वह तानाशाह बन गया--

नहीं खाऊँगी
तुम्हारे हाथ से दवाई
नहीं पियूंगी
तुम्हारे हाथ का पानी
तुम मर गये हो
मेरे लिये
इस बार
हर बार---------

"ज्योति खरे"

सोमवार, जनवरी 13, 2020

सिगड़ी में रखी चाय

सिगड़ी में रखी चाय
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गली की
आखिरी मोड़ वाली पुलिया पर बैठकर
बहुत इंतजार किया
तुम नहीं आयीं
यहां तक तो ठीक था
पर तुम घर से निकली भी नहीं ?

मानता हूं
प्रेम दुनियां का सबसे
कठिन काम है

तुम अपने आलीशान मकान में
बैठी रही
मैं मुफ्त ही
अपनी टपरिया बैठे बैठे
बदनाम हो गया

बर्फीला आसमान
उतर रहा है छत पर
सोच रहा ह़ू
कि आयेंगे मेरे लंगोटिया यार
पूछने हालचाल

रख दी है
सिगड़ी पर
गुड़,सौंठ,तुलसी की चाय उबलने
यारों के ख्याल में ही डूबा रहा

हक़ के आंदोलन के लिए
लड़ने वाले
ईमानदार लड़ाकों को
भेज दिया गया है
हवालात में
जमानत लेने में
बह गया पसीना

सिगड़ी में रखी चाय
उफन कर बह रही है----

"ज्योति खरे"

शनिवार, जनवरी 04, 2020

कुछ नया होना चाहिए

नये वर्ष में
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इस धरती पर
कुछ नया
कुछ और नया होना चाहिए

चाहिए
अल्हड़पन सी दीवानगी
जीवन का
मनोहारी संगीत
अपनेपन का गीत

चाहिए
सुगन्धित हवाओं का बहना
फूलों का गहना
ओस की बूंदों को गूंथना
कोहरे को छू कर देखना 
चिड़ियों सा चहचहाना
कुछ कहना
कुछ बतियाना--

इस धरती पर
कितना कुछ है
गाँव,खेत,खलियान
जंगल की मस्ती
नदी की दौड़
आंसुओं की वजह
प्रेम का परिचय
इन सब में कहीं
कुछ और नया होना चाहिए
होना तो कुछ चाहिए

चाहिए
किताबों,शब्दों से जुडे लोग
बूढों में बचपना
सुंदर लड़कियां ही नहीं
चाहिए
पोपले मुंह वाली वृद्धाओं  में
खनकदार हंसी--

नहीं चाहिए
परचित पुराने रंग
पुराना कैनवास
कुछ और नया होना चाहिए
होना तो कुछ चाहिए ---------

"ज्योति खरे"

रविवार, दिसंबर 29, 2019

जिन्दा रहने की वजह

जिन्दा रहने की वजह
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सम्हाल कर रखा है
तुम्हारे वादों का
दिया हुआ
ब्राउन रंग का मफलर
बांध लेता हूँ
जब कभी
तब कान में फुसफुसाकर
कहती है ठंड
कि, आज बहुत ठंड है

इन दिनों
उबलते देश में
गिर रही है बर्फ
दौड़ रही है शीत लहर
जानता हूँ
तुम्हारी भी तासीर
बहुत गरम है
पर
मेरी ठंडी यादों को
गर्माहट देना
ओढ़ लेना
मेरा दिया हुआ
ऊनी आसमानी शाल

बहकते, झुंझलाते
और भटकते इस दौर में
प्रेम
जिन्दा रहने की
वजह बनेगा-----

"ज्योति खरे"

गुरुवार, दिसंबर 19, 2019

यूकेलिप्टस

यूकेलिप्टस 
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एक दिन तुम और मैं 
शाम को टहलते 
उंगलियां फसाये 
उंगलियों में 
निकल गये शहर के बाहर--

तुमने पूछा 
क्या होता है शिलालेख 
मैने निकाली तुम्हारे बालों से 
हेयरपिन
लिखा यूकेलिप्टस के तने पर 
तुम्हारा नाम----

तुमने फिर पूछा 
इतिहास क्या होता है 
मैने चूम लिया तुम्हारा माथा--

खो गये हम 
अजंता की गुफाओं में 
थिरकने लगे 
खजुराहो के मंदिर में 
लिखते रहे उंगलियों से 
शिलालेख 
बनाते रहे इतिहास--

आ गये अपनी जमीन पर 
चेतना की सतह पर 
अस्तित्व के मौजूदा घर पर--

घर आकर देखा था दर्पण 
उभरी थी मेरे चेहरे पर 
लिपिस्टिक से बनी लकीरें 
मेरा चेहरा शिलालेख हो गया था 
बैल्बट्स की मैरुन बिंदी 
चिपक आयी थी 
मेरी फटी कालर में 
इतिहास का कोई घटना चक्र बनकर--

अब खोज रहा हूं इतिहास 
पढ़ना चाहता हूं शिलालेख--

अकेला खड़ा हूं
जहां बनाया था इतिहास  
लिखा था शिलालेख 
इस जमीन पर 
खोज रहा हूं ऐतिहासिक क्षण--

लोग कहते हैं 
यूकेलिप्टस पी जाता है 
सतह तक का पानी 
सुखा देता है जमीन की उर्वरा--

शायद यही हुआ है 
मिट गया शिलालेख 
खो गया इतिहास--

अब शायद  
फिर लिख सकेंगे इतिहास 
अपनी जमीन का--

क्या तुम भी कभी 
देखती हो मुझे 
अपने मौजूदा जीवन के आईने में 
जब कभी तुम्हारी 
बिंदी,लिपिस्टिक 
छूट जाती है 
इतिहास होते क्षणों में---

 "ज्योति खरे"