गुरुवार, जनवरी 24, 2013

खादी के सफ़ेद कुरते में ----------

अब
पडोसी के अमरूद
तोड़कर नहीं खाये जाते
सीधा
पडोसी को ही कर दिया जाता है
खलास---------

लोग अब
छुट्टियों में
अपने गांव नहीं जाते
शहर में ही खोल ली है
दुश्मनी की क्लास--------

हमने पूछा
खादी के सफ़ेद कुरते में
दाग कैसा
वे कहने लगे
कम्मो की देह में कर रहे थे
संभावनाओ की तलाश-------

"ज्योति खरे"

 

5 टिप्‍पणियां:

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (26-1-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बेहद गंभीर और सामयिक चिंतन, शुभकामनाएँ.

संजय भास्‍कर अहर्निश ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

संजय भास्‍कर अहर्निश ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

संजय भास्‍कर अहर्निश ने कहा…

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !