बुधवार, सितंबर 18, 2019

इरादे


अपने इरादों को
तुमने ही दो भागों में बांटा था
अपने हिस्से के इरादे को
तुम अपने दुपट्टे में बांधकर
ले गयीं थी
यह कहकर
मैं अपने इरादे पर कायम रहूंगी
इसे पूरा करुँगी ---

मैं भी अपने हिस्से का इरादा
लेकर चल दिया था
जो आज भी
मेरे सीने में जिंदा है

शायद तुम ही
अपने इरादों से बधें दुपट्टे को
पुराने जंग लगे संदूक में रख कर
भूल गयी थी

अब अपने इरादों का दुपट्टा ओढ़कर
घर से बाहर निकलो
मैं सड़क पर
साइकिल लिए खड़ा हूँ
तुम्हारे पीछे बैठते ही
मेरे पाँव
इरादों के पैडिल
तेज गति से घुमाने लगेंगे

दूर बहुत दूर
किसी बंजर जमीन पर ठहर कर
अपन दोनों
इरादों की
खेती करेंगे ----

"ज्योति खरे"

8 टिप्‍पणियां:

Sweta sinha ने कहा…


जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना गुरुवार १९ सितंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (20-09-2019) को    "हिन्दी को बिसराया है"   (चर्चा अंक- 3464)  (चर्चा अंक- 3457)    पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।  --हार्दिक शुभकामनाओं के साथ 
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मन की वीणा ने कहा…

जी बहुत खूब! इरादों की खेती अलहदा ख्याल अलहदा अहसास।

Rohitas ghorela ने कहा…

आपकी लेखन कला को नमन।


पधारें अंदाजे-बयाँ कोई और

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका