सोमवार, अप्रैल 01, 2019

मूर्ख दिवस पर -- समझदारी की बातें

चिल्लाकर मुहं खोल बे
खुल्म खुल्ला बोल बे

नेताओं की तोंद देखकर
पचका पेट टटोल बे

सुरा सुंदरी और सत्ता का
स्वाद चखो बकलोल बे

सत्ता नाच रही सड़कों पर
चमचे बजा रहे ढोल बे

बहुमत का फिर हंगामा 
बता दे अपना मोल बे

भिखमंगे जब बहुमत मांगें 
खोल दे इनकी पोल बे

तेरे बूते राजा और रानी
दिखा दे अपना रोल बे

बेशकीमती लोकतंत्र को
फोकट में मत तॊल बे

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, मार्च 29, 2019

आई पी एल और बच्चे

खेल तो हम कभी भी खेल लेंगे
**********************
जीत और हार की संभावनाओं के साथ
पान पराग, विमल, राजश्री, के पाऊच और गोल्डफ्लेग सिगरेट के पैकेट लिए
जहां चाय सुलभता से मिल जाए
इसकी चुस्कियों लेने
अपने अपने अड्डों पर
विराजमान हो जाते हैं
सभ्य समाज के
सभ्य लोग

ऐसी जगहों पर
मासूम बच्चे
टेबल पर पोंछा मारते
खाली कप ग्लास उठाते
अक्सर मिल जाते हैं--

इन दिनों
आई पी एल का क्रेज है
यह माँ बाप और रिश्तों को भी
नहीं समझता है

यहीं पर
मासूम बच्चे
गिरते विकटों के साथ
चौके, छक्कों के साथ
खाते रहते हैं
मां-बहन की गालियां
और अपनी मासूमियत
का परिचय देते
पेट भरने के इंतजाम में
पोंछते रहते हैं टेबल
खाली करते रहते हैं
एशट्रे

समय मिलते ही
कनखियों से
स्क्रीन पर देखती मासूम आंखे
बल्ले और बाल पर नहीं
चिप्स,चॉकलेट,मैगी,कामप्लेन 
पर ठहर जाती हैं
बालमन के भीतर
घुटती
भविष्य की संभावनाओं को
मां बहन की गालियां
भिंगो जाती हैं

हार और जीत की
जश्न की
तैयारियों में लगे लोग
मेकडावल, रॉयलचेलेंज, टीचर,सिग्नेचर
प्लेन,मसाला के
इंतजाम के साथ
पंडाल में बैठकर
असफलता, सफलता का राग
दो घूंट चढ़ाने के बाद
गुनगुनाने लगते हैं
टेबल पोंछते बच्चों की
मासूम घुटन को
नहीं पहचानते
मां बहन की गालियों देकर
इन्हें अपना यार समझते हैं

टेबल पोंछते इन बच्चों की
मासुमियत को समझने
कोई भी राष्ट्रीय प्रतियोगता
नहीं होती

खेेल तो हम कभी भी खेल लेंगे
पहले
इन मासूम बच्चों की
मासूमियत को
चौके,छ्क्के में
तबदील करें

मासूम जीवन को जीतने का
खेल
जल्दी से
प्रारंभ करवाओ
इस खेल में
आम आदमी
सम्मलित होना चाहता है--

"ज्योति खरे"

सोमवार, मार्च 18, 2019

छेवला उर्फ टेसू

फागुन की
समेटकर बैचेनियां
दहक रहा टेसू
महुये की
दो घूंट पीकर
बहक रहा टेसू---

सुर्ख सूरज को
चिढ़ाता खिलखिलाता
प्रेम की दीवानगी का
रूतबा बताता
चूमकर धरती का माथा
चमक रहा टेसू---

गुटक कर भांग का गोला
झूमता मस्ती में
छिड़कता प्यार का उन्माद
बस्ती बस्ती में
लालिमा की ओढ़ चुनरी
चहक रहा टेसू--

जीवन के बियावान में
पलता रहा
पत्तलों की शक्ल में
ढ़लता रहा
आंसुओं के फूल बनकर
टपक रहा टेसू---

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, मार्च 08, 2019

स्त्रियां चाहती हैं

चाहती हैं
ईट भट्टोंँ में
काम करने वाली स्त्रियां
कि, उनका भी
अपना घर हो

चाहती हैं
खेतों पर
भूखे रहकर
अनाज ऊगाने वाली स्त्रियां
कि, उनका भी
भरा रहे पेट

चाहती हैं
मजबूर स्त्रियां
कि, उनकी फटी साड़ी मेँ 
न लगे थिगड़ा
सज संवर कर
घूम सकें बाजार हाट

चाहती हैं
यातनाओं से गुजर रही स्त्रियां
उलझनों की
खोल दे कोई गठान
ताकि उड़ सकें
कामनाओं के आसमान में
बिना किसी भय के

चाहती हैं
स्त्रियां
देश दुनियां में
विशेष स्त्रियों के साथ
उपेक्षित स्त्रियों का भी
नाम दर्ज किया जाए

चाहती हैं
स्त्रियां
केवल सुख भोगती स्त्रियों का
जिक्र न हो
जिक्र हो
उपेक्षा के दौर से गुजर रहीं स्त्रियों का

रोज न सही
महिला दिवस के दिन तो
होना चाहिए---

"ज्योति खरे"

शनिवार, फ़रवरी 16, 2019

पुलवामा से

सूरज का माथा चूमने वाले
प्रकाश चक्र थे वे
धरती को मां कहने वाले
सुरक्षा बीज थे वे
सारी दिशाओं में घूमते
प्रहरी थे वे
फौजी थे वे

जा रहे थे
नयी ऊर्जा के साथ
अवकाश के बाद
मां से गले लिपटकर
पिता को आश्वस्त करके
बेटे को प्यार और
बिटिया को चूमकर
गांव की गीली मिट्टी की
सुगंध खा कर
सुरक्षा करने

उनींदी अवस्था में
पहले कदम पर ही
मार दिए गये
आतंकियों द्वारा

भूख, हत्या, शोषण, राजनीति
राष्ट्रीय हास्य क्रीड़ाओं
राष्ट्रीय आपदाओं
अंतरराष्ट्रीय प्रलापों
से भी भयावह है
यह रक्त प्रवाह

वे
मरे नहीं
जीवित हैं
लिख गये हैं
संवेदनाओं की पीठ पर
जीत की परिभाषा----

"ज्योति खरे"

पुलवामा से

सूरज का माथा चूमने वाले
प्रकाश चक्र थे वे
धरती को मां कहने वाले
सुरक्षा बीज थे वे
सारी दिशाओं में घूमते
प्रहरी थे वे
फौजी थे वे

जा रहे थे
नयी ऊर्जा के साथ
अवकाश के बाद
मां से गले लिपटकर
पिता को आश्वस्त करके
बेटे को प्यार और
बिटिया को चूमकर
गांव की गीली मिट्टी की
सुगंध खा कर
सुरक्षा करने

उनींदी अवस्था में
पहले कदम पर ही
मार दिए गये
आतंकियों द्वारा

भूख, हत्या, शोषण, राजनीति
राष्ट्रीय हास्य क्रीड़ाओं
राष्ट्रीय आपदाओं
अंतरराष्ट्रीय प्रलापों
से भी भयावह है
यह रक्त प्रवाह

वे
मरे नहीं
जीवित हैं
लिख गये हैं
संवेदनाओं की पीठ पर
जीत की परिभाषा----

"ज्योति खरे"

बुधवार, फ़रवरी 13, 2019

साझा संकल्प

तुम्हारे मेंहदी रचे हाथों में
रख दी थी मैंने
अपनी भट्ट पड़ी हथेली
और तुमने
महावर लगे अपने पांव
रख दिये थे
मेरे खुरदुरे आंगन में

साझा संकल्प लिया था
अपन दोनों ने
कि,बढेंगे मंजिल की तरफ एक साथ

सुधारेंगे खपरैल छत
जिसमें गर्मी में धूप
छनकर नहीं
सूरज को भी साथ ले आती है
बरसात बिना आहट के
सीधे कमरे में उतर आती है
कच्ची मिट्टी के घर को
बचा पाने की विवशताओं में
पसीने की नदी में
फड़फड़ाते तैरते रहेंगे

फासलों को हटाकर
अपने सदियों के संकल्पित
सपनों की जमीन परलेटकर
प्यार की बातें करेंगे अपन दोनों

साझा संकल्प तो यही लिया था
कि,मार देंगे
संघर्ष के गाल पर तमाचा
जीत के जश्न में
हंसते हुये बजायेंगे तालियां
अपन दोनों---

"ज्योति खरे"
( आज तैंतीस वर्ष हो गये संकल्प को निभाते हुए )