रविवार, मार्च 24, 2013

यार फागुन------

यार फागुन
सालभर में एक बार
दबे पांव आते हो
खोलकर प्रेम के रहस्यों को
चले जाते हो------

यार फागुन
तुम तो केवल
रंगों की बात करते हो
प्यार के मनुहार की बात करते हो
शहर की
संकरी गलियों में झांकों
मासूमों का
कतरा कतरा बहता मिलेगा
झोपड़ पट्टी में
कुछ दिन गुजारो
बच्चों के फटे कपड़ों का
टुकड़ा ही मिलेगा-----

यार फागुन
जहां रोटियां की कमी है
वहां
रोटियां परोसो
गुझिया के चक्कर में 
रोटियां न छीनों 
एक चुटकी गुलाल
मजदूर के गाल पर मलो
अपनों को रंगों-------

यार फागुन
गुस्सा मत होना
अपना समझता हूं
अपना ही समझना---------

"ज्योति खरे"    

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