मंगलवार, अक्टूबर 22, 2019

आगे बढ़ो

आगे बढ़ो
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कामरेड
तुम्हारी भीतरी चिंता
तुम्हारे चेहरे पर उभर आयी है
तुम्हारी लाल आँखों से
साफ़ झलकता है
कि,तुम
उदासीन लोगों को
जगाने में जुटे हो

आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं

मसीहा सूली पर चढ़ा दिये गए
गौतम ने घर त्याग दिया
महावीर अहिंसा की खोज में भटकते रहे
गांधी को गोली मार दी गयी

संवेदना की जमीन पर
कोई नया वृक्ष नहीं पनपा
क्योंकि
संवेदना की जमीन पर
नयी संस्कृति
बंदूक पकड़े खड़ी है

बंजर और दरकी जमीन पर
तुम
नये अंकुर
उपजाने में जुटे हो
यह जटिल और जुझारू काम है
जुटे रहो

आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं

जो लोग
संगीतबद्ध जागरण में बैठकर
चिंता व्यक्त करते हैं
वही आराम से सोते हैं
इन्हें सोने दो

तुम्हारी चिंता
महानगरीय सभ्यता
और बाजारवाद पर नहीं
मजदूरों की रोटियों की है
उनके जीवन स्तर की है

तुम अपनी छाती पर
वजनदार पत्थर बांधकर
चल रहे हो उमंग और उत्साह के साथ
मजदूरों का हक़ दिलाने

कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं
तुम्हें लाल सलाम
लाल सलाम
इंकलाब जिंदाबाद
जिंदाबाद

"ज्योति खरे"

रविवार, अक्टूबर 13, 2019

तुम्हारी मुठ्ठी में कैद है तुम्हारा चांद

तुम्हारी मुठ्ठी में कैद है-तुम्हारा चाँद
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चाँद को तो
उसी दिन रख दिया था
तुम्हारी हथेली पर
जिस दिन
मेरे आवारापन को
स्वीकारा था तुमने

सूरज से चमकते तुम्हारे गालों पर
पपड़ाए होंठों पर
रख दिये थे मैने
कई कई चाँद

चाँद को तो
उसी दिन रख दिया था
तुम्हारी हथेली पर
जिस दिन
विरोधों के बावजूद
ओढ़ ली थी तुमने
उधारी में खरीदी
मेरे अस्तित्व की चुनरी

और अब
क्यों देखती हो
प्रेम के आँगन में
खड़ी होकर
आटे की चलनी से
चाँद----

तुम्हारी मुट्ठी में तो कैद है
तुम्हारा अपना चाँद----

"ज्योति खरे

बुधवार, अक्टूबर 09, 2019

रावण जला आये बंधु

रावण जला आये बंधु
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कागज
लकड़ी
जूट और मिट्टी से बना
नकली रावण
जला आये बंधु !

जो लोग
सहेजकर सुरक्षित रखे हैं
शातिरानापन
गोटीबाजी
दोगलापन
इसे जलाना भूल गये बंधु !

कल से फिर
पैदा होने लगेंगे
और और रावण बंधु !

जलाना था कुछ
जला आये और कुछ
जीवित रह गया रावण

अब लड़ते रहना
जब तक
भीड़ भरे मैदान में
स्वयं न जल जाओ बंधु !

"ज्योति खरे"

सोमवार, अक्टूबर 07, 2019

फूलवाली

फूल वाली--
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सींचकर आंख की नमी से
रखती है तरोताजा
अपने रंगीन फूल 

संवारती है
टूटे आईने में देखकर
कई कई आंखों से
खरोंचा गया चेहरा
जानती है
सुंदर फूल
खिले ही अच्छे लगते हैं

मंदिर की सीढियां
उतरते चढ़ते हांफते
निवेदन करती है
बाबू जी, भैया जी, बहन जी, दीदी
सुंदर फूल ले लो

जब कोई खरीदता है फूल
चेहरे पर मासूम मुस्कान लाकर
मनोकामनाओं की फूंक मारते
प्रेम के पत्तों में लपेटकर
बेच देती है
अपने फूल

भरती है राहत की सांस
चढ़ा देती है
देवी के चरणों में
बचा हुआ आखिरी फूल

कि, शायद कोई देवता 
चुन ले 
कांटों में खिले इस फूल को 
खींच दे हाथ में
सुगंधित प्यार की लकीर
 
मुरझाये फूल में
जान लौट आयेगी-------

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, अक्टूबर 04, 2019

स्त्रियां जानती हैं

स्त्रियां जानती हैं
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स्त्री को
बचा पाने की
जुगत में जुटे
पुरुषों की बहस
स्त्री की देह से प्रारंभ होकर
स्त्री की देह में ही
हो जाती है समाप्त ---

स्त्रियां
पुरषों को बचा पाने की जुगत के बावजूद भी
सजती, संवरती हैं
रखती हैं घर को व्यवस्थित

स्त्रियां जानती हैं
पुरुषों के ह्रदय
स्त्रियों की धड़कनों से
धड़कते हैं ---

पुरुषों की आँखें
नहीं देख पाती
स्त्री की देह में एक स्त्री
स्त्रियों की आँखें 
देखती हैं
समूची श्रृष्टि -----

"ज्योति खरे"

सोमवार, सितंबर 30, 2019

वृद्बाश्रम में

वृद्धाश्रम में
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अच्छे नर्सरी स्कूल में
बच्चों के दाखिले के लिए
सिफारिश का इंतजाम
पहले से किया जाने लगता है
क्यों कि बच्चे
भविष्य की उम्मीद होते हैं

इस दौडा़ भागी में
बूढे मां बाप का तखत
टीन का पुराना संदूक
भगवान का आसन
कांसे का लोटा
लाठी, छाता
चमड़े का बैग
जिसमें पिता के पुराने कागजात रहते हैं
अम्मा की कत्थई रग की पेटी
जो मायके से लायी थी
चीप से बनी खुली अलमारी में
रख दी जाती हैं
दिनभर इस काम को निहारते
पिता और अम्मा सोचते हैं
शायद घर को
और सजाया संवारा जा रहा है

शाम को
गिलकी की भजिया और
सूजी का हलुआ
परोसते समय
कह दिया जाता है
अब आप लोग
पीछे वाले
कमरे में रहेंगे

बेटा अब स्कूल जायेगा
शाम को बाहर वाले कमरे में
वह टियूशन पढ़ेगा

बेटे के भविष्य को बनाने
बूढ़ों को
पीछे घसीट कर डाल दिया जाता है

वृद्धाश्रम में
बूढ़ों को रखने की
होड़ सी मची है
बेटा शाम को लौटते समय
एक फार्म ले आया है

पिता
पिता ही होता है
वे आज खाने की मेज पर नहीं बैठे
भीतर बसी
चुप्पियों को तोड़ते बोले

घर में जगह नहीं बची
वृद्धाश्रम में
बची है
तुम्हें तुम्हारे
सुख की हंसी की शुभकामनाएं
मैं अपने साथ
अपने सपनों को ले जाउंगा
वृद्धाश्रम के
खुरदुरे आंगन में
अपनों के साथ
रेत का घरौंदा बनाउंगा-----

"ज्योति खरे"

बुधवार, सितंबर 18, 2019

इरादे


अपने इरादों को
तुमने ही दो भागों में बांटा था
अपने हिस्से के इरादे को
तुम अपने दुपट्टे में बांधकर
ले गयीं थी
यह कहकर
मैं अपने इरादे पर कायम रहूंगी
इसे पूरा करुँगी ---

मैं भी अपने हिस्से का इरादा
लेकर चल दिया था
जो आज भी
मेरे सीने में जिंदा है

शायद तुम ही
अपने इरादों से बधें दुपट्टे को
पुराने जंग लगे संदूक में रख कर
भूल गयी थी

अब अपने इरादों का दुपट्टा ओढ़कर
घर से बाहर निकलो
मैं सड़क पर
साइकिल लिए खड़ा हूँ
तुम्हारे पीछे बैठते ही
मेरे पाँव
इरादों के पैडिल
तेज गति से घुमाने लगेंगे

दूर बहुत दूर
किसी बंजर जमीन पर ठहर कर
अपन दोनों
इरादों की
खेती करेंगे ----

"ज्योति खरे"