शुक्रवार, जुलाई 26, 2019

वाह रे पागलपन

सावन में
मंदिर के सामने
घंटों खड़े रहना
तुम्हें कई कोंणों से देखना

तुम्हारे चमकीले खुले बाल
हवा में लहराता दुपट्टा
मेंहदी रचे हांथ
जानबूझ कर
सावनी फुहार में तुम्हारा भींगना
दुपट्टे को
नेलपॉलिश लगी उंगलियों से
नजाकत से पकड़ना,
ओढ़ना
कीचड़ में सम्हलकर चलना
यह सब देखकर
सीने में लोट जाता था सांप-

पागल तो तुम भी थी
जानबूझ कर निकलती थी पास से
कि,
मैं सूंघ लूं
तुम्हारी देह से निकलती
चंदन की महक
पढ़ लूं आंखों में लगी
कजरारी प्रेम की भाषा
समझ जाऊं
लिपिस्टिक लगे होठों की मुस्कान-

आज जब
खड़ा होता हूँ
मौजूदा जीवन की सावनी फुहार में
झुलस जाता है
भीतर बसा पागलपन
जानता हूं
तुम भी झुलस जाती होगी
स्मृतियों की 
सावनी फुहार में--

वाकई पागल थे अपन दोनों-----

"ज्योति खरे"

25 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

अच्छा लगता है पागल होना भी कभी। वाह।

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 27 जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

kuldeep thakur ने कहा…


जय मां हाटेशवरी.......
आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
27/07/2019 को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में......
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
https://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद

Anita saini ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28 -07-2019) को "वाह रे पागलपन " (चर्चा अंक- 3410) पर भी होगी।

--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
....
अनीता सैनी

मन की वीणा ने कहा…

शृंगार रस का सुंदर सृजन।
अहसास से पूर्ण।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत ही सुंदर सावनी रचना...🙏

Onkar ने कहा…

बहुत खूब

Nitish Tiwary ने कहा…

शानदार प्रस्तुति।

Subodh Sinha ने कहा…

महाशय! काश!!! ... लिपस्टिक और नेलपॉलिश जैसे रासायनिक सौंदर्य-प्रसाधन उस सावनी फुहार में धुल जाती ...☺

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

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आभार आपका

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आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Prakash Sah ने कहा…

मैं लाजवाब हूँ। सिर्फ एक शब्द कहूँगा - 'चलचित्र'।

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

आभार आपका

Jyoti khare ने कहा…

यह पेज खुल नहीं रहा है

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नये भारत का उदय - अनुच्छेद 370 और 35A खत्म - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Rohitas ghorela ने कहा…

हर कोनों से तुमको देखना ..
चन्दन पास से गुजरे और वो उसकी महक.. फिर सांप क्योंकर न लौटे मन में.
नैलपोलिश, चुनरी सम्भालना उसका, भीगी भीगी सी.....और न जाने कितने दृश्य
इतनी सब यादें वो भी इस पागलपन की संजोकर रखना मन में, ये जहर जैसा काम नहीं है क्या ??
लाजवाब रचना :))

पधारें कायाकल्प

दिगंबर नासवा ने कहा…

कितना अच्छा लगता है इसी पागलपन में जीना ...
प्रेम का कोई चलचित्र गुज़र गया आँखों के सामने ...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ऐसा पागलपन भी शायद जिंदगी का एक अभिन्न अंग होता है

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

ऐसा पागलपन भी अच्छा लगता है।