पत्थरों का दर्द भी कोई दर्द है
फूंक कर बैठो यहाँ पर गर्द है----
मुखबरी होगी यहीं से बैठकर
अस्मिता की रात में खिल्ली उड़ेगी
अफवाहों की जहरीली हवा से
धुंध दहशत की हर घर पलेगी
पीसकर खा रहे ताज़ी गुठलियाँ
क्या करें थूककर चाटना फर्ज है----
पी रहे दांत निपोरे कच्ची दारु
जो मिली थी रात को हराम में
लाड़ले मुर्गी चबाते नंगे पड़े
हथियारों के जंगली गॊदाम में
कलफ किये कुर्तो में खून लगा है
अखबारों में नाम इनका दर्ज है------
"ज्योति खरे"
गीत
बांट रहा याचक हांथों को
बाँध पाँव में घुंघरु नाचे
बिटिया बनी कनीज----
काटे नहीं कटे दिन जलते
साहस रोज घटे
खूब धड़ल्ले से चलते हैं
अब तो नोट फटे
तीखी मिरची,गरम मसाला
जीवन लगे लजीज----
हर टहनी पर,पत्ते पर है
मकड़ी का जाला
सुबह सिंदूरी कहाँ दिखे
चश्मा पहना काला
नये समय की,नयी सीख अब
देती नयी तमीज------
"ज्योति खरे"
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमो नमः॥
नव वर्ष---नवसंवत्सर
की हार्दिक शुभकामनायें
"ज्योति खरे"
बहुत उम्मीद से
तलाशते रहे सहारा
बे-घरों का
बसेरा नहीं हुआ-----
अंधेरे में चले थे
उजाला पकडने
सूरज तो दिखा
सवेरा नहीं हुआ------
"ज्योति खरे"
सुलगते कंडों से
निकलती धुंये की धार
जंगल में कट जाये
ज्यों इतवार----
गोधूलि बेला में
उड़ती धूल
पीड़ाओं के आग्रह से
मुरझाते फूल
प्रेम की नांव
डूब रही मझधार-----
"ज्योति खरे"
दीवाल पर टंगे
सफ़ेद कागज़ पर
काली स्याही की
कुछ बूंदें जमीं थी---
अमावस की रात
चांदनी की
आंख से टपकी
नमीं थी--------
"ज्योति खरे"
चिल्लाकर मुहं खोल बे
हल्ला बोल,हल्ला बोल बे----
नेताओं की तोंद देखकर
पचका पेट टटोल बे----
सुरा सुंदरी और सत्ता का
स्वाद चखो बकलोल बे----
सत्ता नाच रही सड़कों पर
चमचे बजा रहे ढोल बे----
बहुमत का फिर हंगामा
बता दे अपना मोल बे----
भिखमंगे जब बहुमत मांगें
खोल दे इनकी पोल बे----
तेरे बूते राजा और रानी
दिखा दे अपना रोल बे----
बेशकीमती लोकतंत्र को
फ़ोकट में मत तॊल बे----
अब मतदान नहीं करना
कानों में रस घोल बे----
"ज्योति खरे"