गुरुवार, अगस्त 20, 2015
मंगलवार, जून 30, 2015
स्त्रियां जानती हैं
स्त्री की देह में ही
हो जाती है समाप्त ---
स्त्रियां
पुरषों को बचा पाने की जुगत में भी
स्त्रियां जानती हैं
पुरुषों के ह्रदय
पुरुषों की आँखें
नहीं देख पाती स्त्री की देह में एक स्त्री
स्त्रियों की आँखें
"ज्योति खरे"
चित्र
गूगल से साभार
गुरुवार, जून 18, 2015
होना तो कुछ चाहिए
समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि और समालोचक श्री विष्णु नागर जी थे,प्रमुख वक्ता
प्रसिद्ध साहित्यकार श्री उपेन्द्र कुमार जी एवं राजीव श्रीवास्तव की उपस्थिति रही.
विष्णु नागर जी ने पुस्तक का विमोचन करते हुऐ कहा कि आज के दौर की समकालीन कविताओं
का यह संग्रह वर्तमान जीवन की विडंबनाओं को उजागर करता है,साथ ही इन्होंने कविता के रूप और गुणों पर भी प्रकाश डाला और कविता के निर्माण में कौन सा तत्व सर्वाधित उपयोगी होता है इस विषय पर भी सवाल उठाया, ज्योति खरे को संग्रह पर बधाई और शुभकामनायें दी.
मुख्य वक्ता आलोचक उपेन्द्र कुमार ने कहा कि ज्योति खरे की कवितायें सहजता से बुनी
हुई हैं और मन को प्रभावित करती हैं, इनकी कविताओं में शब्दों की कठिनता नहीं बल्कि बोलचाल की भाषा का सुंदर और व्यवहारिक प्रयोग है, जो कविताओं को पठनीय बनाता है.
साहित्यकार और कला समीक्षक डॉ राजीव श्रीवास्तव ने अपने उद्बोधन में कहा कि
नवनीत जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी रचनाओं से लेकर वर्तमान तक की सृजन
यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला,
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे "नया ज्ञानोदय" के संपादक और भारतीय ज्ञानपीठ के
कविता लिखना और उसे इतने सालों से बचाकर रखना एक चुनौती पूर्ण काम है,
यही कारण है की इनकी कविताओं में मन की पीड़ा तो है, साथ ही साथ समाज और
जीवन की विडम्बनाओं का भी प्रभाव है,वर्तमान समय की नब्ज को पहचानती इनकी
कविताओं में सहजता है जो मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं.इन्होंने कहा कि संग्रह की
सभी कवितायें समकालीन दौर की बेहतरीन कवितायें हैं.
इस विशेष मौके पर ज्योति खरे ने संग्रह की कुछ कवितायें भी अपने अंदाज में पढ़ी
वरिष्ठ समालोचक डॉ ओम निश्चल ने समारोह का बहुत सृजनात्मक संचालन किया
आभार ब्लू बक पब्लिकेशन्स के प्रबंधक अजय आनन्द ने किया
समारोह में दिल्ली और बाहर से आये साहित्यकारों की उपस्थिति ने समारोह को
गरिमा प्रदान कीआग्रह है पुस्तक यहां से प्राप्त करें, और अपनी सार्थक प्रतिक्रिया दें
सादर आभार सहित -----
http://www.flipkart.com/hona-
ज्योति खरे
शुक्रवार, मई 01, 2015
कामरेड आगे बढ़ो --------
कामरेड
तुम्हारी भीतरी चिंता
तुम्हारे चेहरे पर उभर आयी है
तुम्हारी लाल आँखों से
साफ़ झलकता है
कि,तुम
उदासीन लोगों को
जगाने में जुटे हो ----
कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं
मसीह सूली पर चढ़ा दिये गये
गौतम ने घर त्याग दिया
महावीर अहिंसा की खोज में भटकते रहे
गांधी को गोली मार दी गयी
संवेदना की जमीन पर
कोई नया वृक्ष नहीं पनपा
क्योंकि
संवेदना की जमीन पर
नयी संस्कृति
बंदूक पकड़े खड़ी है
बंजर और दरकी जमीन पर
तुम
नये अंकुर
उपजाने में जुटे हो----
कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं
जो लोग
संगीतबद्ध जागरण में बैठकर
चिंता व्यक्त करते हैं
वही आराम से सोते हैं
इन्हें सोने दो
कामरेड तुम्हारी चिंता
महानगरीय सभ्यता
और बाजारवाद पर नहीं
मजदूरों की रोटियों की हैं
उनके जीवन स्तर की है
तुम अपनी छाती पर
वजनदार पत्थर बांधकर
चल रहे हो उमंग और उत्साह के साथ
मजदूरों का हक़ दिलाने ----
कामरेड आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं
तुम्हें लाल सलाम
लाल सलाम
इंकलाब जिंदाबाद
जिंदाबाद
"ज्योति खरे"
गुरुवार, फ़रवरी 26, 2015
आज भी रिस रहा है -----
जब कभी
तराशा होगा
पहाड़ को
दर्दनाक चीख वह तो केवल
कांपती सिसकती
अपने बचे रहने के लिए
गिड़गिड़ाती रहीं---
पहाड़ की कराह
को अनसुना कर
इतिहास रचने
करते रहे पहाड़ की आंखों की बूंदें
सोमवार, जनवरी 26, 2015
बसंत तुम लौट आये हो ------
धूप दिनभर इतराई
जब भी आते हो
प्रेम में सुगंध भर जाते हो---"ज्योति खरे"
बुधवार, जनवरी 14, 2015
अम्मा का निजि प्रेम -------
हींग,मैथी,राई से बघरा मठा
और नये चांवल की खिचड़ी
खाने तब ही मिलती थी
जब सभी
पापा ने कहा
मुझे नियमों से बरी रखो अम्मा ने कहा
पापा ने पुरुष होने का परिचय दिया
अब मुझसे प्रेम नहीं करती तुम
अब मुझसे प्रेम नहीं करती तुम
पापा की हथेली से
फिसलकर गिर गया सूरज
माथे की सिकुड़ी लकीरों को फैलाकर
फिसलकर गिर गया सूरज
माथे की सिकुड़ी लकीरों को फैलाकर
बंधा प्रेम तो
कभी भी टूट सकता है
मेरा निजि प्रेम मेरे बच्चे हैं
पापा बंधें प्रेम को तोड़कर
वैकुंठधाम चले गये "ज्योति खरे "
चित्र -- गूगल से साभार
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