बुधवार, जनवरी 14, 2015

अम्मा का निजि प्रेम -------

आटे के ठोस
तिली के मुलायम लड्डू
मीठी नीम के तड़के से
लाल मिर्च शक्कर भुरका नमकीन
हींग,मैथी,राई से बघरा मठा
और नये चांवल की खिचड़ी
 
खाने तब ही मिलती थी
जब सभी
तिल चुपड़ कर नहाऐं
और अम्मा के भगवान के पास
एक एक मुठ्ठी कच्ची खिचड़ी चढ़ाऐं
 
पापा ने कहा
मुझे नियमों से बरी रखो
बच्चों के साथ मुझे ना घसीटो 
सीधे पल्ले को सिर पर रखते हुए
अम्मा ने कहा
नियम सबके लिए होते हैं

 
पापा ने पुरुष होने का परिचय दिया
अब मुझसे प्रेम नहीं करती तुम
अम्मा ने तपाक कहा
बिलकुल नहीं करती तुमसे प्रेम
 
पापा की हथेली से
फिसलकर गिर गया सूरज 
माथे की सिकुड़ी लकीरों को फैलाकर
पूंछा क्यों
जमीन में पड़े पापा के सूरज को उठाकर
सिंदूर वाली बिंदी में
लपेटते हुए बोलीं
तुम्हारा और मेरा प्रेम
समाज और घर की चौखट से बंधा है
जो कभी मेरा नहीं रहा
 
बंधा प्रेम तो
कभी भी टूट सकता है
निजि प्रेम कभी नहीं टूटता
मेरा निजि प्रेम मेरे बच्चे हैं

 
पापा बंधें प्रेम को तोड़कर
वैकुंठधाम चले गये
अम्मा आज भी
अपने निजि प्रेम को जिन्दा रखे
अपनी जमीन पर खड़ी हैं -----

                                                  "ज्योति खरे "


चित्र -- गूगल से साभार



   

शनिवार, जनवरी 03, 2015

इस बरस और कई कई बरस ----

 
कई वर्षों से इकठ्ठे
टुकनियां भर निवेदनों को
एक ही झटके में झटककर
मन के हवालात में
अपराधियों की कतार में
खड़ा कर दिया
 
मैंने तो कभी नहीं किया निवेदन
ना ही दिए कोई संकेत
ना ही देखा समूची पलकों को खोलकर
कनखियों से देखना
अपराध है क्या ?
 
तुम भी तो खरोंच देती हो
कनखियों से देखते समय
मेरी मन की देह को
और भींग जाती हो
भीतर तक
ऊग जाती हैं
तुम्हारे चेहरे पर बूंदें
पोंछकर बूंदों को
अपराधी ठहराना गुनाह है
 
स्वीकार कर लो
नए बरस की नयी कामनायें
ताकि प्रेम के खारे समंदर में
आ जाये मिठास
इस बरस और कई कई बरस ----
 
                                                              "ज्योति खरे "

चित्र- गूगल से साभार

बुधवार, दिसंबर 17, 2014

दुनियां की सभी माओं के आंसू ----


सीढ़ी पर बैठे बच्चे
बच्चे नहीं
समूची दुनियां के
नयी सदी के मनुष्य थे
 
सीढ़ी पर बैठकर बच्चे
घुप्प अंधेरे और
आतंक के साये में
जीवन की नयी संभावनाओं का
तार-तार बुन रहे थे
पढ़ रहे थे
मनुष्यता का पाठ
चाहते थे
दुनियां के हर बच्चेां से
दोस्ती करना
 
सीढ़ी पर बैठकर बच्चे
पकड़े थे माँ का आँचल
पापा की उंगली
दादा की लाठी
दादी का चश्मा
 
दुनियां के ये बच्चे
अपनी अपनी माँ से कह रहे थे
पोंछती रहें हर बच्चे के आंसू 
कह रहे थे पापा से
आतंक के अंधेरे को करते रहें नष्ट
तय करें उजाले का सफर
कह रहे थे दादी से
चश्मे के बिना तारे गिनों
दादा की लाठी से
बदलना चाहते थे
संस्कृति
 
सीढ़ी पर बैठे बच्चे
सभ्यता और संस्कृति की
भरी बंदूक से
मार दिये गए
पाठशाला में ही रंग गयी
मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाली किताबें
 
क्या अब
उसी सीढ़ी पर बैठकर बुद्धिजीवी
तलाशकर लौटा पायेंगे
मां की गोद के
लापता खून से लथपथ बच्चे
 
दुनियां के बचे हुए लोगो
सभ्यता और संस्कृति की
ओढ़कर तार-तार चादर
आसमान में देखो
ध्रुव तारे के पास से
बह रहे हैं
दुनियां की सभी माओं के आंसू ------

"ज्योति खरे"



शुक्रवार, अक्टूबर 10, 2014

करवा चौथ का चाँद-------

चाँद तो मैंने
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
मेरे आवारापन को
स्वीकारा था तुमने--

सूरज से चमकते गालों पर
पपड़ाए होंठों पर
रख दिये थे मैंने
कई कई चाँद----


चाँद तो
उसी दिन रख दिया था
हथेली पर तुम्हारे
जिस दिन
तमाम विरोधों के बावजूद
ओढ़ ली थी तुमने
उधारी में खरीदी
मेरे अस्तित्व की चुन्नी--


और अब
क्यों देखती हो
प्रेम के आँगन में
खड़ी होकर
आटे की चलनी से
चाँद----


तुम्हारी तो मुट्ठी में कैद है
तुम्हारा अपना चाँद----


"ज्योति खरे" 

चित्र - गूगल से साभार

बुधवार, अक्टूबर 08, 2014

शरद का चाँद -------

 
ख़ामोशी तोड़ो
सजधज के बाहर निकलो
उसी नुक्कड़ पर मिलो
जहाँ कभी बोऐ थे हमने
शरद पूर्णिमा के दिन
आँखों से रिश्ते -----


और हाँ !
बांधकर जरूर लाना
अपने दुपट्टे में
वही पुराने दिन
दोपहर की महुआ वाली छांव
रातों के कुंवारे रतजगे
आंखों में तैरते सपने
जिन्हें पकड़ने
डूबते उतराते थे अपन दोनों -----


मैं भी बाँध लाऊंगा
तुम्हारे दिये हुये रुमाल में
एक दूसरे को दिये हुए वचन
कोचिंग की कच्ची कॉपी का
वह पन्ना
जिसमें
पहली बार लगायी
लिपिस्टिक लगे होंठों के निशान
आज भी
पवित्र और सुगंधित है-----


क्योंकि अब भी तुम
मेरे लिए शरद का चाँद हो------
                                     "ज्योति खरे"  
 
 
चित्र- गूगल से साभार

रविवार, अक्टूबर 05, 2014

हादसों के घाव से रिस रहे खून------


रौशनियों की चकाचौंध में
उत्साह से भरा उत्सव
चमचमाता उल्लास
अचानक
अंधाधुंध भागते पैरों के तले
कुचल जाता है ----
 
ऐसा क्या हो जाता है
कि भीड़ अपनी पहचान मिटाती
भगदड़ का रुप ले लेती है
और समूचा वातावरण
मासूम, लाचार और द्रवित हो जाता है----
 
कुछ तो है
जिसके नेपथ्य में
अदृश्य इशारे
हादसों की कहानी गढ़ते हैं
और हमारी तमाम सचेतनाओं के बावजूद
हमारी तलाश से परे हैं
इनकी खामोश भूमिका
जीवन मूल्यों के टकराव का
शंखनाद करती हैं ----
 
हम आसमान को गिरते समय 
टेका लगाकर
धराशायी होने से बचाने वाले
और
हादसों के घाव से रिस रहे खून को
पोंछने वाले
खानदानी परिवार के सदस्य हैं ----
                                            
                                                 "ज्योति खरे"
 चित्र गूगल से साभार

 


रविवार, सितंबर 28, 2014

अम्मा का आशीष- मुझे मिला सरस्विता पुरस्कार---

 
              प्रसिद्ध रचनाकार,ब्लॉगर रश्मि प्रभा जी की
माताश्री सरस्वती प्रसाद जी की पहली पुण्यतिथि पर
"सरस्वती प्रसाद को समर्पित--सरस्विता पुरस्कार"
स्पोर्ट्स एंड रिक्रिएशन क्लब मयूर विहार,दिल्ली में
विख्यात साहित्यकार डॉ.सरोजनी प्रीतम ,
सुप्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुदगल ,
वरिष्ठ कवि व गीतकार बालस्वरूप राही जी के
मुख्य आथित्य में 19 सितम्बर 2014 की शाम
वितरित किए गए.साथ ही रश्मि प्रभा जी के संपादन
में हिंदी युग्म से प्रकाशित
सरवस्ती प्रसाद जी की रचनाओं का संकलन
"एक थी तरु"का भी विमोचन हुआ.


सरस्विता पुरस्कार तीन विधाओं में दिये गये---
1. संस्मरण में- लावण्या शाह
2. कहानी में- डॉ स्वाति पांडे नलावडे
3. कविता में- ज्योति खरे
 इस गरिमामयी एवं भव्य समारोह की सबसे महत्वपूर्ण बात
यह थी कि प्रसाद परिवार की चार पीढ़ियों ने
स्व.सरस्वती प्रसाद जी को श्रद्धांजलि दी
एवं संगठित,संस्कारित विचारधारा की द्रष्टि भी
समाज के सामने प्रस्तुत की.

इस समारोह में वंदना गुप्ता, अंजू चौधरी, नीलिमा शर्मा,
मा समता,मुकेश कुमार सिन्हा,शैलेष भारतवासी,सरस दरबारी,
सोनिया गौड,मृदुला प्रधान,अपर्णा अनेकवर्णा, केदार नाथ,
अल्पना प्रिया राज, प्रिया गौतम की उल्लेखनीय उपस्थिति रही.
रश्मि प्रभा जी का अनूठा संयोजन,इनकी बहन
नीलम प्रभा का शिष्ट और मन को भावुक करने वाला
संचालन सचमुच अम्मा की आत्मा को समारोह में

उतार लाया था--- 
 









                  ज्योति खरे