उम्मीद तो हरी है .........
दौर पतझड़ का सही, उम्मीद तो हरी है
शुक्रवार, जून 20, 2014
फुरसतिया बादल ------
बजा बजा कर
ढोल नगाड़े
फुरसतिया बादल आते
बिजली के संग
रास नचाते
बूंद बूंद चुचुआते-----
कंक्रीट के शहर में
ऋतुयें रहन धरी
इठलाती नदियों में
रोवा-रेंट मची
तर्कहीन मौसम अब
तुतलाते हकलाते ------
चुल्लू जैसे बांधों में
मछली डूब रही
प्यासे जंगल में पानी
चिड़िया ढूंढ रही
प्यासी ताल-तलैयों को
रात-रात भरमाते ------
"ज्योति खरे"
सोमवार, जून 02, 2014
जेठ मास में--------
अनजाने ही मिले अचानक
एक दोपहरी जेठ मास में
खड़े रहे हम बरगद नीचे
तपती गरमी जेठ मास में-----
प्यास प्यार की लगी हुई
होंठ मांगते पीना
सरकी चुनरी ने पोंछा
बहता हुआ पसीना
रूप सांवला हवा छू रही
बेला महकी जेठ मास में-----
बोली अनबोली आंखें
पता मांगती घर का
लिखा धूप में उंगली से
ह्रदय देर तक धड़का
कोलतार की सड़कों पर
राहें पिघली जेठ मास में-----
स्मृतियों के उजले वादे
सुबह-सुबह ही आते
भरे जलाशय शाम तलक
मन के सूखे जाते
आशाओं के बाग़ खिले जब
यादें टपकी जेठ मास में-----
"ज्योति खरे"
चित्र--- गूगल से साभार
बुधवार, मई 21, 2014
नीम कड़वी ही भली------
दीवारों में घर की जब से
होने लगी है कहासुनी
चाहतों ने डर के मारे
लगा रखी है सटकनी----
लौटा वर्षों बाद गांव में
सहमा सा चौपाल मिला
रात भर अम्मा की बातें
आंख ने रोते सुनी----
प्यार का रिश्ता सहेजे
धड़कनों को साथ लाया
चौंक कर देखा मुझे और
खिलखिलाती चलते बनी----
सभ्यता का पाठ पढ़ने
दौड़कर बचपन गया था
आज तक कच्ची खड़ी है
वह इमारत अधबनी----
टाट पर बैठे हुए हैं
भूख से बेहाल बच्चे
धर्म की खिचड़ी परोसी
खैरात वाली कुनकुनी----
नीम कड़वी ही भली
रोग की शातिर दवा है
दर्द थोड़ा ठीक है
तबियत लेकिन अनमनी-----
"ज्योति खरे"
शनिवार, मई 10, 2014
कोई आयेगा ------
माँ दिवस पर
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कोई आयेगा
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बीनकर लाती हैं
जंगल से
कुछ सपने
कुछ रिश्ते
कुछ लकड़ियां--
टांग देती हैं
खूटी पर सपने
सहेजकर रखती हैं आले में
बिखरे रिश्ते
डिभरी की टिमटिमाहट मेँ
टटोलती हैं स्मृतियां--
बीनकर लायीं लकड़ियों से
फिर जलाती हैं
विश्वास का चूल्हा
कि कोई आयेगा
और कहेगा
अम्मा
तुम्हे लेने आया हूं
घर चलो
बच्चों को लोरियां सुनाने------
"ज्योति खरे"
शनिवार, अप्रैल 26, 2014
और एक दिन
घंटों पछाड़कर फींचती है
खंगारकर निचोड़ती हुई
बगरा देती है
घाट के पत्थरों पर
सूखने
अपने कपड़े
जैसे रात में पछाड़कर कलमुँहो ने
बगरा दी थी देह
बैठकर घाट पर उकडू
मांजने लगी
तम्बाखू की दुर्गन्ध से भरे दांत
दारु की कसैली भभकती
लार से भरी जीभ
देर तक करती रही कुल्ला
उबकाई खत्म होते ही
बंद करके नाक
डूब गयी नदी में
कई डुबकियों के बाद
रगड़कर देह में साबुन
छुटाने लगी
अंग अंग में लिपटा रगदा
नदी बहा तो ले जाती है रगदा
नहीं बहा पाती
दरिंदों की भरी गंदगी
नदी तो खुद छली जाती है
पहाड़ों की रगड़ खाकर
हांफती,कांपती
चढ़ रही है घाट की सीढ़ियां
जैसे चढ़ती है एक बुढ़िया
मंदिर की देहरी
गूंज रही है
उसके बुदबुदाने,बड़बड़ाने की आवाज
जब तक जारी रहेंगी
बतौलेबाजियां
घाट की सीढ़ियां इसी तरह
रोती रहेंगी
और एक दिन
सूख जाएगी नदी
रगदा बहाते बहाते ------
"ज्योति खरे"
सोमवार, फ़रवरी 03, 2014
वाह !! बसंत--------
अच्छा हुआ
इस सर्दीले वातावरण में
लौट आये हो--
बदल गई
बर्फीले प्रेम की तासीर
जमने लगीं
मौसम की नंगी देह पर
कुनकुनाहट-----
लम्बे अवकाश के बाद
सांकल के भीतर
होने लगी खुसुर-पुसुर
इतराने लगी दोपहर
गुड़ की लईया चबाचबा कर-----
वाह! बसंत
तुम अच्छे लगते हो
प्रेम के गीत गाते----
"ज्योति खरे"
चित्र- गूगल से साभार
बुधवार, जनवरी 22, 2014
नफरतें प्रेम की कोख से ही जन्मती हैं---------
तोड़ डालो सारे भ्रम
कि तुम्हारी सुंदरता को
निहारता हूं
नजाकत को पढ़ता हूं
संत्रास हूं--
तराश कर रख ली है सूरत
ह्रदय में------
होंगे वो कोई और
जो रखते होंगे धड़कनों में तुम्हें
बहा आओ किसी नदी में
मिले हुए मुरझाऐ फूलों के संग
अपना रुतबा,घमंड
मैंने कभी नहीं रखा
अपनी धड़कनों में तुम्हें
धड़कनों का क्या
चाहे जब रुक जायेंगी
आत्मिक हूं---
आत्मा में बसा रखा है
जहां भी जाऊंगा संग ले जाऊंगा------
लिखो,लिखो कई बार लिखो
कि मुझसे करती हो नफरत
देती हो बददुआ
नफरतें प्रेम की कोख से ही जन्मती हैं
बांध लो अपने दुपट्टे में
मेरी भी यह दुआ------
जलाकर आ गया हूं
बूढ़े पीपल की छाती पर
एक माटी का दिया
सुना है
रात के तीसरे पहर
दो आत्माओं का मिलन होता है-------
"ज्योति खरे"
चित्र-- गूगल से साभार
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