बुधवार, मार्च 25, 2026

राह देखते रहे

राह देखते रहे
***********
राह देखते रहे उम्र भर 
क्षण-क्षण घडियां 
घड़ी-घड़ी दिन 
दिन-दिन माह बरस बीते 
आंखों के सागर रीते--

चढ़ आईं गंगा की लहरें 
मुरझाया रमुआ का चेहरा 
होंठों से अब 
गयी हंसी सब  
प्राण सुआ है सहमा-ठहरा 

सुबह, दुपहरी, शामें 
गिनगिन 
फटा हुआ यूं अम्बर सीते--

सुख के आने की पदचापें 
सुनते-सुनते सुबह हो गयी 
मुई अबोध बालिका जैसी 
रोते-रोते आंख सो गयी 

अपने दुश्मन 
हुए आप ही 
अपनों ने ही किए फजीते--

धोखेबाज खुश्बुओं के वृत
केंद्र बदबुओं से शासित है 
नाटक-त्राटक, चढ़ा मुखौटा 
रीति-नीति हर आयातित है 

भागें कहां, 
खडे सिर दुर्दिन 
पड़ा फूंस है, लगे पलीते---

◆ज्योति खरे

शनिवार, फ़रवरी 14, 2026

प्रेम

प्रेम
***
लड़कों की जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की चुन्नी में
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
कलगी के साथ खुसा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच में फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है 

फूलों का रंग
भवरों की जान
बसंत की मादकता
हरे ठूंठ मधुमास है 

जंगली जड़ी बूटियों का रसायन
झाड़ फूक और सम्मोहन
के ताबीज में बंद
बीमारों की दवा है 

फुटबॉल की तरह उचक कर 
आकाश की तरफ जाता है
और उल्का पिंड बनकर   
दरकी जमीन पर गिरकर
हरियाता है 

कोल्ड ड्रिंग्स की खाली बोतलों सा लुढ़कता 
चाय की चुस्कियों के साथ बिस्किट के साथ गुटक लिया जाता है
और च्यूइंगम की तरह
घंटों चबाया जाता है 

बूढे माँ बाप की
दवाई वाली पर्ची में लिखा
फटी जेबों में रखा रखा
भटकता रहता है 

और अंत में
पचड़े की पुड़िया में लपेटकर 
डस्टबिन में 
फेंक दिया जाता है ---

◆ज्योति खरे

सोमवार, अक्टूबर 20, 2025

अंधेरों के ख़िलाफ़

अंधेरों के ख़िलाफ़
**************

प्रारम्भ में 
एक मिट्टी का दिया
जला होगा
जो अंधेरों से लड़ता हुआ 
उजाले को दूर दूर तक
फैलाता रहा होगा

फिर
संवेदनाओं के चंगुल में फंसकर
जनमत के बाजार में
नीलाम होने लगा
जूझता रहा आंधियों से
लेकिन
नहीं ख़त्म होने दी
अपनी टिमटिमाहट

उजाला
फूलों की पंखुड़ियों पर
लिख रहा है
अपने होने का सच

मिट्टी का दिया
आज भी उजाले को 
मुट्ठियों में भर भर कर 
घर घर पहुंचा रहा है
ताकि मनुष्य
लड़ सकें 
अंधेरों के ख़िलाफ़---

◆ज्योति खरे

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

रविवार, अगस्त 03, 2025

दोस्त के लिए

दोस्त के लिए
***********

दोस्त
तुम्हारी भीतरी चिंता
तुम्हारे चेहरे पर उभर आयी है
तुम्हारी लाल आँखों से
साफ़ झलकता है
कि,तुम
उदासीन लोगों को
जगाने में जुटे हो 

ऐसे ही बढ़ते रहो
हम तुम्हारे साथ हैं

मसीह सूली पर चढ़ा दिए गये
गौतम ने घर त्याग दिया
महावीर अहिंसा की खोज में भटकते रहे
गांधी को गोली मार दी गयी

संवेदना की जमीन पर
कोई नया वृक्ष नहीं पनपा
क्योंकि
संवेदना की जमीन पर
नयी संस्कृति ने
बंदूक थाम रखी है

बंजर और दरकी जमीन पर
तुम
नए अंकुर
उपजाने में जुटे हो

ऐसे ही बढ़ते रहो
हम तुम्हारे साथ हैं

जो लोग
संगीतबद्ध जागरण में बैठकर
चिंता व्यक्त करते हैं
वही आराम से सोते हैं
इन्हें सोने दो

तुम्हारी चिंता
महानगरीय सभ्यता में हो रही गिरावट
और बाज़ार के आसमान
छूते भाव पर है

तुम अपनी छाती पर
वजनदार पत्थर बांधकर
चल रहे हो उमंग और उत्साह के साथ
मजदूरों का हक़ दिलाने 

ऐसे ही बढ़ते रहो
हम तुम्हारे साथ हैं

दोस्ती जिंदाबाद---

◆ज्योति खरे

बुधवार, जुलाई 16, 2025

नहीं रख पाते

नहीं रख पाते
**********
खिलखिलाती
बरसात
नहला देती है
पसीने से सनी धूप को
उतरकर दीवारों के सहारे
घुस जाती है
घर के भीतर
भर देती है
मौन संबंधों में संवाद 
फिर छत पर बैठकर
गाती है युगल गीत

बरसात
कर देती है
मुरझा रहे प्रेम को
तरबतर 

लेकिन हम
सहेजकर रख लेते हैं छतरी
नहीं रख पाते
सहेजकर
बरसात---

◆ज्योति खरे

गुरुवार, मार्च 20, 2025

आजकल वह घर नहीं आती

आजकल वह घर नहीं आती
**********************
चटकती धूप में 
लाती है बटोरकर तिनके
रखती है घर के सुरक्षित कोने में 
फिर बनाती है अपना शिविर घर
जन्मती है चहचहाहट
गाती है अन्नपूर्णा के भजन
देखकर आईने में अपनी सूरत
मारती है चोंच

अब भूले भटके
आँगन में बैठकर
देखती है टुकुर मुकुर
खटके की आहट सुनकर
उड़ जाती है फुर्र से

वह समझ गयी है कि
आँगन आँगन
दाना पानी के बदले
जाल बिछे हैं
हर घर में
हथियार रखे हैं

अब उसने 
फुदक फुदक कर
आना छोड़ दिया है---

◆ज्योति खरे

शनिवार, मार्च 08, 2025

स्त्री पिस जाती है

स्त्री पिस जाती है 
*************
स्त्री पीसती है
सिल-बट्टे में
ससुर की
देशी जड़ी बूटियां
सास के लिए
सौंठ,कालीमिर्च,अजवाइन
पति के तीखे स्वाद के लिए
लहसुन,मिर्चा,अदरक

पीस लेती है
कभी-कभार
अपने लिए भी
टमाटर हरी-धनिया 

स्त्री नहीं समझ पाती कि,
वह खुद 
पिसी जा रही है
चटनी की तरह---

◆ज्योति खरे

शुक्रवार, फ़रवरी 14, 2025

गुलाब

कांटों के बीच
खिलने के बावजूद
सम्मोहित कर देने वाले 
इनके रंग
और देह से उड़ती हुई जादुई
सुगंध
को सूंघने
भौंरों का 
लग जाता है मज़मा
सूखी आंखों से
टपकने लगता है
महुए का रस

लेकिन जब
प्रेम में सनी उंगलियां
इन्हें तोड़कर
रखती हैं अपनी हथेलियों में 
तो इन हथेलियों को
नहीं मालूम होता है
कि,गुलाब की पैदाईश
कांटेदार कलम को
रोपकर होती है
हथेलियां यह भी नहीं जानती हैं कि
गुलाब के
सम्मोहन में फंसा प्रेम
एक दिन
सूख जाता है

प्रेम को  
गुलाब नहीं
गुलाब का 
बीज चाहिए----

◆ज्योति खरे

गुरुवार, अक्टूबर 17, 2024

थिरकेगा पूरा गांव

थिरकेगा पूरा गांव
***************
तुम्हारी चूड़ियों की 
पायलों की 
तभी आती है आवाज़
जब में जुटा रहता हूं
काम पर

तुम्हारी आहटें 
मेरे चारों तरफ 
सुगंध का जाल बनाती है 
मैं इस जाल में उलझकर 
पुकारता हूं तुम्हें

मजदूर हूँ 
मजदूरी करने दो
रोटी के जुगाड़ में 
खपने दो दिनभर 
समय को साधने की फिराक में 
लड़ने दो सूरज से
चांद के साथ विचरने दो
चांदनी के आंचल तले
बुनने दो सपनें

समय की नज़ाकत को समझो 
चूड़ियों को 
पायलों को 
बेवजह मत खनकाओ 

मुझे जीतने तो दो
रोटी,घर और उजाला 

चाहता हूं 
मेरे साथ 
मेरे मजदूर भाई भी
जीत लें 
रोटी,घर और उजाला

जिस दिन जीत लेंगे उजाला
उस दिन 
घुंघुरुदार पायलें
देहरी देहरी बजेंगी
चूड़ियों की खनकदार हंसी 
अच्छी लगेंगीे

चाँद बजायेगा बांसुरी
तबले पर थाप देगा सूरज
चांदनी की जुल्फों से 
टपकेगी शबनम

फिर तुम नाचोगी 
मैं गाऊंगा 
और थिरकेगा पूरा गांव

◆ज्योति खरे

गुरुवार, अगस्त 08, 2024

तुम्हारी खिलखिलाहट में

तुम्हारी खिलखिलाहट में
*******************
यह बात क्यों नहीं मानती कि
बिना आभूषण
बिना श्रृंगार के
वैसे ही लगती हो
जैसी की तुम हो

शांत,निर्मल
बहती नदी सी
जिसकी कगार पर आकर
कहां ठहर पाते हैं
मान,अपमान,माया
तुम्हारी देह में समा जाना चाहते हैं
जीवन के सारे द्वन्द 

प्रेम का बीजमंत्र हो
साँझ की आरती हो
क्योंकि तुम
तुम ही हो

अब ध्यान से सुनो 
मेरी बात

मैं
तुम्हारी खिलखिलाहट में
अपनी खिलखिलाहट
मिलाना चाहता हूं

तुम्हारे स्पर्श की
नयी व्याख्या 
लिखना चाहता हूं

अब खिलखिलाना बंद करो
और मुझे
लिखने दो----

◆ज्योति खरे

गुरुवार, जुलाई 25, 2024

याद करती है माँ

माँ
जब तुम याद करती हो
मुझे हिचकी आने लगती है
मेरी पीठ पर लदा
जीत का सामान
हिलने लगता है

विजय पथ पर
चलने में
तकलीफ होती है

माँ
मैं बहुत जल्दी आऊंगा
तब खिलाना
दूध भात
पहना देना गेंदे की माला
पर रोना नहीं
क्योंकि
तुम रोती बहुत हो
सुख में भी
दुःख में भी----
                                                        ◆ज्योति खरे

गुरुवार, जुलाई 11, 2024

समीप खीचते हुए

समीप खीचते हुए
**************

मेरे और तुम्हारे 
विषय को लेकर
मनगढ़ंत किस्सों में
बेतुकी बातें दर्ज हैं

यहां तक कि,
दीवारों पर भी लिख दिया गया है
मेरा और तुम्हारा नाम 
बना दिया है दिल 
और उस दिल को 
तीर से भी चीर दिया गया है

तुम हमेशा
मेरे करीब आने से डरती हो
कहती हो
कि, लोग तरह तरह की कहानी गढ़ेंगे
लिख देंगें
उपन्यास 

मैंने
अपने समीप खीचते हुए
उससे कहा
बाँध लो 
अपनी चुन्नी में 
हल्दी चांवल के साथ 
अपना प्रेम 

सारे किस्से 
लघु कथा में सिमट जाएंगे--- 

◆ज्योति खरे

गुरुवार, जुलाई 04, 2024

प्रेम को नमी से बचाने

प्रेम को नमी से बचाने
****************
धुओं के छल्लों को छोड़ता 
मुट्ठी में आकाश पकड़े
छाती में 
जीने का अंदाज बांधें
चलता रहा 
अनजान रास्तों पर 

रास्ते में
प्रेम के कराहने की 
आवाज़ सुनी 
रुका 
दरवाजा खटखटाया 
प्रेम का गीत बाँचता रहा
जब तक 
प्रेम उठकर खड़ा नहीं हुआ 

उसे गले लगाया 
थपथपाया
और संग लेकर चल पड़ा
शहर की संकरी गलियों में

दोनों की देह में जमी
प्रेम की गरमी
गरजती बरसती बरसात
बहा कर 
ज़मीन पर न ले आये
तो खोल ली छतरी
खींचकर पकड़ ली 
उसकी बाहं
और चल पड़े 
प्रेम को नमी से बचाने
ताकि संबंधों में 
नहीं लगे फफूंद---  

◆ज्योति खरे

गुरुवार, जून 27, 2024

चिमटियों में लटके किरदार

चिमटियों में लटके किरदार
*********************
बारिश थम गयी
सड़कों का पानी सूख गया
घर का आंगन
अभी तक गीला है
माँ के आंसू बहे हैं

कितनी मुश्किलों से खरीदा था
ईंट,सीमेंट,रेत
जिस साल पिताजी बेच कर आये थे
पुश्तैनी खेत
सोचा था
शहर के पक्के घर में
सब मिलकर हंसी ठहाके लगायेंगे 
तीज-त्यौहार में
सजधज कर 
मालपुआ खायेंगे

घर बनते ही सबने
आँगन और छत पर
गाड़ ली हैं अपनी अपनी बल्लियाँ
बांध रखे हैं अलग अलग तार
तार पर फेले सूख रहे हैं
चिमटियों में लटके
रंग बिरंगे किरदार

इतिहास सा लगता है
कि,कभी चूल्हे में सिंकी थी रोटियां
कांसे की बटलोई में बनी थी
राहर की दाल
बस याद है
आया था रंगीन टीवी जिस दिन
करधन,टोडर,हंसली
बिकी थी उस दिन

बर्षों बीत गये
चौके में बैठकर
नहीं खायी बासी कढ़ी और पूड़ी
बेसन के सेव और गुड़ की बूंदी
अब तो हर साल
बडी़ और बिजौरे में
लग जाती है फफूंद
सूख जाता है
अचार में तेल

औपचारिकता निभाने
दरवाजे खुले रखते हैं
एक दूसरे को देखकर
व्यंग भरी हँसी हंसते हैं

बारिश थम गयी
सड़कों का पानी सूख गया
घर का छत
अभी तक गीला है
माँ पिताजी रो रहे हैं---
            
◆ज्योति खरे

रविवार, जून 16, 2024

पिता

🔴
पिता
****
अंधेरों को चीरते
सन्नाटे में अपने से ही बात करते
पिता
यह सोचते थे कि
उनकी आवाज़ 
कोई नहीं सुन रहा होगा

मैं सुनता था
कांच के चटकने जैसी
ओस के टपकने जैसी
शाखाओं के टूटने जैसी
काले बादलों के बीच में से निकलकर
बरसती बूंदों जैसी
इन क्षणों में पिता
व्यक्ति नहीं
समुंदर बन जाते थे

उम्र के साथ
बदलते रहे पिता
पर भीतर से कभी नहीं बदले पिता
क्योंकि
रिश्तों के अस्तित्व को
बचाने की ज़िद
उनके जिंदा रहने की वजह थी

पिता
जीवन के किनारे खड़े होकर
नहीं सूखने देते थे
कामनाओं का जंगल
उड़ेलते रहते थे
अपने भीतर का
मीठा समुंदर

आंसुओं को समेटकर
अपने कुर्ते के ज़ेब में
रखने वाले
पिता
अमरत्व के वास्तविक
हक़दार थे

पिता
आज भी 
दरवाजे के बाहर खड़े होकर
सांकल 
खटखटाते हैं----

◆ज्योति खरे

शनिवार, अप्रैल 13, 2024

मुद्दे

मुद्दे
***
खास समय में
कुछ लोग आकर
मुद्दों को सहलाते हैं
भावनाओं को
भटकाकर
चले जाते हैं

ऐसे लोग
रखते हैं गहरी पैठ
बदल देते हैं मस्तिष्क की तस्वीर
कर देते हैं कल्पनाओं की सूखी जमीन को हरा

मुद्दे
जीवन और मृत्यु के बीच
पलने वाले अद्र्श्य भ्रूण हैं 
जिन्हें मार दिया जाता है
रंगीन चादरों की तहों में लपेटकर

फिर नहीं आते ऐसे लोग
सो जाते हैं
मुद्दों की खाल ओढ़कर

भटकाने वालों से
सावधान हो जाओ
कंक्रीट की सड़कों पर
पगडंडियां मत बनाओ
बनाओ
एक बहुत चौड़ा रास्ता
जो मुद्दों के खतरनाक जंगल को
चीरता हुआ निकल जाए
उस पार
जहां स्वागत के लिए खड़ी है
आने वाली पीढ़ी
मुद्दों से बेखबर----     

◆ज्योति खरे

चित्र- गूगल से साभार

शनिवार, मार्च 02, 2024

प्रेम रेखाओं के पचड़े में नहीं पड़ता

दो समानांतर रेखाएं
आपस में
कभी नहीं मिलती
ऐसा रेखा गणित के जानकार
बताते हैं

लेकिन प्रेम में डूबे दो अजनबी
बताते हैं कि
जब हम खींचते हैं
एक दूसरे के
पास आने के लिए रेखा
तब 
दोनों रेखाएं
समानांतर होते हुए भी
एक छोर से
दूसरे छोर को
मिलाने की कोशिश करते हैं

इस तरह का झुकाव
समानांतर होते हुए भी
दो 
सीधी रेखाओं को 
आपस में जुड़ने का
मशविरा देता है

क्योंकि
प्रेम
रेखा गणित की
रेखाओं में
नहीं उलझना चाहता
वह तो
दो रेखाओं का
घेरा बनाकर
इसके भीतर
बैठना चाहता है

प्रेम 
रेखाओं के पचड़े में नहीं पड़ता 
वह
अपने होने
और अपने प्रेम के वजूद को
सत्यापित करने की
कोशिश करता है--- 

◆ज्योति खरे

बुधवार, जनवरी 03, 2024

तुम्हारी चीख में शामिल होगा

तुम्हारी चीख में शामिल होगा
***********************
अखबार के मुखपृष्ठ में 
लपेटकर रख लिए हैं
तुम्हारे लिखे प्रेम पत्र
और गुजरा हुआ साल
  
जब
बर्फ़ीली हवाओं में 
ओढ़ कर बैठूंगा रजाई
तो पढूंगा प्रेम पत्र और 
बीते हुए साल का लेखा-जोखा

उम्मीदें खुरदुरी जमीन पर
कहाँ दौड़ पाती हैं 

तुम जब लिख रही थी
प्रेम पत्र और उनमें
बैंडेज की पट्टी के साथ
चिपका रही थी गुलाब
डाल रहीं थी सपनों की स्वेटर में फंदा
उसी समय
राजधानी में रची जा रही थी
धर्म को, ईमान को 
और 
मनुष्य की मनुष्यता की पहचान को
मार डालने की साजिशें 

ऐसे खतरनाक समय में 
प्रेम कहाँ जीवित रह पाता है

मैं अपने ही घर से बेदखल 
होने की बैचेनियों से गुजर रहां हूं
लड़ रहा हूं 
साज़िशों के खिलाफ़

तुम भी तो
गुजर रही हो इसी दौर से
जब कभी घबड़ाओ 
तो बहुत जोर से चीखना 
तुम्हारी चीख में शामिल होगा
एक सवाल
आसमान तुम चुप क्यों हो----

 ◆ज्योति खरे

गुरुवार, अक्टूबर 05, 2023

हम चित्रकार हैं

हम चित्रकार हैं
************
रौशनियों की चकाचौंध में
चमचमाता कैनवास
उल्लास से ब्रश में भरे रंग
उत्साह में डूबा कलाकार
अचानक
अंधाधुंध भागते पैरो के तले
कुचल दिया जाता है 

ऐसा क्या हो जाता है कि 
भीड़ अपनी पहचान मिटाती
भगदड़ में बदल जाती है
और समूचा वातावरण
मासूम,लाचार और द्रवित हो जाता है

यह समय कुछ अजीब सा है
जो प्रकृति के कलाकार
की बनायी चित्रकला को
मिटाने में तुला है

सूख रहीं हैं नदियां
और अधनंगा प्यासा पानी
कोलतार की सड़कों में घूम रहा है
मछलियां किनारों पर आकर
फड़फड़ा रही हैं
जंगल पतझड़ की बाहों में कैद हैं
होने लगा है आसमान में छेद

कैनवास पर अधबनी स्त्री की खूबसूरत देह से
सरकने लगा है आवरण 
चीख रही है स्त्री की छवि
कह रही है
मैं निर्वस्त्र नहीं होना चाहती हूं
कलाकार की लंबी उंगलियां
सिकुड़ने लगी हैं
और वह 
आर्ट गैलरियों की अंधी गुफा में कैद कर लिया गया है

हादसों की यह कहानी 
कौन गढ़ रहा है
यह हमारी तलाश से परे है
इनकी खामोश भूमिका
जीवन मूल्यों के टकराव का
शंखनाद करती हैं 

हम आसमान को गिरते समय 
टेका लगाकर
धराशायी होने से बचाने वाले
और हादसों के घाव से रिस रहे
खून को पोंछने वाले
सृजनात्मक परिवार के सदस्य हैं

हम चित्रकार हैं
प्रकृति को नये सिरे से गढ़ेंगे
स्त्री की देह को नहीं
उसके  मनोभावों को उकेरेंगे----

◆ज्योति खरे

गुरुवार, सितंबर 28, 2023

गूंजती है ब्रह्मांड में

गूंजती है ब्रह्मांड में
***************
गौधूलि सांझ में
बादलों के झुंड
डूबते सूरज की पीठ पर बैठकर
खुसुरपुसुर बतियाते हैं

समुद्र की मचलती लहरें
किनारों से मिलने
बेसुध होकर भागती हैं 
और जलतरंग की धुन
सजने संवरने लगती है

इस संधि काल में
सूरज को धकियाते
ऊगने लगता है चांद

लहरें 
किनारों पर आकर 
पूछती हैं हालचाल 
जैसे हादसों के इस दौर में
मुद्दतों के बाद
मिलते हैं प्रेमी
करते दिल की बातें
जो गूंजती हैं ब्रह्मांड में---

◆ज्योति खरे